आस्थाआगर मालवामध्यप्रदेश

सनातन परंपरा की दिव्य ज्योति—भावसार समाज ने मनाई हिंगलाज जयंती


🚩 सुसनेर | जनमत जागरण

भारत की सनातन संस्कृति में कुलदेवियों और शक्ति की उपासना का विशेष स्थान है। प्रत्येक समाज अपनी परंपराओं, मान्यताओं और श्रद्धा के साथ इन पावन पर्वों को मनाता है, जिससे न केवल सामाजिक एकता बलवती होती है, बल्कि सनातन संस्कृति की जड़ें भी और अधिक सुदृढ़ होती हैं। इसी क्रम में, भावसार समाज ने गुरुवार को परम आस्था और भक्ति के साथ माँ हिंगलाज जयंती मनाई।

भावसार समाज के श्रद्धालुओं ने स्थानीय श्री चतुर्भुजनाथ भावसार मंदिर में एकत्रित होकर भव्य आयोजन किया। महिलाओं और पुरुषों ने सामूहिक रूप से माँ हिंगलाज का पूजन-अर्चन किया, महाआरती की गई और भक्ति भाव से भरी हुई महाप्रसादी ग्रहण की गई।

चल समारोह में बही भक्ति की बयार

भावसार समाज के महिला मंडल ने इस उत्सव की विस्तृत तैयारियाँ पहले ही कर ली थीं। गुरुवार दोपहर 3 बजे से माँ हिंगलाज का भव्य चल समारोह निकाला गया, जिसमें समाज के पुरुष, महिलाएँ और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित होकर श्रद्धा और उल्लास के साथ शामिल हुए। गाजे-बाजे के साथ निकले इस शोभायात्रा ने नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए भक्तिमय वातावरण का निर्माण किया।

समारोह में समाज के वरिष्ठ सदस्य डॉ. रामप्रताप भावसार, बालकिशन भावसार, गोविंदराम भावसार, शिवदयाल भावसार, ओमप्रकाश भावसार, मनोहर भावसार, दिनेश भावसार, दीपक भावसार, नरेश भावसार, सुनील भावसार, हेमंत भावसार, लखन भावसार, नीरज भावसार, कमल भावसार, अशोक भावसार, नवीन भावसार, भरत भावसार, धनराज भावसार सहित बड़ी संख्या में भावसार समाज के श्रद्धालु शामिल रहे।

समाज के वरिष्ठ विष्णु भावसार ने जानकारी देते हुए बताया कि माँ हिंगलाज देवी भावसार समाज की कुलदेवी हैं, और इस उत्सव का उद्देश्य समाज को धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से संगठित करना है।

सनातन परंपराओं का गौरवमयी आयोजन

माँ हिंगलाज का यह उत्सव न केवल भावसार समाज के लिए बल्कि सम्पूर्ण सनातन संस्कृति के लिए आस्था और परंपरा की एक सशक्त मिसाल है। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और अपनी सांस्कृतिक धरोहर को भावी पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए संकल्पबद्ध है।

🔹 इस आयोजन ने भक्तों को यह संदेश दिया कि धर्म और आध्यात्मिकता जीवन का अभिन्न हिस्सा है, और परंपराओं को जीवंत रखना ही हमारी संस्कृति का असली उद्देश्य है।


Related Articles

error: Content is protected !!