जनमत विश्लेषण व्यवस्था का एक्स-रे: एक प्रदेश, दो अस्पताल—कहीं डॉक्टर बिना अस्पताल, कहीं अस्पताल बिना डॉक्टर।
एक तरफ 6 साल से कागज़ों में चल रहा 100 बिस्तरों का अस्पताल, दूसरी तरफ डेढ़ साल से तैयार भवन में इलाज का इंतजार

मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास
जनमत जागरण विश्लेषण
व्यवस्था का एक्स-रे @ दीपक जैन सुसनेर
“जब व्यवस्था बीमार हो जाती है, तब सबसे पहले अस्पताल नहीं, जनता दम तोड़ती है।”
स्वास्थ्य व्यवस्था किसी भी सरकार की संवेदनशीलता का सबसे बड़ा पैमाना होती है। अस्पताल केवल ईंट, सीमेंट और लोहे का ढांचा नहीं होते, बल्कि आम आदमी के जीवन की अंतिम उम्मीद होते हैं। लेकिन जब अस्पताल केवल फाइलों में बन जाएं और दूसरी ओर करोड़ों रुपये से बने अस्पताल डॉक्टरों और कर्मचारियों के अभाव में ताले में बंद पड़े रहें, तब यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य के साथ गंभीर अन्याय है।
मध्य प्रदेश में आज स्वास्थ्य व्यवस्था का एक ऐसा विरोधाभास सामने है जो किसी भी संवेदनशील नागरिक को झकझोर देता है।
इंदौर के खजराना में अस्पताल नहीं, लेकिन 87 कर्मचारियों की पोस्टिंग है। वहीं सुसनेर के ग्राम मोड़ी में 2.43 करोड़ रुपये से बना प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डेढ़ वर्ष से बंद पड़ा है, क्योंकि वहां पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध नहीं है।
एक स्थान पर भवन का अस्तित्व ही नहीं है, लेकिन नियुक्तियां लगातार हो रही हैं। दूसरी जगह भवन पूरी तरह तैयार है, लेकिन मरीजों का इलाज शुरू नहीं हो पा रहा।
खजराना : कागज़ों का अस्पताल
23 जून 2020 को 100 बिस्तरों वाले सिविल अस्पताल की घोषणा हुई। विशेषज्ञ डॉक्टर, चिकित्सा अधिकारी, स्टाफ नर्स, लैब टेक्नीशियन और फार्मासिस्ट सहित 87 पद स्वीकृत कर दिए गए। वर्षों से कर्मचारियों की पदस्थापनाएं होती रहीं। हाल ही में 15 जून 2026 को भी एक लैब टेक्नीशियन की पोस्टिंग इसी अस्पताल के नाम पर की गई।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस अस्पताल का भवन ही अस्तित्व में नहीं है, वहां आखिर नियुक्तियां किस आधार पर हो रही हैं?
