विकास की पगडंडी और सियासत का कीचड़ – “अमरकोट: सड़कों पर सियासत, किले में बदहाली का पहरा” – अधिकारियों का टालमटोल: किसकी जिम्मेदारी है यह सड़क?

👉 "आगर जिले का बदकिस्मत गांव: जहां आज भी सड़क सिर्फ सपनों में है"
👉 पुरातात्विक धरोहर की चीत्कार: ‘हमारी सुनो!’
जर्जर पुल और पलायन की कहानी , लॉलीपॉप तो मिला, पर सड़क नहीं!"
जनमत जागरण @ सुसनेर से दीपक जैन की ग्राउंड रिपोर्ट । नेशनल हाईवे 552 जी से सटे हुए अमरकोट गांव की कहानी सुनने में ऐतिहासिक है, पर देखने में दयनीय। तीन तरफ से नदी से घिरा यह गांव आजादी के बाद से सड़क जैसी बुनियादी सुविधा को तरस रहा है। ग्राम पंचायत से लेकर प्रशासन तक सब एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालते हैं, और नतीजा यह कि अमरकोट आज भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है।
👉 विकास की पगडंडी और सियासत का कीचड़ :: सीईओ जनपद पंचायत सुसनेर, राजेश कुमार शाक्य, जब उनसे अमरकोट की सड़कों के बारे में पूछा गया, तो जवाब था, “मुझे जानकारी नहीं है कि यह सड़क किस विभाग के अंतर्गत आती है। ग्राम पंचायत प्रस्ताव भेजे, तो मैं देखूंगा।”

👉 अब सवाल यह है कि जब गांव वालों ने कई बार प्रस्ताव भेजा, तब क्या हुआ? ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारी आते हैं, लॉलीपॉप देते हैं और चले जाते हैं। पिछले चुनावों में ग्रामीणों ने मतदान का बहिष्कार करने की धमकी दी थी, तो विभागीय अधिकारी दौड़े-दौड़े गांव पहुंचे और आश्वासन की गाड़ी लगा दी। पर गाड़ी की स्टार्टिंग अब तक नहीं हुई।

👉 "लॉलीपॉप तो मिला, पर सड़क नहीं!"
ग्रामीण शहजाद खान, अभिनंदन जैन और अनिल कुमार बताते हैं कि कागजों में कई बार वादे किए गए। “पिछले चुनावों में अधिकारियों ने कहा था कि सड़कों का काम तुरंत शुरू होगा। हमने भरोसा करके मतदान कर दिया। पर अब तक पगडंडी वही है और सड़क का नामोनिशान नहीं।”

👉 पुरातात्विक धरोहर की चीत्कार: ‘हमारी सुनो!’
◾अमरकोट का किला और दिगंबर जैन तीर्थ नेमिधाम पुरातात्विक और धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। लेकिन प्रशासन की अनदेखी इन धरोहरों की चमक को धूमिल कर रही है।
◾ गांव के किले के बारे में पूर्व कलेक्टर गुप्ता ने कहा था कि इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करके हेरिटेज होटल बनाया जाएगा। लेकिन उनका कार्यकाल खत्म हो गया, और यह वादा भी उसी के साथ खत्म हो गया।

⏩ किले के राव भाट परिवार के रामचंद्र झलोरा कहते हैं, "इस किले का ऐतिहासिक महत्व है। यहां अकबर के जन्म से जुड़े संदर्भ भी मिलते हैं। पर आज यह किला खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।"

👉 जर्जर पुल और पलायन की कहानी
▪️गांव का एकमात्र पुल इतना जर्जर है कि बारिश के दिनों में यह गांव को बाकी दुनिया से अलग कर देता है। ग्रामीणों का कहना है कि “जब पुल ही गिर जाएगा, तब शायद प्रशासन जागेगा।”
▪️इस बदहाली का नतीजा यह है कि गांव के कई परिवार पलायन कर चुके हैं। “यहां न सड़क है, न रोजगार। हम अपने बच्चों का भविष्य बर्बाद नहीं कर सकते,” ग्रामीण मनोज जैन कहते हैं।
👉अधिकारियों का टालमटोल: किसकी जिम्मेदारी है यह सड़क?▪️सीईओ राजेश कुमार शाक्य कहते हैं, “अगर यह मेरे अधिकार क्षेत्र में हुआ, तो मैं प्रयास करूंगा।” वहीं, पर्यटन विभाग के अधिकारियों ने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि यह सड़क हमारे विभाग का मामला नहीं है।

👉 "अमरकोट: इतिहास कहां जा रहा, विकास कब आएगा?"
▪️जब पुल और सड़क बनेगी, तब शायद अमरकोट के किले की दीवारें अपनी कहानी सुना पाएंगी।
▪️जब विभागों के बीच टालमटोल बंद होगा, तब शायद ग्रामीणों को अपने गांव में वापस लौटने का सपना पूरा होगा।
👉 अब सवाल यह है:
▪️क्या अमरकोट का भविष्य इसी तरह पगडंडी पर अटका रहेगा?
▪️क्या चुनाव बहिष्कार की धमकी से प्रशासन की नींद टूटेगी?
▪️या फिर यह गांव यूं ही सियासत के लॉलीपॉप का शिकार बनता रहेगा?



