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MP आगर मालवा में जनसुनवाई पर बड़ा सवाल: जनसुनवाई में सुनवाई नहीं! किसान ने कहा – बंद कर दीजिए, कम से कम उम्मीद तो नहीं टूटेगी

आगर मालवा में जनसुनवाई पर बड़ा सवाल: किसान ने बंद करने का दिया पत्र, एक गांव के दो मामलों ने खोली व्यवस्था की पोल

🔴 EXCLUSIVE GROUND REPORT
जनसुनवाई या जन-उलझन?


जनमत जागरण @ आगर मालवा।
जिस व्यवस्था को सरकार ने जनता की सुनवाई के लिए खड़ा किया, उसी व्यवस्था से अब जनता ही हाथ जोड़कर कह रही है—
“हमें मत बुलाइए साहब, हमारा समय और पैसा बचा लीजिए।”
आगर मालवा जिले से सामने आया यह आवेदन किसी आंदोलन का ऐलान नहीं, बल्कि व्यवस्था पर लिखा गया एक शांत लेकिन करारा व्यंग्य है।
ग्राम बापचा निवासी प्रेम नारायण यादव ने कलेक्टर को आवेदन देकर साप्ताहिक जनसुनवाई बंद करने की मांग कर दी। वजह बेहद सीधी है—
👉 जनसुनवाई में सुनवाई होती ही नहीं।


📝 आवेदन नहीं, प्रशासन का रिपोर्ट कार्ड


आवेदन में लिखी पंक्तियाँ पढ़कर लगता है मानो किसी किसान ने नहीं, बल्कि किसी नीति आयोग ने जनसुनवाई का ऑडिट कर दिया हो। किसान काम छोड़कर आता है ,किराया खर्च करता है ,लाइन में लगता है ,आवेदन देता है ,और फिर… कुछ नहीं होता
आवेदन में तीखा सवाल है—
“जब जनसुनवाई में न नेता आते हैं, न अधिकारी गंभीर होते हैं, तो फिर आम आदमी क्यों आए?”


⚖️ न्याय का मंच या औपचारिक फोटोसेशन?


आवेदक का आरोप है कि—
जनसुनवाई में केवल गरीब और मध्यम वर्ग आता है
जिनके पास प्रभाव है, वे जनसुनवाई से ऊपर हैं
पुराने आवेदनों की न समीक्षा होती है, न जवाब
और सबसे तीखा तंज—
“अगर आपके कर्मचारी ईमानदारी से काम करें, तो जनसुनवाई की जरूरत ही क्यों पड़े?”

यह वाक्य आवेदन नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर सवालिया निशान है।


📲 फेसबुक से फाइल तक हलचल


वरिष्ठ पत्रकार जफर मुल्तानी द्वारा यह आवेदन सोशल मीडिया पर साझा होते ही बहस छिड़ गई। लोग पूछ रहे हैं— क्या जनसुनवाई सिर्फ सप्ताहिक रस्म बनकर रह गई है? क्या यह मंच अब उम्मीद बांटने के बजाय निराशा लौटाने का केंद्र बन गया है?


🔍 ग्राउंड रियलिटी | जनसुनवाई की ज़मीनी सच्चाई

आधिकारिक आंकड़े भले ही फाइलों में उलझे हों, लेकिन जनसुनवाई के बाहर खड़े लोग खुद चलता-फिरता आंकड़ा हैं।


🎙️ पीड़ितों की आवाज़

सरकारी फाइलों में भले ही हर मंगलवार जनसुनवाई सफल लिखी जाती हो, लेकिन ज़मीन पर हकीकत यह है कि जनता की सुनवाई नहीं, सिर्फ फाइलों की आवाजाही हो रही है।
आगर मालवा जिले के सोयत खुर्द गांव से सामने आए सिर्फ दो मामलों ने पूरी जनसुनवाई व्यवस्था की पोल खोल दी है। ये मामले बानगी हैं—उस पीड़ा की, जो जिले के लगभग 500 गांवों में फैली हुई है।


⚙️ मामला–1 | उद्योग नहीं, सिर्फ आश्वासन चले

रोहित गुप्ता, युवा उद्यमी, ग्राम सोयत खुर्द बताते हैं—
“मैं वर्ष 2015 से अब तक दर्जनों बार कलेक्टर जनसुनवाई में आवेदन दे चुका हूं। मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के अंतर्गत मेरा उद्योग आज तक शुरू नहीं हो सका। बिजली विभाग, बैंक और उद्योग विभाग द्वारा लगातार शोषण हुआ, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिला, समाधान नहीं।”
रोहित गुप्ता का आरोप है कि—
योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई
जिम्मेदार अधिकारियों पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई
वर्षों बाद भी न्याय की स्थिति शून्य है
वे कहते हैं—
“जब वर्षों तक न्याय नहीं मिलता और जिम्मेदारी तय नहीं होती, तब जनसुनवाई केवल औपचारिकता और दिखावा बन जाती है। यही हाल मध्य प्रदेश शासन के शिकायत पोर्टल 181 का भी है।”


🌾 मामला–2 | जमीन है, सीमांकन नहीं

बजरंग सिंह चंद्रावत, किसान, ग्राम सोयत खुर्द—
“मैंने जमीन के सीमांकन के लिए कई बार शुल्क जमा किया। तहसीलदार से लेकर कलेक्टर जनसुनवाई तक आवेदन दिए, लेकिन तीन साल में सीमांकन नहीं हुआ।”
किसान का कहना है—
हर बार कहा जाता है—
“तहसील में जाकर मिल लेना, यहां से आवेदन भेज देंगे”
आवेदन भेजे जाते हैं, काम नहीं होता
आखिरकार किसान का निष्कर्ष बेहद कड़वा है—
“जनसुनवाई बंद ही हो जाए तो अच्छा है।”


📊 डेटा | आंकड़े नहीं, चेहरे बोल रहे हैं

ये दोनों मामले एक ही गांव के हैं।
अगर पूरे क्षेत्र की बात करें तो—
लगभग 40 गांव
जिले में करीब 500 गांव
👉 यानी हजारों लोग ऐसे हैं, जो वर्षों से जनसुनवाई के चक्कर काट रहे हैं।
यदि
जनसुनवाई प्रभावी होती, तो एक ही गांव के दो लोग वर्षों तक उसी दरवाज़े पर खड़े नहीं रहते। बार-बार आना ही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता का आंकड़ा है।

🚨 प्रशासन के लिए आईना या चेतावनी?


यह आवेदन किसी विद्रोह की भाषा में नहीं है, लेकिन इसके शब्दों में व्यवस्था से उपजा थकान और आक्रोश साफ झलकता है।
अब गेंद प्रशासन के पाले में है—
👉 या तो जनसुनवाई को असरदार बनाइए
👉 या फिर ऐसे आवेदन आते रहेंगे, जो व्यवस्था की पोल खोलते रहेंगे


🖊️ सार्थक टिप्पणी
जनसुनवाई तब तक जनहित की होगी, जब तक वह फाइल नहीं, फैसला बन पाए। वरना जनता कहेगी—सुनवाई नहीं चाहिए, समाधान चाहिए।

🧾 यह समाचार सोशल मीडिया पर एक जिम्मेदार पत्रकार द्वारा साझा की गई जानकारी एवं उपलब्ध तथ्यों पर आधारित है। संबंधित पक्ष से संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।

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