अलौकिक कामधेनु गो अभ्यारणआगर मालवादेशमध्यप्रदेश

गो अभयारण्य में गो सेवा के माध्यम से अधर्म का नाश और कलयुग में सतयुग का अनुभव

पूज्य धनवंतरी दास जी महाराज और छोटे सरकार दादाजी का भावपूर्ण प्रवचन

जनमत जागरण @सुसनेर। मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्थापित एवं श्रीगोधाम महातीर्थ पथमेड़ा द्वारा संचालित विश्व का प्रथम श्री कामधेनु गो अभयारण्य, मालवा में चल रहे एक वर्षीय वेदलक्षणा गो आराधना महामहोत्सव के उपसंहार उत्सव के नवम दिवस पर आध्यात्मिक वातावरण अद्भुत अनुभूति से भर गया। इस अवसर पर स्वामी गोपालानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि “जिस घर के आंगन में गाय माता हो, वहीं सच्चा हिंदू और सनातनी है।” उन्होंने कहा कि जिस घर में गाय नहीं, वहां तो पानी तक नहीं पीना चाहिए। गाय माता सनातन धर्म की पहचान हैं। जहां गाय माता हैं, वहीं धीरज है, और जहां धीरज है, वहीं सच्ची समृद्धि है।

स्वामीजी ने आगे कहा कि फिकर की फांकी जो पी जाए, वही सच्चा फकीर है। और जो वास्तव में बेफिक्री चाहता है, उसे गोमाता की शरण में आना ही होगा। जब तक गाय है, तब तक मौज है। उन्होंने सभी श्रोताओं को आह्वान किया कि वे गाय को अपने जीवन का केंद्र बनाएं, तभी धर्म, स्वास्थ्य और सौभाग्य तीनों का वास होगा।

वृन्दावनधाम से पधारे संगीत सम्राट पूज्य धनवंतरी दास जी महाराज ने भाव विभोर कर देने वाले शब्दों में कहा कि “संत महात्मा आपसे गोसेवा करवाकर आपके अधर्म को नष्ट करते हैं।” उन्होंने कहा कि “पृथ्वी के सात स्तंभों में गाय माता प्रधान स्तंभ हैं। गाय का संरक्षण पृथ्वी की स्थिरता का प्रतीक है।” उन्होंने बताया कि “भगवान श्रीकृष्ण जिनकी सेवा करते थे, वह गाय – यदि हमें सेवा करने का अवसर मिले, तो यह हमारा परम सौभाग्य है।” साथ ही उन्होंने एक अनुपम दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए कहा कि “जैसे प्रभु श्रीराम के तुणीर में एक ही बाण होता था लेकिन वह प्रतिपल बढ़ता रहता था, वैसे ही दिया गया दान भी प्रतिपल फलित होता है।” उन्होंने कहा, “एकं सस्यं दशं बीजं, दानं शतगुणं भवेत्।” – यानी एक दाना दस गुना, लेकिन दान सौ गुना फल देता है।

स्वामी गोपालानंद सरस्वती जी महाराज ने अपने एक अन्य दिव्य प्रवचन में “निष्क्रमण संस्कार” को केवल परंपरा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रूप से अत्यंत उपयोगी संस्कार बताया। उन्होंने कहा कि गोमूत्र में सारे तीर्थों का फल समाहित है, और यह दुनिया का सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक सैनिटाइज़र है। उन्होंने बताया कि “साबुन शरीर को शुद्ध कर सकता है, लेकिन आत्मा को नहीं; गोमूत्र आत्मा को भी पवित्र करता है।” उन्होंने बताया कि भविष्य पुराण में लिखा है कि गूगल (गुग्गुलु) का प्रगटीकरण भी गोमूत्र से हुआ है, जो भगवान सूर्य और शिव को विशेष प्रिय है। निष्क्रमण संस्कार के दिन गोदुग्ध की छाछ पिलाने तथा पूर्वजों को स्मरण करने से पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।

खेड़ीघाट से पधारे पूज्य छोटे सरकार हुज़ूर ने बताया कि गो अभयारण्य में एक वर्ष तक चली भगवती गोमाता की कथा, वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण की परम कृपा का परिणाम है। “पांच हजार वर्ष बाद इस प्रकार सतत गौकथा का आयोजन कलयुग में सतयुग के आरंभ जैसा है।” उन्होंने कहा कि “यहां भगवान श्रीकृष्ण की परम आराध्या गोमाता प्रत्यक्ष प्रकट हैं, और यह अवसर सभी श्रोताओं के लिए परम सौभाग्य है।”

हैदराबाद से पधारे मुरली मनोहर जी पलोड ने बताया कि पथमेड़ा केवल एक गोशाला नहीं, बल्कि एक विचारधारा है, जो संपूर्ण भारतवर्ष में गोमाता के संरक्षण का संकल्प देती है। उन्होंने बताया कि हैदराबाद में गोवत्स फाउंडेशन द्वारा पथमेड़ा महाराज जी और गोवत्स राधाकृष्ण जी महाराज के आशीर्वाद से गोसेवा की प्रेरणा ली जा रही है।

एक वर्षीय गोकृपा कथा के उपसंहार उत्सव के नवम दिवस पर दिल्ली से अनिता और रवि वर्मा के साथ श्री गोवर्धन गोशाला सोयतकलां, पीपलिया तहसील के गुराड़िया ग्राम सहित अनेक ग्रामों और नगरों से गोप्रेमियों ने भव्य चुनरी यात्रा में भाग लिया। भगवती गोमाता को चुनरी ओढ़ाई गई, पूजन किया गया और स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज से आशीर्वाद प्राप्त किया गया। अंत में सभी ने यज्ञशाला की परिक्रमा कर गोसेवा में सहभागी बनते हुए गोव्रती महाप्रसाद ग्रहण किया।


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