'सार्थक' दृष्टिकोणराजीव जी दीक्षित स्वास्थ्य श्रृंखलाहेल्थ

अल्युमिनियम के बर्तन – भोजन के नाम पर ज़हर परोसती आधुनिक रसोई? जानिए राजीव जी दीक्षित की चेतावनी


भाग 11: अल्युमिनियम के बर्तन – खाना पकाने की परंपरा या कैंसर का खतरा?

“विज्ञान नहीं, विवेक की बात – देसी जीवनशैली का देसी विश्लेषण”

जब भोजन औषधि हो, तो उसका पात्र भी औषधीय होना चाहिए।
परंतु आज हमारे रसोईघर में सबसे ज़्यादा जगह घेर बैठे हैं – अल्युमिनियम के बर्तन।
क्या आपने कभी सोचा है कि ये बर्तन आपकी थाली में पोषण परोसते हैं या ज़हर?

राजीव जी दीक्षित क्या कहते हैं?

राजीव जी कहते थे –
“अल्युमिनियम एक विषैला धातु है, जो शरीर में जाकर रक्त के साथ मिलती है और धीरे-धीरे मस्तिष्क, हृदय, यकृत और किडनी को प्रभावित करती है।”
इस धातु से बने बर्तन गरम होते ही रासायनिक क्रिया में भाग लेने लगते हैं और भोजन के साथ अल्युमिनियम कण हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

आज मधुमेह, थायराइड, कैंसर और मानसिक रोगों में जो असामान्य बढ़ोतरी हुई है – उसका एक छुपा हुआ कारक यही एलुमिनियम बर्तन हैं।

क्यों छोड़ें अल्युमिनियम बर्तन?

  • यह धातु प्राकृतिक नहीं, शुद्धता रहित और गर्मी से प्रतिक्रिया देने वाली होती है।
  • शरीर में एल्युमिनियम की मात्रा बढ़ना मानसिक रोगों, भूलने की बीमारी (Alzheimer’s), हड्डियों की कमजोरी से जुड़ा हुआ पाया गया है।
  • यह आयुर्वेद और वेदों के विरुद्ध है – जहाँ केवल मिट्टी, तांबा, पीतल, कांस्या और लोहे को ही पात्र कहा गया है।

क्या भोजन पकता है या सिर्फ उबलता है?

राजीव जी दीक्षित ने इस पर भी बड़ा भावुक और वैज्ञानिक विश्लेषण किया—
“भोजन तभी पकता है जब उसे हवा का स्पर्श और सूर्य का प्रकाश दोनों मिले।”
कुकर या बंद बर्तनों में न तो हवा का संपर्क होता है और न ही सूर्य का प्रकाश। ऐसे में भोजन सिर्फ उबलता है, सॉफ्ट तो हो जाता है लेकिन उसके पोषक गुण नष्ट हो जाते हैं।

पवित्र उदाहरण: जगन्नाथ पुरी का भोग

आज भी जगन्नाथ पुरी में भगवान का भोग मिट्टी के बर्तनों में, खुले में, परंपरागत रूप से बनाया जाता है।
“जगन्नाथ का भात – जगत पसारे हाथ”
इसमें भोग पकता है – उसकी ऊर्जा, सात्विकता और पाचन शक्ति जीवित रहती है।

यह हमें सिखाता है कि अन्न सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि चेतना निर्माण का स्त्रोत है।


क्या करें? समाधान क्या है?

  • अल्युमिनियम को तुरंत रसोई से बाहर करें।
  • तांबे, पीतल, कांसे, लोहे और मिट्टी के बर्तनों को अपनाएँ।
  • भोजन पकाने के पारंपरिक तरीकों को फिर से अपनाएँ – खुली हवा में, धीमी आंच पर, मिट्टी या कांस्य पात्रों में।

सार्थक चिंतन

जीवन में सुविधा का नहीं, सद्गुण और सद्बुद्धि का वास ज़रूरी है।
भोजन के माध्यम से ही मनुष्य का तन, मन और विचार निर्मित होते हैं।
यदि हम ज़हर के पात्रों में अन्न पकाएँगे, तो जीवन भी विषाक्त हो जाएगा।

परंपरा कोई पिछड़ापन नहीं, वह सहस्त्रों वर्षों की अनुभूति का अमृत है।
राजीव जी दीक्षित ने जो चेतावनियाँ दी हैं, उन्हें सिर्फ सुनें नहीं – जीवन में उतरना ही सच्चा सम्मान होगा।

लेखक: राजेश कुमरावत ‘सार्थक’। संपादक– जनमत जागरण न्यूज़ पोर्टल। स्वास्थ्य संकल्प – 365 दिन। (स्वदेशी विज्ञान प्रेरणा स्रोत: श्री राजीव जी दीक्षित)


Related Articles

error: Content is protected !!