सुसनेर सिविल अस्पताल मामला: एक मौत के बाद दो ज्ञापन, आमजन और स्वास्थ्य प्रशासन आमने-सामने

गोपाल प्रजापत की मौत पर उठा सवाल—ऑक्सीजन, एंबुलेंस और सिस्टम की जिम्मेदारी किसकी?
जनमत जागरण @ सुसनेर से दीपक जेन ।
सुसनेर सिविल अस्पताल में युवक गोपाल प्रजापत की मौत के बाद उपजा आक्रोश अब सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं रहा। यह मामला अब स्वास्थ्य व्यवस्था, पुलिस प्रशासन और आमजन के बीच टकराव का रूप ले चुका है। शनिवार को इस पूरे प्रकरण में अस्पताल प्रशासन व स्वास्थ्य कर्मचारियों तथा आम नागरिकों—दोनों पक्षों ने अपने-अपने ज्ञापन जिला कलेक्टर के नाम नायब तहसीलदार राजेश श्रीमाल को सौंपे। दोनों ज्ञापनों में जहां एक ओर अव्यवस्था और संवेदनहीनता के आरोप हैं, वहीं दूसरी ओर असुरक्षा, दबाव और उग्र भीड़ से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होने की पीड़ा सामने आई है।
🔴 आम नागरिकों का पक्ष: “ऑक्सीजन नहीं, व्यवस्था बेदम”

आम नागरिकों द्वारा दिए गए ज्ञापन में बताया गया कि 16 जनवरी 2026 को इतवारिया बाजार निवासी गोपाल पिता प्रेमनारायण प्रजापत ने अज्ञात कारणों से फांसी लगाई। गंभीर अवस्था में सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा उन्हें सिविल अस्पताल सुसनेर लाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के दौरान ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ी। लेकिन अस्पताल में उपलब्ध दोनों ऑक्सीजन सिलेंडर खाली पाए गए। स्थिति बिगड़ने पर एंबुलेंस से आगर रेफर किया गया, किंतु एंबुलेंस में भी ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं थी। इस अव्यवस्था के चलते युवक की जान चली गई।
ज्ञापन में आमजन ने जिम्मेदार चिकित्सक पर कार्रवाई, मृतक के परिजन को सरकारी नौकरी एवं मुआवजा देने की मांग की है। इसके साथ ही एसडीओपी देवनारायण यादव पर शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन के दौरान अभद्र भाषा के प्रयोग और कथित रूप से यह कहने का आरोप लगाया गया कि “मरने वाला मर गया, हम क्या करें”। आम नागरिकों ने एसडीओपी पर क्षेत्र में अवैध गतिविधियों, नशे के बढ़ते कारोबार और पुलिस की निष्क्रियता को संरक्षण देने के आरोप भी लगाए हैं। कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में उग्र आंदोलन की चेतावनी दी गई है।
🔴 अस्पताल प्रशासन का पक्ष: “डर के साये में इलाज”

