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आंख बन्द हो तो परमात्मा के भजन एवं आंख खुले तो गोमाता की सेवा ये दो ही मार्ग परम पद प्राप्ति के है – स्वामी अमृतानंद

जनमत जागरण @ सुसनेर। भारत के एक उत्कृष्ट राजनेता के रूप में याद किये जाने वाले एक ईमानदार एवं कर्मठ व्यक्तित्व के धनी है लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को आज ही के दिन उत्तर प्रदेश के मुगलसराय कस्बे में हुआ था. उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे, जिनका निधन तब हो गया जब शास्त्री सिर्फ डेढ़ साल के थे । लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री रहे हैं। वह अपने सरल स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। देश के प्रति समर्पण और सद्भाव उनकी अलग पहचान थे। शास्त्री ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और देश का मजबूत नेतृत्व प्रदान किया, विशेषकर 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान उनकी भूमिका को याद किया जाता है। साथ ही, जय जवान, जय किसान उनका ही दिया हुआ नारा है और लाल बहादुर शास्त्री अगर भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री होते तो आज भारत का नक्शा अलग ही होता । श्राद्ध के अन्तिम दिवस सर्व पितृदेव कार्य अमावस्या पर स्वामीजी ने बताया कि अगर किन्हीं को अपने पित्रों की तिथि व नाम ज्ञात न हो तो सर्व पितृदेव कार्य अमावस्या को उन सभी ज्ञात अज्ञात पितृदेवो का तर्पण किया जा सकता है और ये तर्पण किसी गोशाला में गोपुच्छ तर्पण पद्धति से किया जाएं तो इससे पितृ देवता बहुत संतुष्ट होते है। उक्त बातें एक वर्षीय वेदलक्षणा गो आराधना महामहोत्सव के 177 वे दिवस के अवसर पर श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज ने कही।
🚩 सर्व पितृ देवकार्य अमावस्या को वृषोत्सर्ग की महिमा का वर्णन करते हुए स्वामीजी ने बताया कि आज के दिन वृषोत्सर्ग करने पर सभी पितृ तृप्त हो जाते है ।
ऋषि मुनियों ने प्राचीन समय से ही हमारे शास्त्र पुराणों में वृषोत्सर्ग की इतनी महिमा बताई है कि एक पुष्ट नंदीबाब जिनकी माता हस्ट पुष्ट हो और हर वर्ष व्याहती हो और जिनका दूध सुगंधित और गाढ़ा हों ऐसी गोमाता के नन्दी का वृषोत्सर्ग किया जाएं तो उसका फल कही शहस्त्र गुणा मिलता है । और एक नन्दी के साथ 10 बछड़ियो के साथ वृषोत्सर्ग करने का फल एक हजार गोमाता के दान के बराबर माना गया है ।

🚩177 वें दिवस पर पूज्य स्वामी अमृतानंद जी, श्री कृष्णायन देसी गौरक्षा शाला, हरिद्वार/ग्वालियर/उज्जैन/इंदौर व ब्रह्मचारी हर्षित जी महाराज का आशीर्वाद मिला ।
🚩 पूज्य स्वामी अमृतानंद जी महाराज ने अपने आशीर्वचन में बताया कि गायमाता पूर्ण थी,पूर्ण है और पूर्ण रहेगी । गायमाता की कृपा करे तो हमारे गुरु भगवान ने तो हमें दो ही बात कही है कि आंख बन्द हो तो परमात्मा के भजन एवं आंख खुले तो गोमाता की सेवा । इसके अलावा कुछ करने की जरूरत नही है क्योंकि मोक्ष प्राप्ति करनी है तो उसमें गोमाता की सेवा श्रेष्ठ है,उससे अपने लक्ष्य की। प्राप्ति सहज रूप से प्राप्त हो जाती है। गोमाता की सेवा एवं परमात्मा का भजन दोनो एक ही है बस रास्ता अलग अलग दिख रहा है अर्थात एक निष्काम कर्मयोग है और दूसरा ज्ञान योग या ध्यान योग। मगर मंजिल एक ही है यानि जब हम संन्यासियों को गायमाता की सेवा से परमपद की प्राप्ति हो जाती है तो फिर गृहस्थ धर्म का पालन करने वालों की तो भगवती गोमाता सभी मनोकामनाओं की पूर्ति कर देती है और अन्त में वह परम पद को प्राप्त कराती है जिसके अनेको दृष्टांत हमारे धर्म ग्रंथों में है ।
  • सर्व पितृ अमावस्या पर नारायण भाई देसाई, हिम्मत नगर गुजरात, गोकुल सिंह, पुर सिंह परमार बायरा ने अपने दादा स्व.रामलाल एवं हरि सिंह, उज्जैन के अरुण अग्रवाल व मदसौर के बड़ा गांव आलोट के मेहरबान सिंह एवं हरियाणा के सोनीपत निवासी संजीव बेनीवाल स्व .मेहताब सिंह व संजीव दहिया ने अपने सभी पितृ देवो का गो पुच्छ तर्पण के माध्यम से श्राद्ध कर्म करवाया

⏩ जीरापुर के गोरधन लाल बैरिस्टर के सुपोत्र एवं विजय कुमार बैरिस्टर के सुपुत्र नीव के जन्मोत्सव के उपलक्ष में एक वृक्षारोपण करवाया साथ ही पितृ अमावस्या के निमित्त गोविंद राजू डीडवानी वाशिम महाराष्ट्र ने भी एक वृक्षारोपण किया । रमेश खानपुर,नाथूलाल रूपपुरा,हेमराज कोटा,भारत प्रजापत सुसनेर,अनिल प्रजापति नलखेड़ा,एवं एक्सिस बैंक सुसनेर के प्रबंधक अभिषेक माथुर आदि अतिथि उपस्थित रहें ।

⏩177 वे दिवस पर चुनरी यात्रा हरियाणा एवं गुजरात से ::  एक वर्षीय गोकृपा कथा के 177 वें दिवस पर हरियाणा के सोनीपत के संजीव बेनीवाल एवं गुजरात के हिम्मतनगर के नारायण भाई देसाई के परिवार की ओर से देश, राज्य एवं ग्राम, नगर के जन कल्याण के लिए गाजे बाजे के साथ भगवती गोमाता के लिए चुनरी लेकर पधारे और कथा मंच पर विराजित भगवती गोमाता को चुनरी ओढ़ाई एवं गोमाता का पूजन कर स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज से आशीर्वाद लिया और अंत में सभी ने गो पूजन करके यज्ञशाला की परिक्रमा एवं गोष्ठ में गोसेवा करके सभी ने गोव्रती महाप्रसाद ग्रहण किया।

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