गेहूं खरीदी पर असमंजस:“सरकार अगर गेहूं नहीं खरीदना चाहती, तो कम से कम सच बोलने का साहस तो दिखाए!”- रमेश दांगी किसान संघ के प्रदेश महामंत्री ने कहा

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मध्यप्रदेश में रबी सीजन की गेहूं खरीदी को लेकर किसानों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। पंजीयन और गिरदावरी प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद तुलाई शुरू नहीं होने से किसान परेशान हैं। भारतीय किसान संघ ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट नीति की मांग की है। महामंत्री रमेश दांगी ने कहा कि यदि सरकार खरीदी नहीं करना चाहती, तो स्थिति स्पष्ट करे।
जनमत जागरण @ सोयतकलांमध्यप्रदेश में किसानों को इस बार गेहूं खरीदी को लेकर कई स्तरों पर असमंजस का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय किसान संघ के मालवा प्रांत के महामंत्री रमेश दांगी ने कहा कि पहले किसानों को पंजीयन के लिए संघर्ष करना पड़ा। गिरदावरी में दर्ज रकबे के आधार पर पंजीयन भी हो गया, लेकिन जब तुलाई की बारी आई तो सरकार द्वारा लगातार तिथियां बढ़ाई जा रही हैं।उन्होंने कहा कि इससे किसानों के मन में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इसके साथ ही छोटे, मझले और बड़े किसान के वर्गीकरण को लेकर भी आपत्ति जताई गई। दांगी के अनुसार किसान केवल किसान होता है, इस प्रकार का विभाजन अनावश्यक है।उन्होंने बताया कि किसान गेहूं की कटाई कर खलिहानों में भंडारण कर चुके हैं और समर्थन मूल्य पर खरीदी का इंतजार कर रहे हैं। सरकार द्वारा हर वर्ष की तरह इस बार भी खरीदी के दावे किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी तक खरीदी सुनिश्चित नहीं हो पाई है।भारतीय किसान संघ ने यह भी आरोप लगाया कि एक ओर सरकार कृषि कल्याण वर्ष मना रही है और विभिन्न आयोजनों पर खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर किसानों को खरीदी के लिए भटकना पड़ रहा है। सैटेलाइट के आधार पर पहले सत्यापित रकबे को असत्यापित बताया जा रहा है, जिससे समस्या और बढ़ रही है।महामंत्री रमेश दांगी ने सरकार से मांग की है कि वह अपनी समर्थन मूल्य नीति को स्पष्ट करे, ताकि किसान भ्रम की स्थिति से बाहर निकल सकें।इसी संदर्भ में भारतीय किसान संघ मालवा प्रांत की बैठक 23 अप्रैल को इंदौर में आयोजित की जाएगी, जिसमें अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री गजेंद्र सिंह के मार्गदर्शन में आगे की रणनीति तय की जाएगी। इसकी जानकारी प्रांत प्रचार प्रमुख गोवर्धन लाल पाटीदार ने दी।
👉 सार्थक दृष्टिकोण

किसान खेत में, सरकार ‘कन्फ्यूजन मोड’ में — गेहूं खरीदी या सिर्फ तारीखों की खेती
मध्यप्रदेश का किसान इस समय खेत में कम और “सरकारी प्रक्रिया” के जाल में ज्यादा उलझा हुआ है। फसल तैयार है, खलिहान भरे हैं, लेकिन व्यवस्था अभी भी “तैयारी” में ही नजर आ रही है। सवाल सीधा है—
सरकार गेहूं खरीदेगी या सिर्फ आश्वासनों की फसल ही काटेगी?पहले पंजीयन के नाम पर किसान को लाइन में लगाया गया, फिर गिरदावरी के नाम पर गणित समझाया गया, और अब तुलाई के नाम पर तारीखों का ऐसा सिलसिला चल रहा है कि किसान कैलेंडर देखकर खेती करना सीख जाए।मुद्दा गेहूं का नहीं, नीयत का है…सबसे रोचक अध्याय तब शुरू हुआ जब किसान को “छोटा, मझला और बड़ा” घोषित कर दिया गया। मानो खेत में उगने वाली फसल भी अब वर्ग देखकर मूल्य तय करेगी।किसान: साहब, गेहूं कब बिकेगा?
प्रशासन: पहले ये बताओ—तुम छोटे हो, मझले हो या बड़े?
किसान: साहब, मैं तो बस परेशान हूं…उधर, सैटेलाइट भी अब खेतों में उतर आया है। जो रकबा कल तक सत्यापित था, वह आज असत्यापित हो गया। किसान सोच रहा है—
“मैंने खेत में गेहूं बोया था या अंतरिक्ष में प्रयोग किया था?किसान इंतजार में है, और सिस्टम बहाने में…सरकार एक तरफ “कृषि कल्याण वर्ष” मना रही है—बैनर, पोस्टर, कार्यक्रम… लेकिन दूसरी तरफ वही किसान खरीदी केंद्रों के इंतजार में है।यह ऐसा विरोधाभास है, जहां
जमीन पर सन्नाटा है और कागजों में उत्सव।अब असली सवाल फिर वही—
क्या सरकार के पास खरीदी की स्पष्ट योजना है?
अगर है, तो जमीन पर क्यों नहीं दिख रही?
और अगर नहीं है, तो किसान को भ्रम में क्यों रखा जा रहा है?क्योंकि सच तो यह है—
सरकार समर्थन मूल्य तय कर चुकी है,
बस “समर्थन की नीयत” तय करना बाकी है।किसान अब फसल नहीं, सरकार की मंशा कटने का इंतजार कर रहा है।



