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“सुसनेर के मोड़ी में 2.43 करोड़ का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र एक साल से बंद, मरीज 15 किमी दूर जाने को मजबूर”

घोषणा से हकीकत तक अधूरी सेहत: 2.43 करोड़ का भवन वीरान, मरीज भटकने को मजबूर


जनमत जागरण @ सुसनेर/आगर-मालवा

ऑन द स्पॉट स्पेशल ग्राउंड रिपोर्ट

चुनावी मंचों से विकास की घोषणाएँ तालियों की गड़गड़ाहट में गूंजती हैं, लेकिन जब वही घोषणाएँ धरातल पर सन्नाटे में बदल जाएँ तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

आगर जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर सुसनेर विधानसभा क्षेत्र की मोड़ी ग्राम पंचायत में बना 2 करोड़ 43 लाख रुपए की लागत का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र इसका ताज़ा उदाहरण है — भवन तैयार, विभाग को हैंडओवर, लेकिन दरवाजे अब भी बंद।
विधानसभा चुनाव के दौरान निकली जनआशीर्वाद यात्रा में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूर्व विधायक मुरलीधर पाटीदार की मांग पर मोड़ी को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की सौगात दी थी। वर्ष 2023-24 में भवन बनकर तैयार हो गया और जनवरी 2025 में स्वास्थ्य विभाग को हैंडओवर भी कर दिया गया।
लेकिन विडंबना देखिए — एक साल बाद भी यह भवन एक चौकीदार के भरोसे वीरान खड़ा है।

🇨🇭 घोषणा से हकीकत तक — जनमत की पड़ताल 🔥 2.43 करोड़ का भवन, एक साल से बंद 👉 जहाँ डॉक्टर आने थे, वहाँ घास पहले पहुँच गई


🏥 इलाज के लिए 15 किमी की मजबूरी


मोड़ी और आसपास के ग्रामीणों को आज भी 12 से 15 किलोमीटर दूर सुसनेर सिविल अस्पताल या आगर जिला अस्पताल जाना पड़ता है।
छोटी बीमारी हो या गंभीर दुर्घटना, प्रसव पीड़ा हो या आपात स्थिति — हर बार मरीजों को दूरी, समय और जोखिम का सामना करना पड़ता है।
गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए यह दूरी कई बार जीवन-मरण का सवाल बन जाती है।


📂 प्रशासनिक उदासीनता या सिस्टम की सुस्ती?


भवन बन चुका है, हैंडओवर हो चुका है, बजट खर्च हो चुका है — फिर देरी किस बात की?
क्या स्टाफ की कमी है?
क्या उपकरण उपलब्ध नहीं?
या फिर फाइलें अब भी दफ्तरों में घूम रही हैं?
जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।


🏛 अब किसकी जिम्मेदारी?


आज सवाल केवल भवन का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है।
पूर्व मुख्यमंत्री की घोषणा साकार हुई, पूर्व विधायक का प्रयास सफल हुआ, लेकिन वर्तमान में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे विधायक भेरू सिंह परिहार के सामने यह एक बड़ा जनहित का मुद्दा बन चुका है।
क्या इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया जाएगा?
क्या स्वास्थ्य विभाग समयसीमा तय करेगा?


⚠ वीरान भवन, असामाजिक गतिविधियों का खतरा


स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि बंद भवन के आसपास असामाजिक तत्वों की गतिविधियाँ बढ़ने लगी हैं। करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति यदि इसी तरह बंद रही तो यह सरकारी संसाधनों की बर्बादी का प्रतीक बन जाएगी।

🔎 अब नजर कार्रवाई पर
दोनों जनप्रतिनिधियों ने पहल का आश्वासन दिया है, लेकिन क्षेत्रवासियों की नजर अब आश्वासन से आगे वास्तविक कार्रवाई पर टिकी है।
करीब एक वर्ष से भवन बंद है, ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या प्रशासन ने जनप्रतिनिधियों को स्थिति से अवगत कराया था या नहीं?

सार्थक दृष्टिकोण

ताला स्वास्थ्य पर या सिस्टम की संवेदनहीनता पर?”

मोड़ी का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आज एक ऐसी कहानी कह रहा है, जिसमें “ढाक के तीन पात” वाली स्थिति नजर आती है। घोषणा हुई, शिलान्यास हुआ, निर्माण हुआ, हैंडओवर हुआ — लेकिन इलाज शुरू नहीं हुआ।2 करोड़ 43 लाख रुपये की लागत से बना भवन आज भी ताले में बंद है। यह दृश्य उस कहावत की याद दिलाता है — “ऊँची दुकान, फीका पकवान।”

बाहर से सर्वसुविधायुक्त भवन, अंदर सन्नाटा। जनआशीर्वाद यात्रा में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जो सौगात दी थी, वह कागजों पर साकार हो गई। पूर्व विधायक मुरलीधर पाटीदार का प्रयास भी सफल हुआ। वर्तमान विधायक भेरू सिंह परिहार ने भी पहल का आश्वासन दिया है। तो फिर सवाल यह है कि गाड़ी किस मोड़ पर आकर रुक गई? यह स्थिति कहीं न कहीं प्रशासनिक व्यवस्था की उस प्रवृत्ति को उजागर करती है जहाँ “नौ दिन चले अढ़ाई कोस” वाली गति दिखाई देती है।

भवन खड़ा है, चौकीदार तैनात है, लेकिन डॉक्टर नहीं। दीवारें चमक रही हैं, लेकिन स्टेथोस्कोप की आवाज नहीं। स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील सेवा में देरी केवल कागजी नहीं होती — उसका असर सीधे जीवन पर पड़ता है। गर्भवती महिला जब 15 किलोमीटर दूर अस्पताल जाने को मजबूर होती है, तब यह केवल दूरी नहीं, बल्कि व्यवस्था की दूरी बन जाती है।

यह सवाल किसी एक सरकार, एक विधायक या एक अधिकारी का नहीं है। यह उस सोच का है जहाँ “काम पूरा” और “सेवा शुरू” के बीच की खाई को गंभीरता से नहीं लिया जाता। जनता अब आश्वासन नहीं, परिणाम चाहती है। क्योंकि स्वास्थ्य सेवा में देरी का मतलब है —“समय पर दवा नहीं, तो इलाज भी बेअसर।”मोड़ी का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र केवल एक भवन नहीं, बल्कि प्रशासन की परीक्षा है।

अब देखना यह है कि यह परीक्षा समय पर पास होती है या फिर यह भी विकास की अधूरी इबारत बनकर रह जाती है। - राजेश कुमरावत 'सार्थक'

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