मैदा: सफेदी में छुपा धीमा ज़हर | राजीव दीक्षित के देसी विज्ञान से जानिए सच्चाई

भाग 8: मैदा – सफेदी में छुपा सफाया!
(आधुनिक आहार या पैकेट में बंद बीमारी?)
“साफ-सुथरी चीज़ अच्छी होती है”, इस धारणा ने हमें ऐसा धोखा दिया है कि अब बाजार की सबसे सफेद वस्तुएं – चाहे वो मैदा, नमक, चीनी या चावल हों – स्वास्थ्य के सबसे काले अध्याय बन चुके हैं।
राजीव जी दीक्षित वर्षों पहले चेतावनी दे चुके थे –
“मैदा इंसानी शरीर के लिए नहीं, मशीनों के लिए बना है!”
क्या है मैदा का सच?
मैदा गेहूं से बनने के बावजूद गेहूं जैसा नहीं होता। यह उस गेहूं का अति-प्रसंस्कृत रूप होता है जिसमें से फाइबर, विटामिन, खनिज और पोषण को पूरी तरह निकालकर केवल एक बारीक सफेद चूर्ण बचता है – जो दिखने में आकर्षक होता है लेकिन आंतों के लिए अवरोध, रक्त के लिए विष, और पाचन के लिए अभिशाप बन जाता है।
ब्रेड, बिस्किट, पिज़्ज़ा, केक, नमकीन – ये सभी बाजार की वो वस्तुएं हैं जिनमें मैदा अपनी मीठी मौत लेकर बैठा है। इसका बार-बार सेवन करने से कब्ज, एसिडिटी, डायबिटीज़, थायरॉइड, मोटापा और यहां तक कि कैंसर तक की संभावनाएं वैज्ञानिक रूप से जुड़ी हुई है।
मैदा – इंसानों के लिए नहीं, मशीनों के लिए बना है!
राजीव दीक्षित जी ने बड़ी सादगी से एक गहरी सच्चाई कह दी थी – “मैदा इंसानी शरीर के लिए नहीं, मशीनों के लिए बना है!” पहली बार सुनने में यह वाक्य अटपटा लग सकता है, लेकिन इसका वैज्ञानिक और व्यावहारिक अर्थ बेहद स्पष्ट है।
मैदा, जिसे गेहूं की आत्मा से पूरी तरह काट कर केवल सफेद स्टार्च के रूप में तैयार किया जाता है, न सिर्फ पोषणहीन होता है बल्कि शरीर के लिए नुकसानदायक भी होता है। इसमें से न सिर्फ फाइबर, प्रोटीन और खनिज गायब होते हैं, बल्कि यह आँतों की सतह पर चिपकने वाली परत बनाकर पाचन को बाधित करता है। यही कारण है कि आज कब्ज़, अपच, गैस, मोटापा और मधुमेह जैसी समस्याएं आम हो गई हैं – और इन सबके पीछे छुपा है “सफेद ज़हर” मैदा।
अब ज़रा सोचिए – यही मैदा जब पानी में घोलकर गरम किया जाता है, तो उससे बनता है गोंद (glue) – जिसका उपयोग मशीनों में पार्ट्स जोड़ने, किताबें बाइंड करने, फर्नीचर चिपकाने और औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है।
जो चीज मशीनों को जोड़ती है, वही इंसानों के शरीर को तोड़ देती है।
इसलिए कहा गया है –
“जो मैदा मशीनों के लिए वरदान है, वही इंसानों के लिए शाप है।”
अब सवाल उठता है – अगर मैदा नहीं खाना चाहिए, तो क्या खाना चाहिए?
विकल्प क्या है?
राजीव जी दीक्षित के अनुसार –
“अगर आप मैदा छोड़ते हैं, तो आपको कुछ छोड़ना नहीं पड़ेगा; बल्कि बहुत कुछ वापस मिलेगा – आपकी सेहत, ऊर्जा और संतुलन।”
- घर की चक्की से निकला साबुत गेहूं का आटा
- ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का जैसे परंपरागत भारतीय अनाज
- सत्तू, घरेलू पराठे, घी के साथ बनी रोटी
- हाथ से गूंथे आटे का स्वाद, जो शरीर में रस, बल और ओज का कारण बनता है
तो फिर सवाल यह है:
क्या हम थोड़े से ‘स्वाद’ के लिए अपने पूरे स्वास्थ्य को दांव पर लगा देंगे?
सार्थक चिंतन
मैदा कोई खाद्य नहीं, एक सूक्ष्म-आधुनिक षड्यंत्र है – जो संस्कृति को स्वाद से, और शरीर को रोग से जोड़ता है।
अगर हमें अगली पीढ़ी को स्वस्थ और सक्षम बनाना है, तो रसोई को ‘रेडी-टू-ईट’ से निकालकर ‘रियल-टू-हील‘ बनाना होगा।
अब समय है कि हम सफेद आकर्षण की नहीं, देसी आहार विज्ञान की बात करें – जो मिट्टी की तरह सरल और जीवन की तरह संजीवनी हो।
“365 दिन – शरीर विज्ञान की देसी व्याख्या, स्वस्थ जीवन की सटीक दिशा”
“विज्ञान नहीं, विवेक की बात”
स्वरूप – स्व. राजीव जी दीक्षित के व्याख्यानों पर आधारित जनजागरण लेखमाला
संपादन एवं प्रस्तुति –
राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
संपादक – जनमत जागरण न्यूज़ पोर्टल
(यह लेख केवल जागरूकता के उद्देश्य से है। किसी रोग की चिकित्सा हेतु विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।)



