“मालव की पावन धरा से उठी सांस्कृतिक चेतना की पुकार—’ख़ान’ नहीं, ‘मालव कान्हा’ है हमारी नदी!” – मुख्यमंत्री को भेजा गया प्रस्तावनात्मक पत्र—जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व

जनमत जागरण @ देवास । इंदौर से उज्जैन तक बहती यह नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि मालवा की सांस्कृतिक अस्मिता और इतिहास की सजीव प्रतीक है। त्रिवेणी संगम में क्षिप्रा से मिलन करने वाली इस नदी को अब वह नाम वापस मिलना चाहिए, जो उसकी आत्मा से जुड़ा है—‘कान्हा’। वर्षों से ‘ख़ान’ के रूप में जानी जाने वाली यह नदी अब मालववासियों की चेतना में ‘मालव कान्हा नदी’ के रूप में पुनर्स्थापित होने को तैयार है। इसी मांग को लेकर एक महत्वपूर्ण पत्र मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को संबोधित करते हुए प्रेषित किया गया है, जिसमें जनभावनाओं की गूंज स्पष्ट सुनाई देती है।
मुख्यमंत्री को भेजा गया प्रस्तावनात्मक पत्र—जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व
7 अप्रैल 2025 सोमवार को (ज्वारे विसर्जन दिवस) सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ. बालाराम परमार ‘हँसमुख’, जो विद्या भारती मध्य क्षेत्र के सक्रिय सदस्य और मध्यप्रदेश पाठ्यपुस्तक निर्माण एवं देखरेख समिति के सदस्य भी हैं, ने प्रदेश के मुखिया को संबोधित करते हुए मांग की है कि इंदौर की ओर से आने वाली क्षिप्रा की सहायक नदी ‘ख़ान’ का नाम बदलकर “मालव कान्हा नदी” कर दिया जाए।
पत्र में उल्लेख है कि इस नदी का प्राचीन नाम ‘कान्हा’ रहा है, जो कालांतर में ‘ख़ान’ में परिवर्तित हो गया। यह परिवर्तन न केवल ऐतिहासिक असत्य है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के प्रति अनदेखी भी दर्शाता है। डॉ. परमार ने इस नाम परिवर्तन को आगामी सिंहस्थ जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन के मद्देनज़र एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की संज्ञा दी है।
एक नाम—जो करेगा पुनर्स्थापना मालव की पहचान की
“मालव कान्हा नदी” नाम केवल एक संशोधन नहीं, बल्कि यह मालवा की परंपरा, पौराणिकता और ऐतिहासिक मूल्यों की पुनर्पुष्टि है। यह नाम भगवान श्रीकृष्ण के ‘कान्हा’ रूप से जुड़कर न केवल धार्मिक भावनाओं को जोड़ता है, बल्कि उज्जयिनी के त्रिवेणी संगम, सम्राट विक्रमादित्य, राजा भोज और सांदीपनि आश्रम जैसे ऐतिहासिक स्थलों के गौरव को भी पुनर्जीवित करता है।
मुख्यमंत्री से की गई विशेष अपील
डॉ. परमार ने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि वे इस प्रस्ताव को न केवल स्वीकृति दें, बल्कि स्वयं सार्वजनिक रूप से इस नाम परिवर्तन की घोषणा करें, जिससे यह संदेश प्रदेश ही नहीं, देशभर में पहुंचे। उनका कहना है कि यह निर्णय न केवल मालवा की जनता के आत्मसम्मान को ऊंचा करेगा, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को अपनी मूल पहचान से जोड़ने का कार्य भी करेगा।
एक सार्थक पहल की प्रतीक्षा में—जनमत की शक्ति से उठी आवाज
अब यह देखना शेष है कि क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इस सांस्कृतिक याचना को स्वीकार करते हैं और ‘ख़ान’ को उसका खोया हुआ ‘कान्हा’ नाम लौटा कर मालवा की चेतना को नवजीवन प्रदान करते हैं। एक नदी का नाम, एक क्षेत्र की आत्मा बन सकता है—बस आवश्यकता है उसे पहचानने और उसका सम्मान करने की।
जनमत जागरण की विशेष रिपोर्ट



