इंदौरदेशमध्यप्रदेशसंघ शाताब्दी वर्ष

MP सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत लेपा (कसरावद) में बोले— भारत केवल भूगोल नहीं, सेवा और कर्म ही भारत का स्वभाव

  • जब सेवा स्वभाव बने, तभी राष्ट्र गढ़ता है भारत— परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत
  • जनमत जागरण @ कसरावद/ इंदौर | भारत को यदि केवल मानचित्र में खोजा जाए, तो वह सीमाओं तक सिमट जाता है; किंतु जब भारत को उसके स्वभाव में देखा जाए, तब वह सेवा, संवेदना और समग्र कल्याण की चेतना बनकर सामने आता है। यही भारत का मूल है, यही उसकी आत्मा। इसी चेतना का सजीव उद्घोष उस समय हुआ, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कसरावद के लेपा स्थित श्री रामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन में आयोजित विचार-प्रेरक कार्यक्रम में राष्ट्र और मानवता के गहरे सूत्रों को शब्द दिए।
  • अपने प्रेरक उद्बोधन में परम पूजनीय सरसंघचालक जी ने कहा—
  • “भारत केवल भूगोल नहीं, अपितु सेवा, कर्म और सभी के कल्याण का स्वभाव है।”
  • उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारे सांस्कृतिक जीवन में चैरिटी की अवधारणा नहीं, बल्कि सेवा का भाव है। जब हम किसी की सहायता करते हैं, तो वह उपकार नहीं, बल्कि हमारा धर्म होता है। सेवा से केवल समाज नहीं, स्वयं मनुष्य की भी शुद्धि होती है। जिसके पास जो है, वही उसका दान है—यही भारतीय जीवन दृष्टि है।
  • सरसंघचालक जी ने कहा कि मनुष्य बोलने या सुनने से नहीं, बल्कि देखकर सीखता है। भारत की दीर्घ यात्रा इस सत्य की साक्षी है कि सुख बाहर की वस्तु नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर स्थित है। भारत ने मनुष्य को आत्मअन्वेषण की राह दिखाई—जहाँ से शाश्वत सुख की अनुभूति होती है। हमारे पूर्वजों ने अनुभव के आधार पर यह बताया कि माया का आधार अध्यात्म होना चाहिए, क्योंकि संवेदना ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है। किसी की उपेक्षा कर सुख भोगना भारतीय चेतना का हिस्सा नहीं हो सकता।
  • उन्होंने शिक्षा के भारतीय संदर्भ को रेखांकित करते हुए कहा कि मनुष्य के भीतर जन्मांतर का ज्ञान विद्यमान है, आवश्यकता केवल उसे बाहर लाने की है। टंट्या मामा और गाडगे महाराज जैसे महापुरुषों ने औपचारिक शिक्षा भले न ली हो, परंतु उनका जीवन स्वयं शिक्षा का विश्वविद्यालय है। वास्तविक शिक्षा वही है जो विश्व मानवता का बोध कराए, आत्मनिर्भर बनाए और श्रम की प्रतिष्ठा सिखाए। भारत व्यक्ति से अधिक कर्म को, और परिणाम से अधिक प्रामाणिक व उत्कृष्ट प्रयास को महत्व देता है—यही भारत का स्वभाव है।
  • परम पूजनीय सरसंघचालक जी ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की उन्नति का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि जल, जंगल, नदी, पर्वत, पशु और मनुष्य—सभी की समग्र उन्नति है। जब जीवन में शिक्षा, शुचिता और सेवा का समन्वय होता है, तभी राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।
  • इस अवसर पर निमाड़ अभ्युदय रूरल मैनेजमेंट एंड डेवलपमेंट एसोसिएशन एवं श्री रामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस विचार-प्रेरक कार्यक्रम में ‘मनुष्य निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ विषय पर यह उद्बोधन हुआ। कार्यक्रम में “गोष्ट-नर्मदालयाची” ऑडियोबुक का विमोचन भी संपन्न हुआ।
  • उल्लेखनीय है कि श्री रामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन पिछले 15 वर्षों से शिक्षा एवं कौशल विकास के क्षेत्र में कार्यरत है। संस्थान वनवासी अंचलों के कुपोषित बच्चों के लिए कक्षा दसवीं तक की शिक्षा एवं बेसिक रूरल टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा की व्यवस्था कर रहा है। वर्तमान में निमाड़ अभ्युदय के विद्यालयों में लगभग 800 से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं।
  • संस्थान की स्थापना का संकल्प सुश्री भारती ठाकुर दीदी ने अपनी नर्मदा परिक्रमा के दौरान लिया। रक्षा मंत्रालय की सेवा छोड़कर उन्होंने वनवासी बच्चों के शिक्षा-सपने को जीवन का उद्देश्य बनाया। नागा साधुओं के पुनर्वास हेतु प्राप्त आश्रम भूमि पर आज यह प्रकल्प गौशाला सहित सामाजिक सेवा का जीवंत केंद्र बन चुका है।
  • प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव (17–20 जनवरी) के उपरांत परम पूजनीय सरसंघचालक जी का यह प्रवास केवल औपचारिक नहीं, बल्कि सेवा-साधना से जुड़े इन प्रयासों के प्रति उनके आत्मीय स्नेह और मार्गदर्शन का प्रतीक बना।

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