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Expose : सिविल अस्पताल या ‘सिम्बल’ अस्पताल? डॉक्टरों की कमी ने खोली पोल..! , सुविधाएं हाईटेक, पर डॉक्टरों के बिना सब कुछ ‘वेस्ट’

◾122 गांवों की उम्मीदें, पर डॉक्टरों के बिना अस्पताल बेहाल! ◾करोड़ों खर्च, पर इलाज के लिए डॉक्टर ही नहीं! ◾ सुसनेर अस्पताल: इमारत शानदार, स्वास्थ्य सेवाएं बेकार!

जनमत जागरण @ सुसनेर से हमारे रिपोर्टर की इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट । 122 गांवों की सेहत की जिम्मेदारी उठाने वाला सुसनेर का सिविल अस्पताल आज खुद “बीमार” है। करोड़ों के संसाधन और चमचमाते भवन के बावजूद यहां डॉक्टरों की कमी ने इसे एक शानदार इमारत से ज्यादा कुछ नहीं छोड़ा। हालात ये हैं कि डेढ़ लाख की आबादी के इस अस्पताल को महज 5 डॉक्टर ही खींच रहे हैं, जिनमें से एक तो ऑफिस फाइलों में उलझे रहते हैं।

9 करोड़ खर्च, पर इलाज के लिए लंबी लाइन :: पूर्व विधायक राणा विक्रमसिंह की मेहनत से सिविल अस्पताल का दर्जा पाने वाले इस केंद्र में कभी विकास की उम्मीदें पनपी थीं। लेकिन अब ये उम्मीदें डॉक्टरों की कमी के कारण मुरझा चुकी हैं। यहां 12 डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन तैनाती मात्र 5 की हुई है। नतीजा? 350-400 ओपीडी मरीजों और 25-30 भर्ती मरीजों का सारा भार इन्हीं 4-5 डॉक्टरों के कंधों पर है।

“डॉक्टर साहब छुट्टी पर हैं, प्लीज इंतजार करें!” :: पिछले दिनों डोंगरगांव गांव में आत्महत्या मामले में पोस्टमार्टम के लिए परिजन घंटों इंतजार करते रहे। आखिरकार, जनप्रतिनिधियों के दखल के बाद पोस्टमार्टम हुआ। डॉक्टरों की कमी का खामियाजा अस्पताल के स्टाफ को भी भुगतना पड़ा – दो डॉक्टरों को नोटिस थमा दिया गया।

जनप्रतिनिधि और आंदोलन भी ‘नाकाफी’ :: पत्रकारों के आंदोलन और कई ज्ञापन देने के बाद भी हालात जस के तस हैं। श्रमजीवी पत्रकार संघ ने यहां डॉक्टरों की तैनाती के लिए प्रदर्शन, पुतला दहन तक किया। लेकिन अस्पताल को स्थायी समाधान नहीं मिला। डॉक्टर अटैचमेंट तो हुए, मगर कुछ समय बाद अस्पताल फिर डॉक्टर विहीन हो गया।

क्या सुविधा, क्या संसाधन – सब “डिब्बा बंद”। :: चमचमाती मशीनें और संसाधन मरीजों को सिर्फ झांकने के लिए उपलब्ध हैं। असलियत ये है कि आपातकालीन स्थिति में मरीजों को दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है। इलाज की ये “दूरी” गरीब मरीजों के समय और पैसे दोनों पर भारी पड़ रही है।

प्रभारी मंत्री के आश्वासन, पर कब होगी नियुक्ति? :: हाल ही में प्रभारी मंत्री नागरसिंह चौहान को जब इस समस्या से अवगत कराया गया, तो उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला को पत्र लिखा। आश्वासन दिया गया कि डॉक्टरों की नियुक्ति जल्द होगी। पर “जल्द” का ये वादा कितना लंबा खिंचेगा, कोई नहीं जानता।

“सब्र कीजिए, संविदा डॉक्टर आएंगे”सीएचएमओ डॉ. राजेश गुप्ता का कहना है कि संविदा पर डॉक्टर नियुक्त करने की प्रक्रिया चल रही है। मगर क्या संविदा डॉक्टरों से स्थायी समाधान होगा या फिर ये भी सिर्फ एक अस्थायी पैचवर्क साबित होगा?

“विकास” के नाम पर इलाज की उम्मीद न रखें :: सुसनेर के अस्पताल की ये हालत बताती है कि सरकारी व्यवस्थाओं की प्राथमिकताएं कहां उलझी हैं। करोड़ों का भवन और संसाधन तो आ गए, पर उसे चलाने के लिए जरूरी डॉक्टरों का “अपॉइंटमेंट” अब तक अधूरा है। सवाल है कि आखिर कब तक मरीजों की जान और समय के साथ ये “तमाशा” चलता रहेगा?

आपको बता दें कि  विगत दिनों सुसनेर प्रवास पर आए आगर जिले के प्रभारी मंत्री नागरसिंह चौहान को भाजपा मंडल महामंत्री पवन शर्मा ने सिविल अस्पताल में डॉक्टरों की नियुक्ति हेतु मांग पत्र सौंपा। मंत्री चौहान ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला को पत्र लिखकर रिक्त पदों की शीघ्र पूर्ति का अनुरोध किया। 

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