धरातल पर अस्पताल नहीं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में पद हैं, कर्मचारी हैं, वेतन है और आदेश भी हैं।
मोड़ी : अस्पताल तैयार, लेकिन इलाज बंद
दूसरी ओर आगर-मालवा जिले की सुसनेर विधानसभा के ग्राम मोड़ी में 2 करोड़ 43 लाख रुपये की लागत से आधुनिक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का निर्माण पूरा हो चुका है। जनवरी 2025 में भवन स्वास्थ्य विभाग को सौंप दिया गया।
लेकिन आज भी अस्पताल में ताला लटका हुआ है।
ग्रामीणों को छोटी-सी बीमारी से लेकर प्रसूति और दुर्घटना जैसी आपात स्थिति में भी 12 से 15 किलोमीटर दूर सुसनेर या आगर जाना पड़ता है।
जनमत जागरण ने फरवरी 2026 में इस गंभीर विषय को प्रमुखता से उठाया था। उसके बाद एक डॉक्टर की नियुक्ति अवश्य हुई, लेकिन डॉक्टर को भी बाद में सुसनेर सिविल अस्पताल से अटैच कर दिया गया। परिणाम यह हुआ कि मोड़ी का अस्पताल आज भी मरीजों का इंतजार कर रहा है।
स्वयं बीएमओ डॉ. बी.बी. पाटीदार स्वीकार करते हैं कि सुसनेर सिविल अस्पताल में डॉक्टरों की भारी कमी है, इसलिए नियुक्त डॉक्टर की सेवाएं वहीं ली जा रही हैं। अनुबंधित चिकित्सकों के जाने से स्थिति और गंभीर हो गई है।
यही है सबसे बड़ा विरोधाभास
एक तरफ सरकार कहती है कि डॉक्टरों की कमी है, इसलिए भवन चालू नहीं हो पा रहे।
दूसरी तरफ उसी सरकार के रिकॉर्ड में ऐसे अस्पताल मौजूद हैं जिनका भवन ही नहीं बना, लेकिन वहां दर्जनों कर्मचारियों की पोस्टिंग दिखाई जा रही है।
यदि खजराना के स्वीकृत डॉक्टरों और कर्मचारियों का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्विनियोजन किया जाए, तो प्रदेश के ऐसे कई तैयार अस्पताल तत्काल शुरू किए जा सकते हैं, जहाँ भवन तो है लेकिन स्टाफ नहीं।
प्रश्न केवल दो अस्पतालों का नहीं है
यह पूरे स्वास्थ्य विभाग की योजना, निगरानी और संसाधन प्रबंधन पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
- बिना भवन के अस्पताल कैसे संचालित माना गया?
- वर्षों तक पदस्थापनाएं किस आधार पर होती रहीं?
- तैयार अस्पतालों में स्टाफ क्यों उपलब्ध नहीं कराया गया?
- करोड़ों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति बंद क्यों पड़ी है?
- क्या विभाग के पास राज्यभर के अस्पतालों का वास्तविक ऑडिट है?
जरूरत जवाबदेही की है
स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवा में योजनाएं केवल घोषणाओं से सफल नहीं होतीं। अस्पताल तभी अस्पताल कहलाता है, जब उसमें भवन भी हो, डॉक्टर भी हों, दवाइयां भी हों और मरीज का इलाज भी हो।
मध्य प्रदेश सरकार को चाहिए कि प्रदेश के सभी स्वीकृत, निर्माणाधीन और संचालित अस्पतालों का व्यापक भौतिक सत्यापन कराया जाए। जहाँ भवन तैयार हैं वहाँ तत्काल स्टाफ उपलब्ध कराया जाए और जहाँ केवल कागज़ों में अस्पताल चल रहे हैं वहाँ जिम्मेदारी तय कर कठोर कार्रवाई की जाए।
जनता को घोषणाएँ नहीं, इलाज चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा विकास वही है, जहाँ बीमार व्यक्ति को समय पर अस्पताल मिले—न कि केवल सरकारी फाइलों में दर्ज उसका नाम।
— जनमत जागरण

संपादकीय
अस्पतालों का भूगोल नहीं, व्यवस्था का इतिहास गायब है
— संपादक @ राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
कहा जाता है कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके अस्पतालों और विद्यालयों से होती है। जहाँ अस्पताल मजबूत होते हैं, वहाँ शासन की संवेदनशीलता दिखाई देती है। लेकिन जब अस्पताल केवल सरकारी फाइलों में जीवित हों और वास्तविक धरातल पर ताले, कचरा और सन्नाटा मिले, तब समझ लेना चाहिए कि बीमारी जनता में नहीं, व्यवस्था में घर कर चुकी है।
मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों एक ऐसे विरोधाभास के सामने खड़ी है, जिस पर व्यंग्य भी शर्मिंदा हो जाए।
एक ओर इंदौर के खजराना में ऐसा 100 बिस्तरों का अस्पताल है, जो छह वर्षों से सरकारी कागज़ों में पूरी शान से चल रहा है। डॉक्टर हैं, कर्मचारी हैं, पदस्थापनाएं हैं, वेतन है, ट्रांसफर हैं, सरकारी आदेश हैं—बस अस्पताल नहीं है।
दूसरी ओर आगर-मालवा जिले के सुसनेर क्षेत्र के मोड़ी में अस्पताल का सुंदर भवन खड़ा है। करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं। दीवारें तैयार हैं, कमरे तैयार हैं, बिजली-पानी की व्यवस्था है, लेकिन डॉक्टर नहीं हैं। मरीज नहीं हैं। इलाज नहीं है। अस्पताल अपनी ही दीवारों से पूछ रहा है—”क्या मेरा अपराध सिर्फ इतना है कि मैं सचमुच बन गया?”