वहीं सिविल अस्पताल के डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और कर्मचारियों द्वारा दिए गए ज्ञापन में कहा गया कि वे सीमित संसाधनों के बावजूद शासन के नियमों के तहत जनसेवा कर रहे हैं, लेकिन लंबे समय से अस्पताल परिसर के भीतर और बाहर अनैतिक गतिविधियों, दबाव और उग्र प्रदर्शनों के कारण स्वास्थ्य सेवाएं बाधित हो रही हैं।
ज्ञापन के अनुसार 16 जनवरी की रात करीब 7 बजे से 10 बजे तक कुछ स्थानीय लोगों ने डॉक्टरों, महिला कर्मचारियों और स्टाफ के साथ अभद्र टिप्पणियां कीं, अस्पताल को “बूचड़खाना” कहकर नारेबाजी की और सार्वजनिक रूप से अपमानित किया। कर्मचारियों का कहना है कि रोगी कल्याण समिति के माध्यम से बनी दुकानों के कुछ बकायेदार दुकानदारों ने किराया वसूली से बचने के लिए प्रदर्शन को हवा दी।
स्टाफ ने पूर्व में अस्पताल में हुई तोड़फोड़, मारपीट, बाहरी लोगों द्वारा अस्पताल के शौचालय, बिजली और पानी के दुरुपयोग, एंबुलेंस शुल्क को लेकर गलत दबाव तथा इमरजेंसी गेट पर अतिक्रमण जैसी समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया। ज्ञापन में अस्पताल में पुलिस चौकी, सुरक्षा बल की तैनाती, पुरानी कृषि उपज मंडी की भूमि अस्पताल को देने, अतिक्रमण हटाने और व्यवस्था सुधारने की मांग की गई है। साथ ही स्टाफ ने मृतक के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।
🔴 दोनों पक्षों की एक राय: जांच हो, सच सामने आए
हालांकि दोनों ज्ञापनों की भाषा और आरोप अलग-अलग हैं, लेकिन एक बिंदु पर दोनों पक्ष सहमत नजर आते हैं—
👉 घटना की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।
एक ओर आमजन सवाल कर रहे हैं कि यदि समय पर ऑक्सीजन मिल जाती तो क्या एक जान बच सकती थी? वहीं दूसरी ओर डॉक्टर और कर्मचारी पूछ रहे हैं कि जब अस्पताल सुरक्षित नहीं होगा, तो बेहतर इलाज कैसे संभव होगा?
🔴 सबसे बड़ा सवाल
यह पूरा मामला यह सोचने को मजबूर करता है कि—
▪️क्या स्वास्थ्य व्यवस्था आपात स्थितियों के लिए तैयार है?
▪️क्या जन आक्रोश को संवाद से संभालने की जगह बल और भाषा का सहारा लिया जा रहा है?
▪️और क्या सिस्टम की कमियों की कीमत आम नागरिकों और स्वास्थ्यकर्मियों—दोनों को चुकानी पड़ रही है?
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह सच, संवेदना और सख्ती—तीनों के संतुलन के साथ इस मामले में क्या कदम उठाता है।
जब मौत के बाद भी सिस्टम नहीं जागता
सुसनेर की घटना कोई सामान्य समाचार नहीं है। यह एक ऐसा आईना है, जिसमें हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक संवेदनशीलता और सामाजिक संयम—तीनों की असल तस्वीर दिखाई देती है। गोपाल प्रजापत की मौत के बाद उठे सवाल सिर्फ ऑक्सीजन सिलेंडर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह सवाल उस पूरे सिस्टम पर हैं जो संकट के समय तैयार नहीं दिखता।
अगर अस्पताल में ऑक्सीजन नहीं थी, तो यह सीधी लापरवाही है।
अगर एंबुलेंस में भी ऑक्सीजन नहीं थी, तो यह दोहरी विफलता है।
और यदि किसी जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी ने संवेदनहीन भाषा का प्रयोग किया, तो यह प्रशासनिक नैतिकता की हार है।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही चिंताजनक है। यदि डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी भय, दबाव और उग्र भीड़ के बीच इलाज करने को मजबूर हैं, तो यह भी एक गंभीर सच्चाई है। अस्पताल युद्ध का मैदान नहीं होता और न ही डॉक्टर दुश्मन। व्यवस्था की खामियों का गुस्सा उन पर उतारना समाधान नहीं हो सकता।
यह टकराव बताता है कि समाज और सिस्टम के बीच संवाद टूट चुका है। जब संवाद खत्म होता है, तब प्रदर्शन, आरोप और अविश्वास जन्म लेते हैं। सुसनेर में यही हो रहा है—जहां एक मौत ने दो पक्ष खड़े कर दिए हैं, जबकि असली दोषी शायद वह व्यवस्था है, जो समय रहते सुधारी नहीं गई।
👉 अब जरूरत है—
✔ निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच की
✔ जिम्मेदारों पर स्पष्ट कार्रवाई की
✔ अस्पतालों को सुरक्षित और संसाधनयुक्त बनाने की
✔ और सबसे जरूरी—संवेदनशील प्रशासन की
क्योंकि अगर सिस्टम हर मौत के बाद भी नहीं जागेगा, तो अगला सवाल सिर्फ किसकी गलती का नहीं होगा—
बल्कि यह होगा कि अगली बारी किसकी है?
✍️ राजेश कुमरावत ‘सार्थक’



