“डोंगरगांव वासियों के धैर्य का अंत – 16 अगस्त से आरपार की लड़ाई , होगा चरणबद्ध आंदोलन” , प्रशासन पर सवाल

“सुनिए आदरणीय गडकरी जी, गांव बचेगा तभी विकास कहलाएगा, गांव उजड़ेगा तो विनाश कहलाएगा… अभी भी मौका है, गांव वालों की सुनिए, वरना हम बर्बाद हो जाएंगे — यह कैसा विकास है?”
डोंगरगांववासियों के आक्रोश से निकले ये शब्द रविवार को नगर बंद के दौरान बार-बार गूंजते रहे। ग्रामीणों ने कहा कि सड़कें बनें, प्रगति हो, इसका विरोध नहीं, लेकिन किसी गांव का अस्तित्व मिटाकर विकास के नाम पर विनाश स्वीकार नहीं किया जा सकता। पीड़ा इतनी गहरी है कि अब वे चेतावनी दे रहे हैं — “अगर हमारी मांग नहीं मानी गई, तो संघर्ष की आग सड़कों से लेकर सरकार के दरबार तक पहुंचेगी।”
डोंगरगांव के धैर्य का अंत – 16 अगस्त से आरपार की लड़ाई, प्रशासन पर सवाल
जनमत जागरण @ डोंगरगांव (सोयतकलां) –
उज्जैन-झालावाड़ राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-552G) के फोरलेन विस्तार को लेकर अब मामला सिर्फ सड़क का नहीं रहा, यह जनता की रोज़मर्रा की जिंदगी, अस्तित्व, सुरक्षा और भविष्य से जुड़ चुका है। फोरलेन बाईपास की मांग कर रहे डोंगरगांव के ग्रामीणों का धैर्य अब जवाब दे चुका है। बार-बार ज्ञापन देने, रैली निकालने और शांतिपूर्ण विरोध के बावजूद न तो प्रशासन ने ठोस कदम उठाए और न ही जनप्रतिनिधियों ने जिम्मेदारी निभाई। नतीजा यह हुआ कि अब ग्रामीणों ने “आरपार की लड़ाई” का ऐलान कर दिया है।

रविवार 10 अगस्त को नगरवासियों ने सुबह 9 बजे से अपने-अपने प्रतिष्ठान बंद रखकर प्रशासन को कड़ा संदेश दिया। “बायपास – बायपास” और “डोंगरगांव से दुर्व्यवहार नहीं चलेगा” के नारों से बस स्टैंड गूंज उठा। मौके पर थाना प्रभारी रामगोपाल वर्मा अपनी टीम सहित पहुंचे, लेकिन ग्रामीणों के गुस्से के आगे आश्वासन की पुरानी पोटली अब बेअसर रही।
❗राजनेता और प्रशासन – केवल आश्वासन की राजनीति
ग्रामीणों का आरोप है कि एसडीएम, कलेक्टर, NHAI, सांसद और यहां तक कि मुख्यमंत्री तक को ज्ञापन सौंपने के बावजूद केवल “देखेंगे – करेंगे” जैसे वादे सुनने को मिले। वास्तविक कार्रवाई शून्य रही। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल टालमटोल की नीति है, जिससे उनके भविष्य और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ हो रहा है।
🔥 आंदोलन की रूपरेखा – चरणबद्ध संघर्ष
अब आंदोलन ही विकल्प? अब यह सिर्फ ज्ञापन या प्रार्थना पत्र नहीं, बल्कि जनआक्रोश की दस्तक है। बायपास संघर्ष समिति के अध्यक्ष एवं सरपंच प्रेमसिंह सोनगरा ने घोषणा की—

“16 अगस्त से आंदोलन का पहला चरण शुरू होगा, 6 दिन तक धरना-प्रदर्शन चलेगा। इसके बाद भी मांग न मानी गई तो भूख हड़ताल और आमरण अनशन तक जाएंगे।”
इस आंदोलन में सुरेश शर्मा, पुनमचंद्र गुप्ता, कवरचंद्र पाटीदार, भूपेंद्र गुप्ता, भंवरसिंह सोनगरा, शरद शर्मा, गिरीश शर्मा, दीपक गुप्ता और राधेश्याम गुप्ता सहित पूरा गांव एकजुट है।
बच्चों और महिलाओं तक की भागीदारी

7 अगस्त को निकाली गई रैली में न केवल पुरुष बल्कि महिलाएं, बच्चे और विकलांग तक शामिल हुए। यह इस बात का प्रमाण है कि बाईपास की मांग केवल विकास का मुद्दा नहीं, बल्कि गांव के अस्तित्व और सम्मान का सवाल बन चुकी है।
प्रशासन की जवाबदेही तय होना जरूरी

गांववासियों का सवाल सीधा है—
“जब हर जिम्मेदार को समस्या बताई जा चुकी, तब समाधान क्यों नहीं? क्या गांव वालों का जीवन और सुरक्षा किसी रिपोर्ट फाइल में दबा दी जाएगी?”
अब यह संघर्ष केवल एक सड़क के मोड़ का नहीं, बल्कि ग्रामीणों के आत्मसम्मान और अधिकार का आंदोलन बन चुका है। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के पास अब भी समय है—वरना 16 अगस्त से डोंगरगांव के संघर्ष की गूंज हर दिशा में सुनाई देगी।
🏚️ विकास या विनाश? जनता के प्रश्न
गांववासी प्रश्न कर रहे हैं – क्या सरकार का विकास मॉडल इंसानों की कीमत पर ही संभव है?
पहले स्टेट हाईवे , फिर मेगा हाईवे, ओर अब फोरलेन, और अब उसी ट्रैक पर तोड़फोड़। दो साल पहले टूटी ज़िंदगियाँ अब फिर से संकट में हैं।

✍️ सार्थक चिंतन
“जहां सड़क बनती है, वहां सिर्फ डामर नहीं बिछता – बिछती है भविष्य की उम्मीद या विनाश की नींव। चुनाव सरकार का है।”



