“विराट हिंदू सम्मेलन की आवाज़: बदलेगा आचरण, तभी बदलेगा राष्ट्र”-हिंदू सम्मेलन: चेतना, संस्कार और आचरण पर केंद्रित एक निर्णायक संवाद

🚩“विराट हिंदू सम्मेलन में उठा आत्ममंथन का स्वर, समाज के सामने रखे गए कठिन सवाल”▪️“जब मंच से सिर्फ भाषण नहीं, समाज के लिए मार्गदर्शन निकला”
जनमत जागरण @ सोयतकलां से निकुंज की ग्राउंड रिपोर्ट । नगर के कृषि उपज मंडी प्रांगण में रविवार को भव्य हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में समाज के विभिन्न वर्गों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में श्री गोपाल जी देराडी (प्रचारक, सेवा भारती मार्गदर्शक) उपस्थित रहे, जबकि श्रीमती पिंकी आर्य (राष्ट्रीय सेविका समिति, उज्जैन विभाग), संत श्री हरि नारायण जी वैष्णव (कथावाचक, नरसिंह सेवा आश्रम, खिलचीपुर) तथा श्री राधेश्याम जी भावसार (सेवानिवृत्त शिक्षक एवं समाजसेवी) विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन रहे।

कार्यक्रम का शुभारंभ गौ माता पूजन एवं भारत माता पूजन के साथ किया गया। स्वागत नगर के वाल्मीकि समाज सहित विभिन्न समाजों की बालिकाओं द्वारा किया गया, जो सामाजिक समरसता का प्रतीक रहा। कार्यक्रम के समापन पर संत श्री हरि नारायण जी वैष्णव के मार्गदर्शन में नागरिकों को पंच सामाजिक परिवर्तनों का संकल्प दिलाया गया, जिन पर राष्ट्रीय सेविका समिति की कार्यकर्ता श्रीमती पिंकी आर्य ने विशेष रूप से मातृशक्ति को संबोधित करते हुए विस्तार से प्रकाश डाला। अंत में सभी समाजों के नागरिकों ने जाति-वर्ग भेद से ऊपर उठकर सामूहिक सहभोज कर सामाजिक एकता का संदेश दिया।

🚩“हिंदुत्व पूजा नहीं, आचरण है” – राष्ट्रीय सेविका समिति की स्पष्ट बात

पांच परिवर्तन और पारिवारिक संस्कारों की भूमिका
राष्ट्रीय सेविका समिति की कार्यकर्ता श्रीमती पिंकी आर्य ने अपने उद्बोधन में समाज के लिए पांच परिवर्तन को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र का निर्माण घर से शुरू होता है और इसमें मातृशक्ति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। बच्चों और बालिकाओं में संस्कार, बड़ों के प्रति सम्मान, परिवार में परस्पर सहयोग और देशभक्ति की भावना विकसित करना ही वास्तविक परिवर्तन है। उन्होंने कहा कि हमें बच्चों को वीर शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और शहीद भगत सिंह जैसे आदर्शों से जोड़ना होगा, ताकि वे व्यक्तित्व, चरित्र और राष्ट्रभाव से ओत-प्रोत बन सकें।
पर्यावरण, स्वदेशी आचरण और सामाजिक समरसता का संदेश
श्रीमती आर्य ने पर्यावरण संरक्षण को पांच परिवर्तनों का अनिवार्य अंग बताते हुए प्लास्टिक के उपयोग से बचने, पौधारोपण और स्वच्छता को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि बाजार, दुकान, कार्यालय या घर में कार्य करने वाले सफाईकर्मियों और श्रमिकों से भाई-बहन जैसा व्यवहार करना भी हिंदुत्व का आचरण है। उन्होंने स्वदेशी भोजन, हिंदी भाषा के प्रयोग, भारतीय परंपराओं के अनुरूप पर्व और जन्मदिन मनाने तथा योग व आयुर्वेद को अपनाने की बात कही। उनका स्पष्ट संदेश था कि हिंदुत्व पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन में उतारने योग्य आचरण है—और जब मातृशक्ति इस परिवर्तन का नेतृत्व करेगी, तभी समाज और राष्ट्र सशक्त बनेंगे।
🚩“यह धर्म की नहीं, तुम्हारी बेटी की लड़ाई है…” – संत का चौंकाने वाला संदेश

