सुसनेर में कानून व्यवस्था चुनौतीपूर्ण: केशर राजपूत का स्थानांतरण, अक्षय सिंह बेस ने संभाला प्रभार; एक सप्ताह में कई बड़ी वारदातें

सुसनेर में बदली कमान, चुनौतियों से घिरा थाना
जनमत जागरण @ सुसनेर। क्षेत्र की लगातार बिगड़ती कानून व्यवस्था के बीच सुसनेर थाने की कमान बदल दी गई है। थाना प्रभारी केशर राजपूत का स्थानांतरण कर उन्हें आगर महिला थाना भेजा गया है। पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार सिंह द्वारा जारी आदेश के बाद अब सुसनेर थाने की जिम्मेदारी अक्षय सिंह बेस को सौंपी गई है। उन्होंने सोमवार को विधिवत प्रभार ग्रहण कर लिया।
लेकिन यह पदभार महज़ प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि चुनौतियों से भरा दायित्व है। जिस समय नई कमान संभाली गई है, उस समय क्षेत्र लगातार आपराधिक घटनाओं से सुर्खियों में है।

🔴 प्रभार संभालते ही फिर फायरिंग
मंगलवार शाम नगर में एक बार फिर फायरिंग की घटना सामने आई। पुरानी रंजिश के चलते विजय (20) पर गोली चलाई गई, जो उसके पैर में लगी। प्राथमिक उपचार के बाद उसे जिला अस्पताल रैफर किया गया। पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि वारदात में सेल्फ मेड हथियार का उपयोग हुआ।
गौरतलब है कि घायल युवक पूर्व में भी फायरिंग की एक घटना में शामिल बताया जा रहा है। एक सप्ताह में यह दूसरी-तीसरी फायरिंग की घटना है, जिससे अवैध हथियारों की उपलब्धता और खरीद-फरोख्त पर सवाल उठ रहे हैं।

अब देखना यह होगा कि नवागत थाना प्रभारी अक्षय सिंह बेस क्षेत्र की डगमगाती कानून व्यवस्था को सख्ती और रणनीति से पटरी पर ला पाते हैं या हालात यथावत बने रहते हैं।
– दीपक जैन, संवाददाता, सुसनेर
✍️ सुसनेर में बदलती कुर्सी या बदलती व्यवस्था?
सुसनेर में थाना प्रभारी का स्थानांतरण प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल कुर्सी बदलने से हालात बदल जाते हैं?
पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से सुसनेर क्षेत्र का नाम फायरिंग, हत्या, मारपीट, चोरी, ड्रग्स तस्करी और अवैध हथियारों की घटनाओं से जुड़ा है, वह केवल कानून व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतावनी भी है। एक सप्ताह में लगातार फायरिंग की घटनाएँ, सेल्फ मेड हथियारों का उपयोग, और खुलेआम आपराधिक दुस्साहस — यह संकेत देते हैं कि अपराधियों में भय कम और दुस्साहस अधिक है।
प्रशासन ने त्वरित कदम उठाते हुए थाना प्रभारी का स्थानांतरण किया है। नवागत अधिकारी के सामने चुनौतियाँ स्पष्ट हैं —
लंबित मामलों का खुलासा
अवैध हथियारों की जड़ तक पहुँचना
ड्रग्स और सट्टे के नेटवर्क पर निर्णायक प्रहार
यातायात और नगरीय अनुशासन की बहाली
और सबसे महत्वपूर्ण — जनता का विश्वास पुनः स्थापित करना
परंतु यहाँ एक मूल प्रश्न खड़ा होता है —
क्या अपराध केवल पुलिस की विफलता से जन्म लेते हैं?
या समाज की मौन स्वीकृति भी उन्हें शक्ति देती है?
जब जुआ-सट्टा खुलेआम चलता है, जब अवैध शराब और नशे का कारोबार “सब जानते हैं” की मानसिकता में फलता-फूलता है, जब गली-मोहल्लों में असामाजिक तत्वों को सामाजिक समर्थन या मौन सहमति मिलती है — तब केवल एक थाना प्रभारी से चमत्कार की अपेक्षा करना भी यथार्थ से परे है।
सुसनेर को केवल सख्ती नहीं, सामूहिक सजगता की आवश्यकता है।
पुलिस की सक्रियता, प्रशासन की निगरानी और समाज की सहभागिता — इन तीनों का संतुलन ही स्थायी समाधान दे सकता है।
नवागत थाना प्रभारी के लिए यह पदस्थापना केवल एक प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि एक अग्निपरीक्षा है।
और समाज के लिए यह अवसर है — यह तय करने का कि वह तमाशबीन रहेगा या सहभागी बनेगा।
अब देखना यह है कि सुसनेर में बदली हुई कमान, व्यवस्था में बदलाव का कारण बनती है या फिर घटनाओं की सूची में एक और नाम जुड़ता है।
— राजेश कुमरावत ‘सार्थक’



