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जिला पंचायत उपचुनाव में भाजपा समर्थन पर भ्रम, दो प्रत्याशियों के दावे से बंट सकता है परंपरागत वोट

कांग्रेस ने घोषित किया प्रत्याशी, भाजपा जिलाध्यक्ष बोले—किसी को नहीं दिया गया आधिकारिक समर्थन

✍️ जिला पंचायत उपचुनाव ने सुसनेर की राजनीति में असमंजस और असहजता की स्थिति पैदा कर दी है। एक ओर कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी घोषित कर स्पष्टता दिखाई है, वहीं भाजपा खेमे में समर्थन को लेकर बनी अनिश्चितता ने मतदाताओं को भ्रम में डाल दिया है। यह उपचुनाव अब केवल सदस्य पद का नहीं, बल्कि दलों की रणनीति और संगठनात्मक स्थिति का भी आईना बनता जा रहा है।
जनमत जागरण @ सुसनेर से दीपक जैन की स्पेशल रिपोर्ट।
त्रि-स्तरीय पंचायतों के उप निर्वाचन अंतर्गत आगर जिला पंचायत वार्ड क्रमांक–01 के सदस्य पद के लिए 29 दिसंबर को मतदान होना है। इस उपचुनाव में कुल चार प्रत्याशियों ने नामांकन दाखिल किया है।
इनमें सोयत कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष कैलाश पाटीदार को कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी घोषित किया गया है। वहीं अन्य तीन प्रत्याशियों—कालू सिंह (गणेशपुरा) एवं मथुराबाई मोहन सिंह तोमर (गुंदलावदा)—को लेकर भाजपा समर्थन को लेकर भारी संशय बना हुआ है।
स्थिति यह है कि दोनों प्रत्याशी स्वयं को भाजपा समर्थित उम्मीदवार बताकर भाजपा के नाम और नारों के साथ प्रचार कर रहे हैं। इनके समर्थन में भाजपा के कई पूर्व विधायक, पूर्व जिलाध्यक्ष, वर्तमान पदाधिकारी और मंडल स्तर के नेता गांव-गांव जाकर प्रचार करते नजर आ रहे हैं।
हालांकि, इस पूरे मामले पर भाजपा जिलाध्यक्ष ने स्पष्ट रूप से कहा है कि,
“भारतीय जनता पार्टी ने इस उपचुनाव में किसी भी प्रत्याशी को आधिकारिक रूप से समर्थन नहीं दिया है।”

इसके बावजूद दोनों प्रत्याशी अघोषित समर्थन का दावा कर रहे हैं, जिससे मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
▪️दमखम के साथ मैदान में दिग्गज, जनता तय नहीं कर पा रही ‘भाजपा का असली प्रत्याशी’
कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी कैलाश पाटीदार के समर्थन में स्वयं कांग्रेस जिलाध्यक्ष विजयलक्ष्मी तंवर सक्रिय प्रचार में जुटी हुई हैं। कांग्रेस ने अधिकृत पत्र जारी कर कैलाश पाटीदार को पार्टी समर्थित प्रत्याशी घोषित किया है, जिससे कांग्रेस की स्थिति स्पष्ट नजर आती है।
दूसरी ओर भाजपा खेमे में स्थिति और भी दिलचस्प हो गई है—जहां पूर्व विधायक, पूर्व जिलाध्यक्ष, पूर्व मंडल अध्यक्ष, वर्तमान मंडल अध्यक्ष और जिला पदाधिकारी अलग-अलग प्रत्याशियों के समर्थन में आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।
इस स्थिति ने भाजपा के परंपरागत मतदाता को असमंजस में डाल दिया है, जिससे मतों के बंटवारे की पूरी संभावना बन रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका सीधा लाभ कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी को मिल सकता है।
▪️जीत से ज्यादा गुटबाजी की साख दांव पर
यह उपचुनाव अब केवल प्रत्याशियों की हार-जीत का नहीं, बल्कि
👉 भाजपा के पुराने और नए गुटों की साख व वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है।
भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी अब खुलकर सामने आ गई है। यह चुनाव उन नेताओं के लिए भी राजनीतिक परीक्षा बन गया है, जो अपने-अपने प्रत्याशियों को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
यह मुकाबला कई नेताओं के जमीनी प्रभाव और भविष्य की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।
▪️चुनावी रण में शाब्दिक युद्ध भी तेज
भाजपा समर्थन का दावा कर रहे दोनों प्रत्याशियों के बीच नुक्कड़ सभाओं में शाब्दिक द्वंद भी देखने को मिल रहा है।
एक-दूसरे पर पार्टी के प्रति बेवफाई और गलत दावे करने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
कौन सही है और कौन गलत—इसका फैसला अब मतदाता और परिणाम ही करेंगे।
▪️भाजपा के गढ़ सुसनेर में गुटबाजी बन सकती है बड़ी चुनौती
कभी भाजपा का मजबूत गढ़ रही सुसनेर विधानसभा में पार्टी को लगातार दो चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यह गुटबाजी समय रहते नहीं सुलझी, तो इसका प्रभाव आगामी विधानसभा चुनाव में भी साफ दिखाई देगा।
विशेषज्ञों की राय है कि
भाजपा नेतृत्व और संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों को तत्काल हस्तक्षेप कर गुटबाजी पर अंकुश लगाना चाहिए, अन्यथा पार्टी को इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।