अपने ओजस्वी और भावप्रवण उद्बोधन में संत श्री हरि नारायण जी वैष्णव ने सनातन हिंदू की पहचान, संस्कार और चेतना पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंदू को बार-बार अपनी पहचान बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि जागृति स्वयं भीतर से आनी चाहिए। उन्होंने सनातन संस्कृति को सर्वे भवन्तु सुखिनः, प्राणीमात्र के कल्याण, प्रकृति-पूजन और राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की भावना से जोड़ा।
लव जिहाद, शिक्षा जिहाद और व्यापारिक जिहाद पर चेतावनी
संत श्री हरि नारायण जी ने अपने उद्बोधन में लव जिहाद, शिक्षा जिहाद और व्यापारिक जिहाद जैसे विषयों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज हिंदू समाज की बेटियाँ केवल भावनात्मक ही नहीं, बल्कि वैचारिक और सामाजिक स्तर पर भी योजनाबद्ध षड्यंत्रों का शिकार हो रही हैं। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि बेटियों को आत्मरक्षा, आत्मसम्मान और संस्कारों से सुसज्जित किया जाए तथा परिवार स्तर पर सतर्कता और संवाद को मजबूत किया जाए। उनका स्पष्ट संदेश था कि समाज यदि सजग नहीं हुआ, तो केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामूहिक हानि निश्चित है।
संस्कार, परिवार और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आह्वान
संत श्री ने मातृशक्ति से विशेष रूप से आग्रह किया कि बच्चों में गर्भकाल से ही संस्कारों का बीजारोपण करें। उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से बताया कि बाल्यावस्था में दी गई शिक्षा और अनुशासन ही भविष्य के नागरिक का चरित्र तय करता है। उन्होंने भारतीय परंपरा के अनुरूप जन्मदिन, पर्व और आयोजनों को मनाने, दीप प्रज्ज्वलन और भगवा ध्वज के सम्मान को जीवन का अंग बनाने का आह्वान किया। उनके अनुसार, यह सम्मेलन तभी सार्थक होगा जब इससे समाज में सांस्कृतिक आत्मविश्वास, संगठन से जुड़ाव और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित हो।
बेटियों की सुरक्षा, छगुर बाबा प्रकरण और रानी लक्ष्मीबाई से प्रेरणा
संत श्री हरि नारायण जी वैष्णव ने उत्तर प्रदेश के कुख्यात मौलवी छगुर बाबा का उदाहरण देते हुए कहा कि आज बेटियों की अस्मिता को योजनाबद्ध रूप से निशाना बनाया जा रहा है और समाज यदि समय रहते नहीं जागा तो परिणाम भयावह हो सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह समय बेटियों को कमजोर नहीं, बल्कि रानी लक्ष्मीबाई जैसी साहसी, स्वाभिमानी और संस्कारित बनाने का है। उन्होंने झांसी की रानी के जीवन से प्रेरणा लेते हुए कहा कि ममता और वीरता का अद्भुत समन्वय ही सनातन संस्कृति की पहचान है। समाज को चाहिए कि वह बेटियों को भय नहीं, बल्कि आत्मबल दे और हर घर में संस्कार, साहस और स्वाभिमान की शिक्षा को प्राथमिकता दे।
🚩संघ क्यों बना और 100 साल कैसे अडिग रहा? गोपाल जी देराडी ने खोले इतिहास के पन्ने

मुख्य वक्ता श्री गोपाल जी देराडी ने अपने उद्बोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उत्पत्ति, उद्देश्य और शताब्दी यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि संघ का प्रारंभ राष्ट्र और समाज को संस्कारित, संगठित और देशभक्त बनाने के उद्देश्य से हुआ था और अनेक प्रतिबंधों व कठिन कालखंडों के बावजूद संघ अपनी विचारधारा पर अडिग रहा।
संघ की शताब्दी यात्रा और संगठन की अपरिहार्यता
श्री देराडी ने कहा कि संघ का 100 वर्षों तक निरंतर चलना इस बात का प्रमाण है कि उसका लक्ष्य स्पष्ट और समाजहित से जुड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि संघ ने कभी तात्कालिक लाभ या सत्ता को उद्देश्य नहीं बनाया, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की राह चुनी। शाखा को उन्होंने राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और सेवा की पाठशाला बताया तथा समाज से आग्रह किया कि अधिक से अधिक परिवार अपने बच्चों को शाखाओं से जोड़ें।
देशभक्ति को जीवन-व्यवहार में उतारने का आह्वान
मुख्य वक्ता ने वर्तमान सामाजिक प्रवृत्तियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि केवल मतदान कर देना पर्याप्त नहीं है। व्यापारी, कर्मचारी, अधिकारी और सामान्य नागरिक—सभी को अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी और राष्ट्रभाव को अपनाना होगा। उन्होंने जापान और इज़राइल के उदाहरण देते हुए बताया कि जब राष्ट्रभक्ति समाज की जीवनशैली बन जाती है, तभी देश विपरीत परिस्थितियों से उबरकर प्रगति करता है। उनका स्पष्ट संदेश था कि यदि भारत को आगे बढ़ाना है, तो समाज को केवल संगठित ही नहीं, बल्कि कर्म और चरित्र से भी देशभक्त बनना होगा।
🚩“जहाँ भेद नहीं, भाव बैठे—समरस सहभोज की प्रेरक तस्वीर”

“एक जाजम, एक पंगत और एक समाज—समरसता का सजीव संदेश”
सम्मेलन के उपरांत आयोजित समरस सहभोज इस आयोजन का सबसे मौन लेकिन सबसे मुखर संदेश बनकर उभरा। एक ही जाजम पर, एक ही पंगत में, नगर की समस्त जातियों, वर्गों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग बिना किसी भेदभाव के साथ बैठे और भोजन किया।यह दृश्य केवल भोजन का नहीं, बल्कि उस सनातन चेतना का सजीव प्रकटीकरण था, जिसमें मनुष्य की पहचान जाति से नहीं, संस्कार और सहभागिता से होती है। समरस सहभोज ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब समाज एक साथ बैठता है, तब विखंडन स्वतः हार जाता है और राष्ट्र की आत्मा मजबूत होती है—यही हिंदू समाज की वास्तविक शक्ति और भविष्य की दिशा है।

🚩जब चारों दिशाओं से उमड़ा नगर… भगवा, भजन और भारत माता के चरणों में समर्पण
रविवार का दिन नगर के लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि चेतना का उत्सव बन गया।जब हिंदू समाज अपने घरों से निकला, तो वह सुनने नहीं—अपनी उपस्थिति से इतिहास रचने निकला था।



