रक्षाबंधन विशेष: 46 साल से जैन-मुस्लिम भाई-बहन का रिश्ता, सुसनेर की अनोखी मिसाल
सुसनेर में 46 साल से कायम है जैन-मुस्लिम भाई-बहन का रिश्ता, दूसरी मिसाल में 19 साल से जैन परिवार को मायका मान रही मुस्लिम महिला

जनमत जागरण @ सुसनेर से दीपक जैन की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट । राखी का धागा भले ही कच्चा होता है, लेकिन जब उसमें विश्वास और अपनत्व की गांठ बंध जाए तो वह रिश्ते को जिंदगीभर के लिए मजबूत कर देता है। धर्म और मजहब की पहचान से ऊपर उठकर बने रिश्तों की ऐसी ही दो अनूठी मिसालें आगर-मालवा जिले के सुसनेर में देखने को मिलती हैं। यहां एक जैन और मुस्लिम परिवार के बीच 46 वर्षों से भाई-बहन का रिश्ता कायम है, वहीं दूसरी ओर एक मुस्लिम महिला पिछले 19 वर्षों से जैन परिवार को अपना मायका मानकर हर रक्षाबंधन पर भाई को राखी बांध रही है। ये रिश्ते सिर्फ राखी के एक दिन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सुख-दुख और हर त्योहार में एक-दूसरे के साथ खड़े रहने की जीवंत मिसाल बन चुके हैं।
46 साल पहले दोस्ती ने लिया भाई-बहन के रिश्ते का रूप
नगर के शुक्रवारिया बाजार निवासी स्व. चांदमल जैन और दीवानजी की गली निवासी सलीम लाला के परिवारों के बीच यह रिश्ता करीब 46 वर्ष पुराना है। चांदमल जैन के बेटे दिनेश जैन बताते हैं कि उनके पिता और सलीम लाला बचपन के जिगरी दोस्त थे। दोनों परिवारों के बीच वर्षों से घर जैसा आना-जाना था।
वर्ष 1980 में सलीम लाला की पत्नी अकीला और फरीदा ने चांदमल जैन को राखी बांधकर अपना मुंहबोला भाई बनाया। यहीं से दो परिवारों की दोस्ती ने भाई-बहन के रिश्ते का रूप ले लिया।
इसके बाद यह रिश्ता केवल रक्षाबंधन तक सीमित नहीं रहा। दीपावली हो या ईद, भाईदूज हो या परिवार का कोई मांगलिक अवसर—दोनों परिवार एक-दूसरे के घर पहुंचते रहे। शादी-विवाह से लेकर सुख-दुख तक दोनों परिवारों ने एक-दूसरे का साथ निभाया।
आज चांदमल जैन इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके जाने के बाद भी यह रिश्ता खत्म नहीं हुआ। अगली पीढ़ी ने भी इसे उसी आत्मीयता के साथ संभालकर रखा है। इस वर्ष भी रक्षाबंधन पर दोनों परिवार इस परंपरा को आगे बढ़ाएंगे।
मुस्लिम महिला ने जैन परिवार को बनाया अपना मायका
सुसनेर की दूसरी कहानी भी रिश्तों की इसी खूबसूरती को सामने लाती है।
पुराना बस स्टैंड क्षेत्र निवासी पूर्व पार्षद एवं किराना व्यापारी इस्माइल मंसूरी की पत्नी परवीन मंसूरी का वास्तविक मायका उज्जैन में है, लेकिन पिछले 19 वर्षों से रक्षाबंधन के अवसर पर उन्हें अपने भाई के घर आने के लिए उज्जैन जाने की जरूरत महसूस नहीं होती।
स्टेट बैंक चौराहा निवासी दिनेश जैन का व्यापारिक काम के सिलसिले में परवीन मंसूरी के परिवार में आना-जाना था। इसी दौरान दिनेश जैन और परवीन के बीच भाई-बहन जैसा स्नेह विकसित हुआ। वर्ष 2006 में परवीन ने दिनेश जैन को राखी बांधकर अपना भाई बना लिया।
तब से हर रक्षाबंधन पर यह सिलसिला जारी है। परवीन अपने भाई दिनेश जैन के घर पहुंचकर राखी बांधती हैं और दिनेश भी भाई होने का हर फर्ज निभाते हैं। इस वर्ष भी रक्षाबंधन पर परवीन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने पहुंचेंगी।
रिश्ते धर्म देखकर नहीं, दिल देखकर बनते हैं
सुसनेर की ये दोनों कहानियां उस सामाजिक ताने-बाने की तस्वीर पेश करती हैं, जिसमें इंसान की पहचान उसके धर्म से पहले उसके रिश्तों और व्यवहार से होती है। जहां एक ओर समाज में धार्मिक पहचान को लेकर दूरी की बातें सामने आती हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसे परिवार भी हैं जो दशकों से प्रेम, विश्वास और भाईचारे की डोर को मजबूती से थामे हुए हैं।
रक्षाबंधन का असली संदेश भी शायद यही है—राखी केवल कलाई पर बंधने वाला धागा नहीं, बल्कि विश्वास, सुरक्षा, सम्मान और अपनत्व का संकल्प है।
सुसनेर के इन परिवारों ने इस संकल्प को किसी एक दिन नहीं, बल्कि 46 और 19 वर्षों की अपनी जिंदगी में निभाकर दिखाया है।
मजहब अलग हो सकता है, लेकिन रिश्तों की भाषा एक ही होती है—अपनापन।









