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“समर्पण में राम, मनोमंथन में कथा : सालरिया में स्वामी गोपालानंद सरस्वती और कमलेश भाई शास्त्री का दिव्य संदेश”


सालरिया में श्रीराम कथा का पंचम दिवस : समर्पण जहां, वहीं साक्षात राम का वास – स्वामी गोपालानंद सरस्वती

जनमत जागरण @ सालरिया/सुसनेर, 27 अप्रैल।
जनपद सुसनेर की ग्राम पंचायत सालरिया में नवनिर्मित शनिदेव एवं नवग्रह मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत आयोजित सप्त दिवसीय श्रीराम कथा के पंचम दिवस पर आध्यात्मिक चेतना की दिव्य धारा प्रवाहित हुई। कार्यक्रम में क्रांतिकारी कथा प्रवक्ता कमलेश भाई शास्त्री ने श्रीराम कथा के गूढ़ संदेशों को सहज, सरस व ओजस्वी शैली में श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया।

कमलेश भाई शास्त्री ने विवेकचूड़ामणि के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा, “जिसके चित्त में प्रसन्नता स्थायी हो, वही भगवान के साक्षात दर्शन कर सकता है।” उन्होंने व्याख्या करते हुए कहा कि मनुष्य के पास जो भी हो, जहां भी हो, उसमें प्रसन्न रहना ही ईश्वर प्राप्ति का प्रथम सोपान है। सत्संग और हरिस्मरण ही इस प्रसन्नता को अक्षुण्ण बनाए रखने के प्रभावी साधन हैं। कथा मनोरंजन नहीं, अपितु मनोमंथन का साधन है — इस मूल भावना को स्मरण रखते हुए ही सत्संग का सच्चा लाभ संभव है।

इस अवसर पर श्रीराम कथा में पधारे 31 वर्षीय गो पर्यावरण एवं अध्यात्म चेतना पदयात्रा के प्रणेता एवं श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा के राष्ट्रीय संयोजक पूज्य स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज का व्यासपीठ पर मंगलमय स्वागत किया गया। व्यासपीठ पर पौथी पूजन तथा शॉल एवं भगवती गोमाता की छवि भेंट कर परस्पर बहुमान का भावपूर्ण आदान-प्रदान हुआ।

अपने आशीर्वचन में पूज्य स्वामी गोपालानंद सरस्वती जी ने कहा –
“राम” शब्द ही विश्राम का पर्याय है। जहां राम का स्मरण है, वहां थकान नहीं, वहीं विश्रांति है। रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने स्पष्ट कहा है — ‘विप्र धेनु सुर सन्त हित, लिन मनुज अवतार’। अर्थात ब्राह्मण, गौ और संत भगवान के साक्षात प्रिय हैं।
स्वामीजी ने कहा कि गाय और ब्राह्मण एक ही वृक्ष की दो शाखाएं हैं — एक से मंत्रों का झरना फूटता है, दूसरे से हविष्य प्रवाहित होता है। जहां गाय वास करती है, वहां राम का अवतरण निश्चित है। राम को धारण करने के लिए ‘राम’ बनना पड़ता है, और ‘राम’ बनने के लिए त्याग का मार्ग अपनाना पड़ता है।
उन्होंने कहा, “जहां अपहरण नहीं, समर्पण का भाव हो — वहीं साक्षात राम का वास होता है।”

स्वामीजी ने नवग्रह व शनिदेव मंदिर के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि शनिदेव सूर्य पुत्र हैं और गोमाता के गुरु भी सूर्य ही हैं। रामजी स्वयं सूर्यवंशी हैं, अतः शनिदेव और रामजी का आपसी संबंध आत्मिक एवं गहन है। उन्होंने कहा, “शनि देवता अधिक लेते नहीं, अधिक देते हैं, किंतु न्यायप्रिय हैं। जहां गायों की सेवा होती है, वहां अन्याय स्वतः समाप्त हो जाता है।”

बावड़ी क्षेत्र पुनः हुआ जागृत
स्वामीजी ने कहा कि प्राचीनकाल में बावड़ी क्षेत्र आध्यात्मिक चेतना से जागृत था, किंतु विगत समय में कलह एवं व्यक्तिगत चर्चाओं ने इस स्थान को निर्जन कर दिया था। अब पुनः शनिदेव, नवग्रह, भगवान शंकर तथा श्रीरामकथा के अवतरण से यह भूमि पुनः पुण्य भूमि बन गई है। उन्होंने क्षेत्रवासियों का आह्वान किया कि अब इस जागृत धरोहर में केवल हरि चर्चा, गो सेवा व धर्म चेतना का ही प्रवाह सतत बना रहे।

शिवशक्ति महायज्ञ में उमड़ा श्रद्धा का सागर
महोत्सव के दौरान प्रातः एवं सायंकालीन सत्रों में आयोजित 21 कुंडीय शिवशक्ति महायज्ञ में क्षेत्र के 78 से अधिक यजमान परिवारों ने भाग लिया। यज्ञ का संचालन यज्ञाचार्य पंडित केदारदत्त व्यास (हिम्मतगढ़, राजस्थान) एवं उपाचार्य पंडित मांगीलाल व्यास (सरखेड़ी, राजस्थान) के सान्निध्य में संपन्न हुआ। इस दौरान जल शय्या, रुद्राभिषेक तथा हवन जैसे शुभ कर्मकांडों से वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से गुंजायमान रहा।

युवा कार्यकर्ताओं को मिला आशीर्वाद
स्वामीजी ने नवग्रह प्राण प्रतिष्ठा आयोजन में तन-मन से संलग्न युवा कार्यकर्ताओं को सम्मानित कर उनका उत्साहवर्धन किया। उन्होंने कहा कि युवाओं के उत्साह और श्रद्धा से ही धर्म की नींव मजबूत होती है।


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