रावरखेड़ी से उठी बाजीराव की पुकार : आइए, वीरता को प्रणाम करें! आज रावरखेड़ी में पुण्यस्मरण यात्रा — वीरता, स्वाभिमान और हिंदवी स्वराज्य का उत्सव!

हिंदवी स्वराज्य के ध्वजवाहक को समर्पित “चलो रावरखेड़ी” का महाआह्वान
उज्जैन, जनमत जागरण।
देश के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित एक अप्रतिम नाम — रणधुरंधर, अजेय योद्धा, हिंदुत्व के वीर सेनापति — श्रीमंत बाजीराव बल्लाळ। वह नाम, जिसने मुगल सल्तनत की रीढ़ तोड़ी, वह शौर्य, जिसने हिंदवी स्वराज्य का परचम अटक से कटक तक फहराया। ऐसे तेजस्वी पुरुष की पुण्यतिथि के अवसर पर एक बार फिर कृतज्ञता का आह्वान गूंज उठा है। उज्जैन से लेकर समूचे भारतवर्ष तक, ह्रदयों में फिर धधक उठी है एक पुकार — “चलो रावरखेड़ी”।
आस्था और गर्व का संगम : बाजीराव की समाधि पर समर्पण
हर वर्ष कुछ मतवाले ‘बाजीराव के सिपाही’, नर्मदा तट पर स्थित रावरखेड़ी गांव में, बाजीराव की समाधिस्थल पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने पहुंचते हैं। इस बार दिनांक 28 अप्रैल को आयोजित इस पुण्यस्मरण यात्रा के लिए, सोशल मीडिया और हिंदुत्व प्रेमियों के बीच एक ओजस्वी आह्वान गूंजा है — “अपने व्यस्त जीवन से कुछ क्षण चुराइए, और आइए रावरखेड़ी में अपने नायक का वंदन कीजिए।”
जहां इतिहास बोलता है : साधारण गांव में असाधारण विरासत
रावरखेड़ी — एक साधारण सा गांव, जहां एक साधारण किले में वह असाधारण व्यक्तित्व विश्राम कर रहा है, जिसने हैदराबाद के निजाम, बीजापुर और अहमदनगर के सुल्तान, मुंबई के पुर्तगालियों, दक्षिण के डच, ब्रिटिश और फ्रांसीसी सेनाओं और दिल्ली के मुगल साम्राज्य तक को घुटनों पर ला दिया था। श्रीमंत बाजीराव, जिन्होंने अपने जीवनकाल में 41 में से 41 युद्धों में विजय का इतिहास रचा, भारतीय युद्धकला और रणनीति के कालजयी नायक रहे हैं।
बीस वर्षों में ध्वस्त हुई मुगलिया सल्तनत : बाजीराव का अद्भुत तेज
1526 में बाबर द्वारा स्थापित मुगलिया सत्ता, जिसने 1707 में औरंगजेब के निधन तक पूरे भारत को अपनी जंजीरों में जकड़ा था, वह सत्ता श्रीमंत बाजीराव के तेज से मात्र बीस वर्षों में धूल में मिल गई। दिल्ली का सुल्तान पुणे की पेशवाई का करदाता बन गया। हिंदू आत्मगौरव के दीप को प्रज्वलित करने वाले इस रणपुरुष ने सिद्ध कर दिया — “जो जीता, वो बाजीराव।”
स्मरण नहीं, संकल्प बनाएं : युवाओं को नायक का संदेश
आज जब युवा पीढ़ी के सामने अपने इतिहास के विजेता नायकों को स्मरण कराने की आवश्यकता है, तब रावरखेड़ी जैसे तीर्थ स्थल हमें एक नई ऊर्जा, नई चेतना देते हैं। बाजीराव केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि हिंदवी स्वराज्य के ध्वजवाहक, भारतीय स्वाभिमान के अमर प्रतीक थे।
पुण्यतिथि पर करें सच्चा श्रद्धा-सुमन अर्पण
यदि आप 28 अप्रैल को रावरखेड़ी पहुंच सकते हैं, तो स्वागत है! यदि नहीं, तो अपने नगर, गांव या शहर में, स्कूलों-कॉलेजों में छोटे कार्यक्रम आयोजित कर, परिचर्चा कर, या स्मृति स्थलों पर श्रद्धा-सुमन चढ़ाकर इस पुण्यतिथि को गौरव से मनाइए। बाजीराव की प्रतिमाएं लगवाइए, चौराहों का नामकरण कराइए, और हिंदवी स्वराज्य के इस अजेय नायक के पदचिह्नों पर चलने का संकल्प लीजिए।
सार्थक चिंतन :
रावरखेड़ी की माटी आज भी श्रीमंत बाजीराव के स्वाभिमान की गाथा गा रही है। यह केवल एक समाधि नहीं, अपितु हिंदवी स्वराज्य के अमर संकल्प की प्रेरणा स्थली है। आइए, इस पुण्यस्मृति पर प्रण करें कि हम भी अपने जीवन में राष्ट्रभक्ति, साहस और आत्मगौरव के दीप जलाएंगे। बाजीराव का विजयोत्सव हमारी चेतना में अनंत काल तक गूंजता रहे!



