सुसनेर नगर परिषद में ई-रिक्शा खरीद घोटाला, 16 लाख अतिरिक्त भुगतान की जांच— EOW ने दर्ज किया मामला

“जेम पोर्टल से खरीद, फिर भी विवाद” 👉 जानिए, सुसनेर नगर परिषद में भुगतान को लेकर क्यों उठे गंभीर प्रश्न
जनमत जागरण @ सुसनेर से दीपक जैन की रिपोर्ट।
आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) भोपाल द्वारा दर्ज शिकायत क्रमांक 85/2024 की जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। वर्ष 2023 में नगर परिषद सुसनेर द्वारा 5 नग ई-रिक्शा खरीद में बाजार मूल्य से लगभग तीन गुना अधिक दर पर भुगतान कर जनता की गाढ़ी कमाई को नुकसान पहुंचाया गया।
जांच में सामने आया कि एक ई-रिक्शा की कीमत 4,81,200 रुपये दर्शाई गई, जबकि विभागीय जांच में उसी ब्रांड का बाजार मूल्य मात्र 1,57,142 रुपये पाया गया। यानी प्रति ई-रिक्शा 3,24,057 रुपये अधिक भुगतान किया गया। कुल 5 ई-रिक्शा की खरीद में 16,20,285 रुपये की अतिरिक्त राशि का भुगतान होना प्रमाणित हुआ है।
कैसे खेला गया खेल?
प्रेस नोट के अनुसार जेम पोर्टल के माध्यम से निविदा प्रक्रिया अपनाई गई, लेकिन जांच में पाया गया कि बाजार दर की तुलना किए बिना ऊंची दर पर अनुबंध किया गया। आरोप है कि तत्कालीन मुख्य नगर पालिका अधिकारी और अध्यक्ष सहित अन्य जिम्मेदार पदाधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए यह खरीद की।
यही नहीं, वर्ष 2022 में 44 हाथ कचरा गाड़ी की खरीद में भी 3,57,138 रुपये की राशि में निविदा प्रक्रिया का पालन नहीं करने और लेखा नियमों के उल्लंघन की पुष्टि हुई है।

- किन धाराओं में मामला दर्ज?
- प्रारंभिक जांच के आधार पर आरोपियों के विरुद्ध
- धारा 409, 120-B भारतीय दंड संहिता
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) की धारा 13(1)(ए) एवं 13(2)
- के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना की जा रही है।
आरोपित कौन?
श्रीमती लक्ष्मी राहुल सिसोदिया, अध्यक्ष, नगर परिषद सुसनेर , तत्कालीन CMO जगदीश भैरवे अन्य संबंधित पदाधिकारी
राजनीति और जनता की कमाई का गणित
यह मामला केवल 16 लाख रुपये का नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें जनप्रतिनिधि और अधिकारी मिलकर योजनाओं को “कमाई का जरिया” बना लेते हैं।
जब एक ई-रिक्शा बाजार में डेढ़ लाख का उपलब्ध हो और खरीदा जाए लगभग पांच लाख में — तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि वित्तीय नैतिकता पर प्रश्नचिह्न है।
जनता टैक्स देती है विकास के लिए —
लेकिन यदि वही पैसा राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़ की भेंट चढ़ जाए, तो योजनाएं भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बन जाती हैं।
अब बड़ा सवाल
क्या यह सिर्फ एक नगर परिषद की कहानी है?
या फिर यह मॉडल अन्य स्थानों पर भी दोहराया जा रहा है?
EOW की कार्रवाई ने फिलहाल सुसनेर में हलचल मचा दी है। आगे की विवेचना में और नाम सामने आ सकते हैं।
✍️ सार्थक दृष्टिकोण
जवाबदेही केवल कागज़ों की नहीं, चरित्र की भी होनी चाहिए
सुसनेर नगर परिषद में सामने आया वित्तीय प्रकरण केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं है; यह उस तंत्र की मानसिकता को उजागर करता है, जिसमें जिम्मेदारी अक्सर पद के साथ समाप्त हो जाती है और जवाबदेही जांच के हवाले कर दी जाती है।
यदि बाजार मूल्य और भुगतान में भारी अंतर है, तो यह प्रश्न केवल अधिकारी तक सीमित नहीं रह सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्णय कभी अकेले नहीं होते
— उनके पीछे अनुमोदन, मौन समर्थन और राजनीतिक संरचना की परछाईं भी होती है।
जब से नगर परिषद अस्तित्व में आई है, तब से विवादों की पुनरावृत्ति यह संकेत देती है कि समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि व्यवस्था की सतत निगरानी की कमी की है। जिला और प्रदेश स्तर के नेतृत्व की भूमिका यहाँ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि जनता उन्हें केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए चुनती है।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा संकट भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि संवेदनहीन मौन है।
यदि जनप्रतिनिधि और संगठनात्मक नेतृत्व समय रहते हस्तक्षेप न करें, तो जांच एजेंसियों की कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है।
अब आवश्यकता आरोप तय करने से अधिक उस नैतिक साहस की है, जो यह स्वीकार कर सके कि जनता का पैसा “योजना” नहीं, “विश्वास” होता है। और विश्वास टूटे तो उसकी भरपाई केवल स्पष्टीकरण से नहीं, बल्कि पारदर्शी कार्रवाई से होती है। — राजेश कुमरावत ‘सार्थक’



