सुसनेर में मानवता शर्मसार: नाले में मिला गर्भस्थ शिशु का शव, CCTV खंगाल रही पुलिस

इटवारिया बाजार पुलिया के पास नाले में मिला गर्भस्थ शिशु, मर्ग कायम कर जांच में जुटी पुलिस
जनमत जागरण @ सुसनेर— संवाददाता : दीपक जैन, सुसनेर
“जब संवेदनाएं मर जाती हैं, तब इंसानियत भी सवालों के कटघरे में खड़ी हो जाती है…”
सोमवार सुबह लगभग साढ़े 9 बजे नगर के इतवारिया बाजार पुलिया के समीप नरबदिया नाले में उस समय एक हृदयविदारक दृश्य सामने आया, जब एक सफाईकर्मी को सफाई के दौरान गर्भस्थ शिशु का शव मिला। यह दृश्य इतना पीड़ादायक था कि जिसने भी देखा, उसकी आत्मा तक झकझोर गई।
सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच प्रारंभ कर दी। घटना की खबर फैलते ही पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई। बड़ी संख्या में लोग घटनास्थल पर एकत्रित हो गए। हर किसी के मन में एक ही सवाल गूंज रहा था—
आखिर कौन है वह निर्मम हृदय, जिसने अपने ही अंश को इस तरह नाले में फेंक दिया?
मामले की गंभीरता को देखते हुए थाना प्रभारी अक्षय सिंह बेस पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और आवश्यक कार्रवाई शुरू की।

पुलिस के अनुसार, शव को सिविल अस्पताल सुसनेर भेजा गया है, जहां पोस्टमार्टम (PM) कराया जा रहा है। मर्ग कायम कर मामले की विस्तृत जांच की जाएगी। साथ ही आसपास के क्षेत्र में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगाली जा रही है, ताकि घटना से जुड़े महत्वपूर्ण सुराग जुटाए जा सकें।
✍️ संपादकीय
“कहाँ खो गई ममता…? और कब तक यूं ही मरती रहेगी मानवता?”
सुसनेर की यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि समाज के भीतर गहराती संवेदनहीनता का एक भयावह आईना है। एक गर्भस्थ शिशु—जो इस दुनिया में आने से पहले ही जीवन की उम्मीद लिए था—उसे इस तरह नाले में फेंक देना केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवता की आत्मा पर लगा गहरा घाव है।
यह प्रश्न केवल उस “मां” तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे समाज के सामने खड़ा है—
क्या हम ऐसे हालात बना रहे हैं, जहाँ एक मां को अपने ही बच्चे से मुंह मोड़ना पड़ रहा है?
या फिर यह हमारी सामाजिक संरचना की विफलता है, जहाँ भय, लांछन और अस्वीकार का दबाव इतना बढ़ गया है कि जीवन की शुरुआत ही मौत में बदल रही है?
आज आवश्यकता केवल दोषी को पकड़ने की नहीं, बल्कि उस सोच को बदलने की है—
जहाँ बेटियों को बोझ समझा जाता है,
जहाँ अविवाहित मातृत्व को अपराध माना जाता है,
जहाँ संकट में घिरी महिला के पास कोई सहारा नहीं होता।
समाज को यह समझना होगा कि—
👉 हर जीवन अनमोल है, चाहे वह जन्मा हो या जन्म लेने वाला हो।
👉 हर संकटग्रस्त महिला को सहारा, संवेदना और समाधान मिलना चाहिए, न कि तिरस्कार।
यदि आज भी हम नहीं चेते, तो कल ऐसी घटनाएं केवल खबरें नहीं रहेंगी—वे हमारी संवेदनाओं की मौत का इतिहास बन जाएंगी। ✍️“सार्थक दृष्टिकोण” | राजेश कुमरावत ‘सार्थक’संपादक, जनमत जागरण



