राज्य स्तर पर खलबली: 34 नगर निकायों की बड़ी गलती: जनसंख्या से अधिक आवास स्वीकृति के कारण PMAY-Urban 2.0 पर ब्रेक, सुसनेर में 600 अतिरिक्त आवास

पहले फेस में ‘ज्यादा’ स्वीकृत आवास — अब पीएम आवास 2.0 के दूसरे फेज के लाखों आसमान टूटे; सुसनेर में ही 600 आवास अधिक स्वीकृत
✍️ सुसनेर से दीपक जैन की रिपोर्ट
सुसनेर / भोपाल। एक सरकारी पत्र ने जैसे अचानक पर्दा उठाया — पहले चरण में जिन आवासों को मंज़ूर कर दिया गया, उनकी संख्या आधिकारिक आबादी अनुपात से ज़्यादा निकली और उसी गलती की वजह से अब दूसरे चरण के सैकड़ों—हज़ारों पात्र परिवारों की उम्मीदें फिसल रही हैं। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के अपर आयुक्त सह मिशन संचालक डॉ. परीक्षित झाड़े के पत्र के मुताबिक प्रदेश के 34 नगर निकायों में पहले चरण (फेज–1) में जनसंख्या के अनुपात से अधिक आवास स्वीकृत कर दिए गए थे — जिस कारण राज्य स्तर पर उनकी नई फ़ाइलों पर विचार रोका गया है।
किसका यह ओवरड्रामा है — गणना की लटके हुए नंबर, प्रशासकीय लापरवाही, या राजनीतिक दबाव? फिलहाल प्रश्न यही है कि जब नियम साफ थे तो कैसे मंज़ूरी की गणित झुक गई — और इस चूक की कीमत किसे चुकानी पड़ेगी?
पत्र में जिन 34 नगर परिषद / नगर निगमों का नाम आता है
(पत्र के अनुसार — ये वही निकाय हैं जहाँ पहले चरण में स्वीकृत आवासों की संख्या जनसंख्या अनुपात से अधिक पाई गई) 👉 सुल्तानपुर, छापीहेड़ा, कुरावर, तलेन, जावर, रेहटी, शाढ़ौरा, पलसूद, धरमपुरी, मौगांव, चांद, हर्रई, बलेरा, तेंदूखेड़ा (नरसिंहपुर), न्यूरामनगर, रामपुर बघेलान, मझौली (सीधी), सटई, जेरौन खालसा, ककरहटी, बांदरी, बडोदिया कलां, गढ़ाकोटा, खुरई, मालथौन, रेहली, शाहपुर (सागर), सुरखी, बल्देवगढ़, सुसनेर, लोहास्दा, नेमावर, सतवास और माकडोन।
पत्र में स्पष्ट निर्देश दिया गया है: पहले चरण में स्वीकृत अतिरिक्त आवासों के औचित्य-सबूत संचालनालय को भेजे जाएँ—तभी नए प्रस्तावों पर विचार संभव होगा। अन्यथा SLAC (राज्य स्तर मूल्यांकन समिति) में इन निकायों के प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सुसनेर का उदाहरण — 600 आवास की ‘अनपेक्षित’ बढ़त
2011 जनगणना के अनुसार सुसनेर की शहरी आबादी 16,432 रही थी। नियम के मुताबिक 10% मान से लगभग 1,600 आवास स्वीकृत होने चाहिए थे, परंतु प्रथम चरण में यहाँ 2,208 आवास स्वीकृत कर दिए गए — अर्थात् लगभग 600 आवास अधिक।
यह संख्या सिर्फ अंक नहीं — ये उन परिवारों के हक़ की कतार में पीछे धकेल दिए गए टिकट हैं, जिन्होंने दूसरे फेज़ में अपना आवेदन जमा किया था और अब उन्हें ‘स्वीकृति की मर्यादा’ की कठोर दीवार का सामना करना पड़ रहा है।

कौन जिम्मेदार — और क्या वजह हो सकती है?
