सम्पादकीय

नेताओं का सुविधाजनक हथियार: “गुटबाजी” आगर जिले की भाजपा राजनीति का पौराणिक महाकाव्य” – Satirical Political Analysis लेखक – राजेश कुमरावत

▪️ नेताओं का सुविधाजनक हथियार: "गुटबाजी"आगर जिले की भाजपा राजनीति का पौराणिक महाकाव्य 


आगर जिले की भाजपा राजनीति में गुटबाजी का इतिहास किसी पौराणिक कथा से कम नहीं है। यह कथा रामायण और महाभारत से भी अधिक रोचक और विवादों से भरी हुई है। दशकों से यह "राजनीतिक महाकाव्य" सत्ता और संगठन के बीच दो ध्रुवों की तरह खड़ा है। जहां एक ओर "सत्ता के महारथी" अपनी ताकत और रसूख दिखाने में व्यस्त रहते हैं, वहीं दूसरी ओर "संगठन के पुरोधा" अपनी मेहनत और तपस्या को बचाने की लड़ाई लड़ते हैं।
गुटबाजी का ऐसा आलम है कि कर्मठ कार्यकर्ता, जिन्होंने जीवनभर संगठन के लिए काम किया, उनके हिस्से में सिर्फ निराशा आती है। भाजपा की यह गुटबाजी सत्ता और संगठन के बीच ऐसी खाई बना चुकी है, जिसमें न केवल कार्यकर्ता, बल्कि आम जनता भी गिरती जा रही है।
▪️गुटबाजी का पौराणिक अध्याय:
सत्ता बनाम संगठन : आगर जिले में गुटबाजी का सबसे बड़ा उदाहरण है सुसनेर विधानसभा का मामला। भाजपा के वरिष्ठ और कर्मठ कार्यकर्ता, जिन्होंने संगठन के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी, मोका आने पर वंचित रह जाते हैं। उनकी तपस्या पर "गुटबाजी का पानी" फिर जाता है।
एक तरफ तो भाजपा ने गुटबाजी खत्म हो इसलिए जिला अध्यक्ष के लिए नये चेहरे को उतारा है दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और बयां कर रही है. दरअसल, भाजपा में भी गुटबाजी का वही रोग उभर आया है. जो कभी कांग्रेस की परेशानी हुआ करती थी । आलम ये है कि असल भाजपाई अपने आप को ठगा महसूस कर रहे हैं ।
नए भाजपा जिला अध्यक्ष के स्वागत में सोयतकलां नगर में जो हुआ, वह इस पौराणिक महाकाव्य का एक और अध्याय है। जहां एक गुट ने स्वागत द्वार "अपने क्षेत्र" में लगाया, तो दूसरा गुट अपनी "शक्तिप्रदर्शन" वाली जगह पर जम गया।गुटबाजी के कारण नेताओं के नाम बेनर पोस्टरों से गायब होना भी गुटबाजी का "राजनीतिक गुप्तचक्र" था। नगर में ऐसा लगा जैसे यह स्वागत समारोह नहीं, बल्कि "कौन बनेगा सबसे बड़ा गुट" की प्रतियोगिता हो।
▪️गुटबाजी का जनता पर असर:
"घर के झगड़े में घर ही जल गया" :: इस गुटबाजी का सबसे बड़ा शिकार आम जनता और जिले का विकास है। जब नेता आपस में लड़ते हैं, तो विकास कार्य ऐसे ठप पड़ जाते हैं, जैसे "पानी में नाव का इंजन खराब हो गया हो।"
2014 से अब तक में कई विकास योजनाएं इसलिए रुकी रहीं, क्योंकि सत्ता और संगठन के बीच सहमति नहीं बन पाई। विकास कार्य की कई योजनाएं, बेरोजगारी सिर्फ नेताओं के भाषण तक सीमित रही , गुटबाजी के कारण सिर्फ कागजों पर ही बनीं। छोटे कार्यकर्ता भी इस गुटबाजी में पिस जाते हैं। उनकी स्थिति "न घर का, न घाट का" जैसी हो जाती है। जब तक वह एक गुट से जुड़ते हैं, दूसरा गुट उन्हें "दुश्मन" मान लेता है।
▪️ "गुटबाजी का अनवरत नाटक" -
भाजपा के शीर्ष नेताओं के लिए गुटबाजी एक ऐसा "सुविधाजनक हथियार" बन चुकी है, जिसे वह समय-समय पर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। सत्ता और संगठन की इस रस्साकशी में जिले का विकास रस्सी की तरह खिंचता है और आखिरकार टूट जाता है। नेता मंचों पर "एकजुटता" की बात करते हैं, लेकिन मंच के नीचे खड़े कार्यकर्ता गुटबाजी के हिसाब से अपनी जगह तय करते हैं।
यह ऐसा तमाशा है, जिसे जनता हर बार देखती है और फिर चुनावी वादों के झांसे में आ जाती है।
▪️नया भाजपा जिलाध्यक्ष :
"नई उम्मीद या पुरानी कहानी?" :: नए जिलाध्यक्ष को "गुटबाजी के चक्रव्यूह" में फंसे हुए अभिमन्यु की तरह देखा जा रहा है। क्या वह इस चक्रव्यूह से निकलकर सत्ता और संगठन के बीच सेतु बना पाएंगे? या फिर वह भी गुटों के बीच एक नया पक्ष बनकर रह जाएंगे? जिले की जनता को उनसे उम्मीदें हैं, लेकिन इस उम्मीद का क्या होगा, यह समय ही बताएगा।
▪️ गुटबाजी का अंतहीन महाकाव्य :
आगर जिले की भाजपा राजनीति में गुटबाजी का यह पौराणिक महाकाव्य कब खत्म होगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। "एकजुटता" का नारा सिर्फ भाषणों और पोस्टरों तक सीमित है। सत्ता और संगठन की यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी, जब तक नेता अपने स्वार्थों को प्राथमिकता देते रहेंगे।
भाजपा के शीर्ष नेताओं को चाहिए कि वह गुटबाजी के इस महाकाव्य का "संघार" करें। वरना, यह गुटबाजी "सत्ता के सिंहासन" और "संगठन की नींव" दोनों को खोखला करती रहेगी। जनता और कार्यकर्ता दोनों इससे त्रस्त हैं, और विकास एक सपना बनकर रह गया है।
"गुटबाजी खत्म होगी" का नारा अब इतना पुराना हो चुका है कि इसे सुनते ही लोग व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहते हैं, "अरे भाई, यह तो सिर्फ चुनावी रस्म है।"


"व्यंगात्मक राजनीतिक विश्लेषण"
लेखक - राजेश कुमरावत

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