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सिंहस्थ 2028: मोदी विज़न और मोहन मिशन पर सुस्ती का साया, अधिकारी नहीं जुटा पा रहे रफ्तार

सिंहस्थ 2028 : आस्था, आकांक्षा और प्रशासन के बीच की वास्तविक परीक्षा

✍️ जहाँ आस्था और इतिहास एक साथ साँस लेते हैं, जहाँ क्षिप्रा का हर तट धर्म, संस्कृति और सनातन चेतना का साक्षी है — वहीँ आज एक और परीक्षा की तैयारी चल रही है — सिंहस्थ 2028।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का स्पष्ट विज़न है कि उज्जैन का सिंहस्थ आयोजन प्रयागराज और हरिद्वार की परंपराओं से भी श्रेष्ठ और व्यवस्थित हो। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस दृष्टि को मिशन मोड में रूपांतरित किया है। योजनाएँ भव्य हैं, लक्ष्य ऊँचे हैं, परंतु प्रश्न वही पुराना है — क्या प्रशासनिक तंत्र उतनी ही प्रतिबद्धता से काम कर रहा है जितनी भावना से यह आयोजन तैयार किया जा रहा है?


🚩 सिंहस्थ 2028 की तैयारी का केनवास विस्तृत और विचारशील है।
सड़क, पुल, घाट, भवन निर्माण से लेकर क्षिप्रा, नर्मदा, गंभीर और खान नदी के जल प्रबंधन तक — सभी स्तरों पर योजनाएँ आकार ले रही हैं। खान नदी डायवर्जन जैसा महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट अब जमीन पर उतरता दिख रहा है।
मुख्यमंत्री स्वयं लगातार बैठकें ले रहे हैं, समीक्षा कर रहे हैं, और यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सिंहस्थ 2028 एक राष्ट्रीय मॉडल आयोजन बने।

फिर भी, धरातल पर प्रश्न उठ रहे हैं —
क्या काम तय गति से पूरे होंगे?
क्या योजनाएँ यथार्थ के अनुरूप हैं या काग़ज़ी उत्साह में स्वीकृतियाँ ज्यादा हो गईं?

इन प्रश्नों के पीछे जनता की चिंता है, और उस चिंता के मूल में प्रशासनिक मनोवृत्ति की शिथिलता।


⚖️ प्रशासनिक और तकनीकी पहलू

मेला अधिकारी के रूप में आईएएस आशीष सिंह निस्संदेह एक सक्षम और परिष्कृत नेतृत्वकर्ता हैं, पर उनकी टीम में कथित अहंकार, अनुभवहीनता और एकतरफा दृष्टिकोण जैसी कमजोरियाँ काम की गति को बाधित कर रही हैं।
नगर निगम, लोक निर्माण विभाग और जल संसाधन विभाग जैसी मुख्य एजेंसियाँ वह गंभीरता नहीं दिखा पा रही हैं, जिसकी इस स्तर के आयोजन को आवश्यकता है।
तकनीकी अमले की “घिसी-पिटी कार्यशैली” योजनाओं को विलंबित कर रही है, जबकि प्रयागराज और हरिद्वार के अनुभवों में सशक्त तकनीकी नेतृत्व ही सफलता का सूत्र रहा है।


🚦व्यवस्था और समन्वय की चुनौती

सिंहस्थ के दौरान सबसे बड़ी जिम्मेदारी पुलिस विभाग पर आती है — यातायात, श्रद्धालु प्रबंधन और कानून-व्यवस्था।
दुर्भाग्य से अब तक की तैयारियाँ वर्चुअल चर्चाओं तक सीमित दिखती हैं।
रेलवे विभाग से तालमेल की कमी ने स्टेशन अपग्रेडेशन और विस्तार की गति धीमी कर दी है।
यदि यात्रियों को पिगलेश्वर, चिंतामन गणेश या विक्रमनगर में ही उतारना पड़ा तो भीड़ प्रबंधन की चुनौती और बढ़ जाएगी।
पारंपरिक मोहनपुरा और जयसिंहपुरा जैसे हाल्ट स्टेशनों का पुनर्विचार आवश्यक है, जिससे भीड़ का दबाव मुख्य स्टेशन पर कम हो सके।

सड़क मार्ग से लगभग 70% आवागमन होगा — ऐसे में पार्किंग स्थल, ट्रैफिक फ्लो और सुगम कनेक्टिविटी पर गंभीर सोच की आवश्यकता है।


🌺 निष्कर्ष

सिंहस्थ कोई साधारण आयोजन नहीं — यह आस्था, अनुशासन और प्रशासन की त्रिवेणी है।
प्रधानमंत्री मोदी जी के विज़न और मुख्यमंत्री मोहन यादव के मिशन को गति तभी मिलेगी जब नीचे तक बैठा प्रशासनिक भावशून्यता का जड़त्व टूटेगा।
समय कम है, संकल्प बड़ा है।
अब उज्जैन को सिर्फ योजना पत्रों में नहीं, कार्यस्थलों पर भी सिंहस्थ की आभा दिखानी होगी।
जनता की आस्था को प्रशासनिक दक्षता से जोड़ना ही इस महाकुंभ की सबसे बड़ी साधना है।

✍️ प्रकाश त्रिवेदी
संपादक – SamacharLine.com

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