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जिला पंचायत उपचुनाव : भाजपा को हराकर जीती भाजपा, संगठन के लिए गंभीर संकेत

भाजपा समर्थित कालू सिंह गणेशपुरा 2410 मतों से विजयी, गुटबाजी खुलकर आई सामने

जनमत जागरण @ सुसनेर।
त्रि-स्तरीय पंचायतों के उप निर्वाचन अंतर्गत आगर जिला पंचायत वार्ड क्रमांक–01 के सदस्य पद की मतगणना शुक्रवार को सुसनेर आईटीआई कॉलेज में संपन्न हुई। परिणाम सामने आते ही यह स्पष्ट हो गया कि यह उपचुनाव जीत–हार से कहीं अधिक संगठनात्मक हालात का आईना बन गया है।
त्रिकोणीय मुकाबले के रूप में देखा जा रहा यह चुनाव वस्तुतः भाजपा के भीतर की चुनावी जंग बनकर उभरा, जिसमें स्वयं को भाजपा समर्थित बताने वाले दो प्रत्याशी आमने-सामने थे। पूर्व भाजपा जिला उपाध्यक्ष कालू सिंह गणेशपुरा ने पूर्व सोयत भाजपा मंडल अध्यक्ष मोहन सिंह गुंदलावदा की पत्नी मथुराबाई मोहन सिंह तोमर को 2410 मतों से पराजित कर विजय प्राप्त की।
कालू सिंह गणेशपुरा ने पहले राउंड से बढ़त बनाई, जो अंतिम राउंड में निर्णायक जीत में बदली। आम मतदाता की जुबान में कहें तो यह जीत व्यक्तियों की नहीं, संगठन के भीतर बदलते समीकरणों की है।


कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी एवं सोयतकलां कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष कैलाश पाटीदार तीसरे स्थान पर रहे, जबकि एक अन्य प्रत्याशी चौथे पायदान पर रहा।

जीत के बाद सुसनेर में राणा हाउस से विजय जुलूस निकाला गया, जो नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए एक सभा के रूप में संपन्न हुआ। वहीं सोयत कला में नगर परिषद अध्यक्ष के निवास से विजय जुलूस प्रारंभ हुआ, जो नगर भ्रमण के पश्चात माधव चौक पर सभा के साथ संपन्न हुआ। इस दौरान समर्थकों ने आतिशबाजी कर और नारेबाजी के साथ जीत का उत्साह व्यक्त किया।

▪️दिग्गजों की साख दांव पर, संगठन मौन
इस उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के साथ जहां कांग्रेस जिलाध्यक्ष विजयलक्ष्मी तंवर सक्रिय रहीं, वहीं भाजपा खेमे में स्थिति कहीं अधिक जटिल रही।
कालू सिंह गणेशपुरा और मथुराबाई तोमर—दोनों के समर्थन में पूर्व विधायक, पूर्व जिलाध्यक्ष, पूर्व एवं वर्तमान मंडल अध्यक्ष, जिला पदाधिकारी खुलकर मैदान में थे।

👉 यह स्थिति दर्शाती है कि नेतृत्व स्तर पर समय रहते कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया, जिससे गुटबाजी सड़कों से लेकर गांव-गांव तक फैल गई।
भविष्य के लिए चेतावनी
यह चुनाव भाजपा के लिए जीत से अधिक चेतावनी है।
यदि संगठन ने अब भी आत्ममंथन नहीं किया,
यदि गुटों को नियंत्रित नहीं किया गया,
तो यह विभाजन आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को भारी नुकसान पहुँचा सकता है।
क्योंकि— 👉 जो दीवारें विधानसभा चुनाव के पहले के चुनावों खड़ी होती हैं,
वही दीवारें विधानसभा में दरार बन जाती हैं।

सार्थक चिंतन | संपादक की दृष्टि

इस उपचुनाव ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि चुनाव केवल मतों से नहीं जीते जाते, वे संगठन की आत्मा से लड़े जाते हैं। परिणाम सामने हैं—कौन जीता, कौन हारा, यह अब इतिहास का हिस्सा है। लेकिन जो बात परिणामों से पहले जनमत जागरण ने चेतावनी के रूप में कही थी, वही आज सबसे बड़ी संगठनात्मक चिंता बनकर उभरी है।

भाजपा समर्थित दो प्रत्याशियों की समानांतर दावेदारी ने गांव-गांव तक असमंजस की स्थिति पैदा कर दी। कई गांवों में हालात ऐसे बने कि रिश्तेदार रिश्तेदार से पूछता नजर आया—किसके साथ खड़े हों और किससे दूरी बनाएं ? संगठन से जुड़े कार्यकर्ता भी तय नहीं कर पा रहे थे कि समर्थन का सही पता कौन-सा है। अंततः अधिकांश कार्यकर्ताओं ने जैसी-जहां जैसी स्थिति मिली, वैसा काम किया—लेकिन यह काम उत्साह से नहीं, विवशता से हुआ।

अब परिणाम आ चुके हैं, लेकिन असली प्रश्न यहीं से शुरू होता है। गांव-गांव तक फैली यह आपसी वैमनस्यता, मनभेद और अदृश्य दीवारें क्या अपने आप गिर जाएंगी? या फिर यह दरारें आने वाले समय में और गहरी होंगी? यही वह मोड़ है, जहां संगठन को जीत के उत्सव से निकलकर आत्ममंथन की चौखट पर आना होगा।

जीतने वाले प्रत्याशी के लिए यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह यह अहसास किसी गांव या कार्यकर्ता को न होने दे कि विकास कार्य गुट देखकर होंगे। अब वह केवल किसी समूह का नहीं, पूरे वार्ड का प्रतिनिधि है। यदि जीत के बाद भी गुटबाजी के चश्मे से फैसले लिए गए, तो यह जीत संगठन के लिए राहत नहीं, भविष्य की नई चुनौती बन जाएगी।

वहीं हारने वालों के लिए भी यह समय नाराजगी का नहीं, संगठनात्मक परिपक्वता दिखाने का है। हार को बहाना बनाकर यदि संगठन से दूरी बनाई गई, तो नुकसान केवल व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक होगा। कमी कहां रह गई—इसका निष्पक्ष आकलन ही आगे की राह तय करेगा।

जनमत जागरण ने पहले ही संकेत दिया था कि यह चुनाव प्रत्याशियों से ज्यादा गुटों की साख का इम्तहान बनता जा रहा है। आज परिणाम के बाद यह साफ है कि चुनाव भले जीत लिया गया हो, लेकिन यदि समय रहते संगठनात्मक मरहम नहीं लगाया गया, तो यह गुटबाजी आने वाले चुनावों में भाजपा के लिए भारी पड़ सकती है।

यह लड़ाई अब पद की नहीं, विश्वास को बचाने की है। और यही वह बिंदु है, जहां संगठन को सबसे ज्यादा सजग, संवेदनशील और दूरदर्शी होने की जरूरत है।

अब जीतने वाले के लिए यह आवश्यक है कि वह पूरे वार्ड का प्रतिनिधि बनकर उभरे, न कि किसी एक गुट का। और हारने वालों के लिए यह समय आत्मविश्लेषण का है—नाराज़गी का नहीं। संगठन तभी मजबूत होता है, जब जीत विनम्र हो और हार परिपक्व।

👉खबर : दीपक जैन (संवाददाता सुसनेर ) ✍️सार्थक चिंतन : संपादक की दृष्टि

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