यह दृश्य किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की वास्तविक तस्वीर है।
सरकारी व्यवस्था का शायद यही नया गणित है—जहाँ भवन नहीं, वहाँ कर्मचारी भेज दो; जहाँ भवन बन जाए, वहाँ कर्मचारी मत भेजो। परिणाम यह कि दोनों जगह जनता ही पीड़ित है।
जनमत जागरण ने फरवरी 2026 में मोड़ी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था। उसके बाद एक डॉक्टर की नियुक्ति अवश्य हुई, लेकिन कुछ ही समय में उन्हें भी सुसनेर से अटैच कर दिया गया। यानी समस्या का समाधान नहीं हुआ, केवल फाइल का पन्ना बदल गया।
प्रश्न यह नहीं कि गलती किससे हुई।
प्रश्न यह है कि जिम्मेदारी कौन स्वीकार करेगा?
क्या स्वास्थ्य विभाग के पास यह जानकारी नहीं कि प्रदेश में कितने अस्पताल बिना भवन के कागज़ों में चल रहे हैं और कितने भवन बिना डॉक्टरों के वीरान पड़े हैं?
यदि जानकारी है, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
यदि जानकारी नहीं है, तो फिर विभाग चल कौन रहा है?
सबसे अधिक पीड़ा उस गरीब परिवार की है, जो एम्बुलेंस में अस्पताल तक पहुँचने से पहले ही उम्मीद खो देता है। उसे न सरकारी फाइलों से इलाज मिलता है, न घोषणाओं से, न प्रेस विज्ञप्तियों से। उसे चाहिए डॉक्टर, दवा और समय पर उपचार।
सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन जनता की अपेक्षाएँ नहीं बदलतीं। अस्पताल किसी राजनीतिक दल की उपलब्धि नहीं, बल्कि नागरिक का संवैधानिक अधिकार हैं।
अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य विभाग का केवल वित्तीय ऑडिट नहीं, “ग्राउंड रियलिटी ऑडिट” भी हो। हर उस अस्पताल का भौतिक सत्यापन हो, जो रिकॉर्ड में संचालित बताया जा रहा है। हर उस भवन की समीक्षा हो, जो डॉक्टरों के अभाव में बंद पड़ा है। और हर उस अधिकारी से जवाब माँगा जाए, जिसकी लापरवाही ने करोड़ों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति को निष्प्राण बना दिया।
अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास में यह अवश्य पढ़ेंगी कि इस दौर में अस्पतालों का निर्माण ईंट और पत्थर से कम, और कागज़, नोटशीट तथा फाइलों से अधिक होता था।
व्यवस्था को यह समझना होगा कि कागज़ पर दर्ज अस्पताल किसी मरीज की जान नहीं बचाते। जीवन बचाती हैं वहाँ जलती ओटी की लाइटें, ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर, समय पर मिलने वाली दवा और जनता के प्रति जवाबदेह प्रशासन।
स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य फाइलों को स्वस्थ रखना नहीं, बल्कि समाज को स्वस्थ रखना है।
और अंत में केवल एक पंक्ति—
यदि अस्पताल कागज़ों में और इलाज भाषणों में मिलता रहा, तो जनता का विश्वास भी एक दिन सरकारी रिकॉर्ड में ही दर्ज रह जाएगा।



