'सार्थक' दृष्टिकोणसम्पादकीय

हिंदुत्व की लहर या सत्ता की सुनामी—बंगाल ने क्या संदेश दिया? कमल की लहर में हिंदुत्व की धार, बंगाल ने बदला रुख- समसामयिकी विश्लेषण | राजेश कुमरावत ‘सार्थक’


▪️34 साल वाम और डेढ़ दशक तृणमूल के बाद भाजपा का तेज़ उभार, पहचान, सुरक्षा और योजनाओं का दिखा असर
▪️लाल से हरा और अब भगवा? बंगाल में बदलती पहचान की कहानी
▪️बंगाल में खिला कमल : हिंदुत्व, पहचान और जनादेश का नया समीकरण

✍️ समसामयिकी विश्लेषण | राजेश कुमरावत ‘सार्थक’

पश्चिम बंगाल—यह केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का वह अध्याय है जहाँ आध्यात्म, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक जागरण ने बार-बार इतिहास को दिशा दी है। कभी इसी भूमि से “वंदे मातरम्” की गूंज उठी, तो कभी विश्व मंच पर भारत की आत्मा का उद्घोष हुआ। किन्तु समय के साथ यह प्रदेश वैचारिक प्रयोगों का केंद्र बनता गया—वामपंथ से लेकर क्षेत्रीय राजनीति तक। और अब, हालिया चुनावी संकेतों ने एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या बंगाल फिर से अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान की ओर लौट रहा है?

हालिया चुनावी परिणामों ने संकेत दिया है कि बंगाल की राजनीति अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। इसे केवल सामान्य चुनावी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि मतदाता के भीतर पनप रही उस व्यापक मनोभूमि के रूप में देखा जा रहा है, जिसे कई विश्लेषक “परिवर्तन की लहर” के रूप में व्याख्यायित कर रहे हैं।

राज्य में वाम मोर्चा का शासन वर्ष 1977 से 2011 तक लगभग 34 वर्षों तक चला। इस दौरान ज्योति बसु के नेतृत्व में भूमि सुधार और श्रमिक राजनीति को बल मिला, किन्तु समय के साथ औद्योगिक ठहराव, निवेश की कमी और रोजगार के सीमित अवसर प्रमुख चुनौतियाँ बनकर उभरे।

वर्ष 2011 में सत्ता परिवर्तन के साथ ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस का उदय हुआ। “परिवर्तन” के नारे के साथ शुरू हुआ यह दौर अब डेढ़ दशक के करीब पहुँच चुका है। इस दौरान जनकल्याणकारी योजनाओं का विस्तार हुआ, किन्तु तुष्टिकरण, राजनीतिक हिंसा और प्रशासनिक पक्षपात जैसे मुद्दे भी लगातार चर्चा में रहे।

भारतीय जनता पार्टी का उभार बंगाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में सामने आया है।
आधिकारिक चुनावी आँकड़े बताते हैं कि— वर्ष 2016 में भाजपा मात्र 3 सीटों तक सीमित थी ।
वर्ष 2021 में यह संख्या बढ़कर 77 सीटों तक पहुँची। वोट प्रतिशत भी लगभग 38 प्रतिशत दर्ज किया गया । वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 42 में से 18 सीटें हासिल कर लगभग 40 प्रतिशत मत प्राप्त किए । ये आँकड़े इस बात के संकेत हैं कि राज्य में राजनीतिक आधार तेजी से परिवर्तित हो रहा है।

चुनावी परिणामों के विश्लेषण में यह स्पष्ट होता है कि एक वर्ग के मतदाताओं के बीच सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक आस्था से जुड़े प्रश्न अधिक प्रमुख हुए हैं। “हिंदुत्व” इस संदर्भ में केवल एक राजनीतिक नारा न रहकर सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श के रूप में उभरा है। हालांकि, इसे एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि पहचान आधारित राजनीति ने चुनावी रुझानों को प्रभावित किया है।

बांग्लादेश से लगती सीमा के कारण पश्चिम बंगाल लंबे समय से अवैध घुसपैठ और संसाधनों पर दबाव जैसे मुद्दों का सामना करता रहा है। हालिया चुनावों में ये विषय पुनः केंद्र में आए। मतदाताओं के एक वर्ग ने इन मुद्दों को सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन से जुड़ा प्रश्न माना, जिसे राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता मिली।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का प्रभाव भी चुनावी रुझानों में परिलक्षित होता है। उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना और जल जीवन मिशन जैसे कार्यक्रमों ने विशेषकर महिलाओं और ग्रामीण वर्ग को प्रभावित किया है। चुनाव आयोग के आँकड़ों के अनुसार, कई क्षेत्रों में महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों के बराबर या उससे अधिक दर्ज किया गया, जो इस वर्ग की निर्णायक भूमिका को दर्शाता है।

भाजपा के उभार में संगठनात्मक मजबूती भी एक प्रमुख कारक रही है। बूथ स्तर तक विस्तार, स्थानीय मुद्दों की पहचान और उन्हें व्यापक राजनीतिक विमर्श से जोड़ने की रणनीति ने इसे एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित किया।

सार्थक चिंतन : बंगाल में “कमल का खिलना” केवल एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि एक व्यापक परिवर्तन का संकेत है। इसमें सांस्कृतिक पहचान, नीतिगत प्रभाव, सत्ता विरोधी रुझान और बेहतर विकल्प की तलाश—सभी तत्व सम्मिलित हैं।
यह परिवर्तन स्थायी होगा या अस्थायी, यह आने वाला समय तय करेगा; किन्तु इतना स्पष्ट है कि बंगाल की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ मतदाता अधिक जागरूक और निर्णायक भूमिका में है। लेखक: वरिष्ठ पत्रकार एवं समसामयिक विश्लेषक, सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतन के सजग हस्ताक्षर

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