इंदौरमध्यप्रदेशसंघ शाताब्दी वर्ष

“पुरुषार्थ और संगठन ही भारत की कालजयी शक्ति” — सुरेश सोनी

संघ की शताब्दी वर्ष श्रृंखला में प्रबुद्धजनों को संबोधन, समाज-निर्माण में सहभागिता का आह्वान

जनमत जागरण @ इन्दौर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित जन-गोष्ठियों की श्रृंखला में आज अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य माननीय सुरेश जी सोनी ने शहर के चोईथराम स्कूल सभागार में सेवानिवृत्त न्यायिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों तथा अधिवक्ताओं को संबोधित किया। उन्होंने संघ की शताब्दी यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत का समाज प्राचीन काल से ही पुरुषार्थ प्रधान रहा है, यही उसकी स्थायी शक्ति का आधार है।

अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि इतिहास में अनेक सभ्यताएं उत्कर्ष के शिखर पर पहुंचकर भी विलुप्त हो गईं, किंतु भारतीय संस्कृति अपनी आंतरिक शक्ति और मूल्यों के कारण आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है। स्वाधीनता आंदोलन के समय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के मन में यह प्रश्न बार-बार उठता था कि इतनी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के बावजूद भारत पराधीन क्यों हुआ। गहन सामाजिक अध्ययन के बाद उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि समाज में संगठित जीवन का भाव कमजोर पड़ गया था, जिसे पुनः स्थापित करना आवश्यक है।

इसी विचार से प्रेरित होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज को संगठित करना और निस्वार्थ राष्ट्रभावना का पुनर्जागरण करना है। उन्होंने कहा कि यह भाव भाषा, क्षेत्र या वर्ग से परे समग्र समाज को जोड़ने वाला तत्व है।

सकारात्मक परिवर्तन की शताब्दी यात्रा

श्री सोनी ने बताया कि संघ की सौ वर्षों की यात्रा में समाज जीवन में सकारात्मक परिवर्तन हेतु अनेक प्रकल्प भारतीय जीवन दृष्टि के अनुरूप प्रारंभ किए गए हैं। प्राचीन भारतीय वांग्मय में निहित “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के भाव को आधार बनाकर विश्व कल्याण की दिशा में कार्य किया गया है। संघ की यह यात्रा भारत के सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को पुनः स्थापित करने की दिशा में निरंतर अग्रसर है।

उद्योग जगत के समक्ष सामाजिक उत्तरदायित्व पर बल

एमजीएम मेडिकल कॉलेज सभागार में आयोजित दूसरे कार्यक्रम में शहर के प्रमुख उद्योगपतियों को संबोधित करते हुए श्री सोनी ने कहा कि “समाज की समस्याओं का समाधान समाज को ही करना होगा।” उन्होंने शताब्दी वर्ष के अंतर्गत निर्धारित ‘पंच परिवर्तन’ विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि—

  • समाज के प्रत्येक वर्ग में समरसता और कुटुंब प्रबोधन के संस्कार स्थापित किए जाएं।
  • श्रम के सम्मान की भारतीय परंपरा को पुनः सुदृढ़ किया जाए।
  • पर्यावरण के प्रति भारतीय दृष्टिकोण “सृष्टि से समष्टि” तक व्यापक है, इसे व्यवहार में लाना होगा।
  • आधुनिकता के साथ आगे बढ़ते हुए स्वदेशी जीवनशैली, भाषा और संस्कृति से जुड़ाव बनाए रखना आवश्यक है।
  • नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता और दायित्वबोध समाज के विकास का आधार है।

निस्वार्थ सहभागिता का आह्वान

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सभी वर्गों के नागरिकों से आह्वान किया कि वे अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार समाज एवं राष्ट्र निर्माण के कार्यों में निस्वार्थ भाव से सहभागी बनें। उन्होंने कहा कि सकारात्मक परिवर्तन के लिए सामूहिक प्रयास ही भारत को विश्व कल्याण की दिशा में अग्रणी बनाएंगे।


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