MP : SIR या कागज़ी सर्वे? मृत मतदाता जीवित, महिलाओं के नाम गलत स्थान पर और फोटो में बड़ा फर्जीवाड़ा

SIR या ‘काग़ज़ी शिक्षण प्रयोग’? सुसनेर विधानसभा में 10,243 नाम कम हुवे
जनमत जागरण @ सुसनेर से दीपक जेन की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट ।
शिक्षा विभाग यदि कभी “घर बैठे परीक्षा देने” का नया प्रयोग शुरू करे, तो उसे सुसनेर विधानसभा के एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) अभियान से अवश्य प्रेरणा लेनी चाहिए। यहां मतदाता सूची का शुद्धिकरण ऐसा हुआ है, मानो बीएलओ ने घर-घर जाकर नहीं, बल्कि किताब खोलकर और कुर्सी पर बैठकर ही पूरे लोकतंत्र का पुनर्लेखन कर दिया हो।
निर्वाचन आयोग का उद्देश्य था— मृत हटें, योग्य जुड़ें और सूची शुद्ध हो।
लेकिन सुसनेर में परिणाम कुछ और ही निकला—
मृत जीवित हैं, जीवित गायब हैं और विवाहित महिलाएं अब भी मायके में मतदान को तत्पर हैं।
👉 ड्राफ्ट सूची: शुद्धिकरण या शैक्षणिक प्रयोग?
एसआईआर से पहले सुसनेर विधानसभा में कुल 2,39,065 मतदाता दर्ज थे।
एसआईआर के बाद 10,243 नाम हटा दिए गए, लेकिन ड्राफ्ट सूची सामने आते ही स्पष्ट हो गया कि यह शुद्धिकरण कम और भ्रम निर्माण अधिक है।
जानकारी उपलब्ध नहीं कराने के आरोप में 1138 मतदाताओं को नोटिस भेजे गए हैं, जिनकी सुनवाई एसडीएम, जनपद सीईओ, तहसीलदार सुसनेर और नलखेड़ा तहसीलदार कर रहे हैं।
अब सवाल यह है कि जब सर्वे ही घर बैठे हुआ, तो जानकारी मांगी किससे जा रही है?
👉 मृतक भी वोटर, फोटो भी अदला-बदली
सुसनेर नगर के वार्ड 7, 8 और 9 की मतदाता सूची तो मानो लोकतांत्रिक जीवविज्ञान का नया अध्याय खोलती है।
▪️मतदाता क्रमांक 344 पर दर्ज व्यक्ति की अगस्त 2025 में मृत्यु हो चुकी है, लेकिन नाम आज भी मतदाता सूची में जीवित है।
▪️क्रमांक 670 पर दर्ज पुरुष मतदाता के नाम पर महिला का फोटो लगा हुआ है—शायद लैंगिक समानता का नया प्रयोग!
👉 एसआईआर का ‘शैक्षणिक सत्य’
एसआईआर अभियान की जमीनी हकीकत कुछ यूं है—
▪️मृत व्यक्तियों के नाम अब भी सूची में सुरक्षित
▪️अन्य जिलों में ब्याही गई महिलाओं के नाम नहीं हटे
▪️पति-पत्नी और बच्चों के नाम आज भी अलग-अलग वार्डों में
▪️पुरुष के नाम पर महिला और महिला के नाम पर पुरुष के फोटो
▪️नए फोटो लिए जाने के बावजूद पुराने फोटो कॉपी-पेस्ट
▪️एक ही परिवार के मतदाता अलग-अलग पन्नों पर बिखरे
यह सब देखकर लगता है कि यह पुनरीक्षण नहीं, बल्कि ‘ओपन बुक एग्ज़ाम’ था—जहां उत्तर पहले से तय थे।
👉 फैक्ट आंकड़े (जिनसे सवाल खड़े होते हैं)
▪️एसआईआर पूर्व कुल मतदाता: 2,39,065
▪️हटाए गए कुल नाम: 10,243
मृत: 3422
अनुपस्थित: 572
स्थानांतरित: 5661
दोहरी प्रविष्टि: 583
आंकड़े बता रहे हैं कि मेहनत कागज़ पर हुई, ज़मीन पर नहीं।

👉 जागरूकता बैनर भी ‘फेल’
शिक्षा विभाग के पुराने सिलेबस की तरह, एसआईआर जागरूकता बैनर भी पुराने पाठ्यक्रम पर अटके हैं।
निर्वाचन आयोग ने अभियान की तारीखों में दो बार बदलाव किया, लेकिन शासकीय भवनों और चौराहों पर लगे बैनर आज भी पुरानी तारीखें पढ़ा रहे हैं।
नतीजा—
आमजन भ्रमित,
दावे-आपत्ति की सही जानकारी गायब,
और लोकतंत्र असमंजस में।
👉 सवाल वही, जवाब अधूरे
अब बड़ा प्रश्न यह है—
यदि दावे-आपत्ति की अवधि में इन त्रुटियों को सुधारा नहीं गया,
तो क्या ये मृत मतदाता आने वाले चुनाव में भी लोकतंत्र की कक्षा में उपस्थित रहेंगे?
और क्या यह पूरा एसआईआर अभियान
शिक्षा विभाग की तरह—कागज़ों में पास, ज़मीन पर फेल साबित होगा?

- यह स्थिति केवल सुसनेर नगर के वार्ड क्रमांक 7, 8 और 9 तक सीमित नहीं मानी जानी चाहिए। यह तो उस विशाल हिमखंड का मात्र सिरा है, जो सतह पर दिखाई दे रहा है। यदि पूरे सुसनेर विधानसभा के प्रत्येक नगरीय क्षेत्र के सभी वार्डों और ग्रामीण अंचलों की प्रत्येक पंचायत के ग्रामों में मतदाता सूचियों का सूक्ष्म आकलन किया जाए, तो इससे भी अधिक चौंकाने, हैरान करने और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्न खड़े करने वाली स्थितियां सामने आ सकती है ?
इस गंभीर विषय पर पक्ष जानने के लिए राजस्व विभाग और शिक्षा विभाग के जवाबदार अधिकारियों से दूरभाष के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन अधिकारियों द्वारा फोन रिसीव नहीं किया जा सका।