विशेष अंतिम खास बात – 29 दिसंबर को होने वाला मतदान और 2 जनवरी को आने वाला परिणाम केवल एक जिला पंचायत सदस्य नहीं, बल्कि
✔️ दलों की रणनीति
✔️ नेताओं की साख
✔️ और आगामी विधानसभा चुनाव की दिशा
—तीनों को प्रभावित करने वाला साबित हो सकता है।

भाजपा समर्थन का दावा करने वाले दोनों गुट अलग-अलग नुक्कड़ सभाओं में शक्ति प्रदर्शन करते हुए
गुटबाजी : विचारधारा से ऊपर व्यक्तिगत वर्चस्व

भाजपा की पहचान एक अनुशासित कैडर आधारित पार्टी की रही है। लेकिन इस उपचुनाव ने दिखा दिया कि विचारधारा से ज्यादा अब व्यक्तिगत वर्चस्व की लड़ाई हावी हो चुकी है।
पूर्व विधायक, पूर्व जिलाध्यक्ष, मंडल अध्यक्ष और वर्तमान पदाधिकारी—सब अलग-अलग खेमों में खड़े हैं।
यह स्थिति केवल मतदाताओं को भ्रमित नहीं कर रही, बल्कि पार्टी के उस कार्यकर्ता को भी तोड़ रही है, जो वर्षों से “पार्टी पहले” के मंत्र पर काम करता आया है।
आज सवाल यह नहीं है कि कौन प्रत्याशी जीतेगा,
आज सवाल यह है कि
किस गुट की साख बचेगी और किसका राजनीतिक भविष्य डगमगाएगा।
▪️भाजपा का गढ़ और बार-बार का वनवास
सुसनेर विधानसभा कभी भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती थी।
लेकिन पिछले दो विधानसभा चुनावों में भाजपा को यहां हार का सामना करना पड़ा है।
हर बार कारण बदले गए, चेहरे बदले गए, लेकिन गुटबाजी जस की तस बनी रही।
अब यह उपचुनाव उसी गुटबाजी का छोटा लेकिन स्पष्ट ट्रेलर बनकर सामने आया है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि समय रहते संगठन ने आत्ममंथन नहीं किया, तो यह बीमारी आने वाले विधानसभा चुनाव में घातक रूप ले सकती है।
▪️जनता सब देख रही है
राजनीति में यह सबसे बड़ी भूल होती है कि
नेता यह मान लें कि जनता कुछ नहीं समझती।
👉 आज का मतदाता जानता है—
▪️कौन पार्टी के नाम पर लड़ रहा है
▪️कौन पार्टी के भीतर रहकर पार्टी को कमजोर कर रहा है
▪️और कौन सत्ता नहीं, बल्कि संगठन की चिंता करता है
इसलिए यह चुनाव केवल प्रत्याशी का नहीं,
नियत, निष्ठा और नीति का भी चुनाव है।
▪️समय रहते चेत जाने की जरूरत
यह लेख किसी पार्टी के विरोध में नहीं,
बल्कि राजनीतिक आत्मावलोकन के लिए लिखा गया है।
यदि भाजपा को अपना जनाधार बचाना है, तो
गुटबाजी पर स्पष्ट निर्णय
अनुशासनहीनता पर कठोर रुख
और संगठनात्मक स्पष्टता
अब टालने योग्य विषय नहीं रहे।
क्योंकि
👉 जहां झंडा बड़ा और दिशा छोटी हो जाए, वहां जनविश्वास डगमगा जाता है। परिणाम प्रश्नचिन्ह बन जाते हैं।
✒️ सार्थक दृष्टिकोण
— राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
(संपादक, जनमत जागरण)

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