पत्र सीधे-सीधे दोषी का नाम नहीं कहता, पर संकेत स्पष्ट हैं:
- गणना/डेटा प्रोसेसिंग में त्रुटि — जनसंख्या अनुपात की सही स्टैटिस्टिक्स न लेकर अधिक आवासों की स्वीकृति।
- नक्शेबाज़ी या स्थानीय दबाव — कभी-कभार राजनीतिक या स्थानीय दबाव की वजह से कुछ निकाय अपेक्षाकृत अधिक आवास दिलवा लेते हैं।
- निगरानी की कमी — प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग की ज़रूरतें कहीं छूट गईं; मानदंडों का पालन सुनिश्चित न हो पाया।
- प्रशासनिक सनकै — सबमिशन में औचित्य-सबूत न देना या दस्तावेज़ीकरण का अभाव।
हम आरोप नहीं लगा रहे—पर औचित्य और पारदर्शिता की कमी ने योजना के दूसरे चरण में सही और जरूरतमंद हितग्राहियों के लिए रास्ता बंद कर दिया है। नोटिस न मिलने तक SLAC नए प्रस्तावों पर विचार नहीं कर रहा — और यह ठहराव स्थानीय परिवारों की ज़िन्दगियाँ प्रभावित कर रहा है।
असर क्या होगा — स्थानीय प्रसंग से बड़ा सवाल
- दूसरे फेज़ के योग्य परिवारों की मदद रुकी रहेगी; कई परिवारों की आर्थिक योजनाएँ और आशाएँ टलेंगी।
- पहले चरण की ‘अधिशेष स्वीकृतियाँ’ अगर पे-चेकिंग से नहीं पकड़ी गईं तो नीतिगत सुधार की सख्त ज़रूरत है।
- यदि औचित्य स्वीकार्य नहीं मिला तो कुछ निकायों को पुनर्वितरण/क्लारिफिकेशन करना पड़ सकता है — जिससे समय और संसाधन लगाए जाएँगे।
स्थानीय आवाज़ें
सुसनेर के संवाददाता दीपक जैन से मिली रिपोर्ट में कहा गया है कि गाँव-शहर की सीमाओं पर खड़े वे परिवार, जिन्होंने अपने नाम दूसरे फेज़ में दर्ज कराए थे, अब असमंजस में हैं — क्या वे फिर से उम्मीद लगाए रखें या दूसरे विकल्प तलाशें? सीएमओं सुसनेर ओ.पी. नागर ने कहा कि मामला शासन स्तर पर विचाराधीन है और निर्णय आने पर ही आगे की राह स्पष्ट होगी।
✍️सार्थक चिंतन
जो सरकार योजनाएँ गरीबों के जीवन में सीढ़ियाँ बन सकती थीं, वही जब नियमों की शिथिलता या गलती के शिकार हो जाती हैं तो उसका असली नुकसान ‘लॉन्ग-टर्म ट्रस्ट’ को होता है। सरकारी योजनाओं का जादू तभी कायम रहता है जब प्रोसेस पारदर्शी हों, आँकड़े साफ़ हों और जवाबदेही तात्कालिक हो।
यह खबर सिर्फ़ ‘अंक’ नहीं बता रही — यह हमें याद दिलाती है कि विकास केवल आवंटन नहीं, बल्कि सही लक्ष्य पर पहुँचने की कला है। 600 आवास की यह ग़लती — चाहे मानवीय भूल हो या डिज़ाइन की कमी — उन परिवारों की कलह का कारण बन रही है जो घर की उम्मीद लेकर लाइनों में खड़े हैं।
“नीतियाँ जनता के लिए बनती हैं, कागज़ों के लिए नहीं।और जब कागज़ ही असलियत से बड़ा हो जाए, तो सबसे पहले जिम्मेदारी उसी कलम पर आती है जिसने गलत संख्या लिखी।आवश्यक है कि प्रशासन अब जागे—क्योंकि योजनाएँ फाइलों में नहीं, परिवारों के जीवन में असर छोड़ती हैं।”। -✍️ राजेश कुमरावत ‘सार्थक’



