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“अगर शपथ पत्र फर्जी है, तो कार्रवाई होगी!” – जिला प्रबंधक दुर्गेश जाट

👉 निजी वेयरहाउस घोटाले पर बड़ा सवाल: फर्जी शपथ पत्र से कैसे मिली भंडारण की अनुमति?

जनमत जागरण @ आगर-मालवा। आगर जिले में सरकारी ज़मीनों से जुड़े घोटाले थमने का नाम नहीं ले रहे। कुंडालिया डैम घोटाले के बाद अब सुसनेर तहसील में एक और बड़ा मामला सामने आया है, जहां विवादित ज़मीन पर बने निजी वेयरहाउस में सरकारी भंडारण जारी है। नियमों के अनुसार, सरकारी एजेंसियों को किसी भी वेयरहाउस में भंडारण से पहले यह सुनिश्चित करना होता है कि उसकी ज़मीन विवादमुक्त हो। इसके लिए निजी वेयरहाउस मालिक को मालिकाना हक का शपथ पत्र देना पड़ता है, जिसमें यह घोषित किया जाता है कि ज़मीन पर कोई कानूनी विवाद नहीं है। अधिवक्ता भागीरथ देवड़ा ने कहा कि इस मामले में, न्यायालय में मामला लंबित होने के बावजूद निजी वेयरहाउस को भंडारण की अनुमति दी गई है।

कैसे दी गई, यह अब बड़ा सवाल बन गया है।

👉 एमपीडब्ल्यूएलसी जिला प्रबंधक दुर्गेश जाट का बयान

जब जनमत जागरण ने इस मामले में एमपी वेयरहाउस लॉजिस्टिक्स कॉरपोरेशन (MPWLC) के जिला प्रबंधक दुर्गेश जाट से सवाल किए, तो उन्होंने कहा:
“यह मामला संज्ञान में आया है, लेकिन यह पूरा मामला राजस्व विभाग का है। निजी वेयरहाउस में भंडारण से पहले एक प्रक्रिया होती है। जिला स्तर पर लाइसेंस बनता है, फिर एमपी गवर्नमेंट और अंत में इंडिया गवर्नमेंट का लाइसेंस जारी होता है। हमने भंडारण से पहले मालिकाना हक का शपथ पत्र प्राप्त किया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि ज़मीन विवादमुक्त है। अगर शपथ पत्र में झूठी जानकारी दी गई है, तो हम इसे संभाग स्तरीय उच्च अधिकारियों को भेजकर नियमानुसार कार्रवाई करेंगे।”

👉 अब सवाल यह उठता है कि…

जब 2016 से ज़मीन पर न्यायालय में केस चल रहा था, तो निजी वेयरहाउस को भंडारण की अनुमति किस आधार पर दी गई?
भंडारण एजेंसी ने निजी वेयरहाउस मालिक से लिए गए दस्तावेज़ों की जांच क्यों नहीं की?
अगर शपथ पत्र झूठा है, तो निजी वेयरहाउस मालिक ही जिम्मेदार होंगे, या फिर सरकारी विभागों के अधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी?
इस पूरे मामले में राजस्व, खाद्य आपूर्ति और वेयरहाउस लॉजिस्टिक्स विभागों की क्या भूमिका रही है?

👉 प्रशासन चुप क्यों है?

इस मामले को लेकर जब संबंधित अधिकारियों से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, तो ज्यादातर अधिकारियों ने फोन उठाने से ही इनकार कर दिया। यह चुप्पी कहीं न कहीं इस पूरे मामले को और संदिग्ध बना रही है। क्या यह एक सुनियोजित षड्यंत्र है? क्योंकि जब एक आम नागरिक को ज़मीन खरीदने में कई कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, तो विवादित ज़मीन पर बने निजी वेयरहाउस को सरकारी भंडारण की अनुमति इतनी आसानी से कैसे मिल गई?

👉 आगे क्या होगा?

अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं। क्या जिला कलेक्टर इस मामले को गंभीरता से लेकर उच्च स्तरीय जांच करवाएंगे? या फिर यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह फाइलों में दब जाएगा?

📌 जनमत जागरण इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है। आगे की जानकारी के लिए जुड़े रहें!

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