अक्षय तृतीया पर सुसनेर में 108 परिवारों ने रचा इतिहास: नवधा भक्ति से दिगम्बर जैन मुनियों का भव्य पड़गाहन

अक्षय तृतीया पर 108 परिवारों का अद्भुत समर्पण : नवधा भक्ति से दिगम्बर जैन मुनियों का पड़गाहन, सुसनेर बना धर्मभावना का केंद्र
जनमत जागरण @ सुसनेर से दीपक जैन। जैन धर्म में आस्था, त्याग और तपस्या के प्रतीक पर्व अक्षय तृतीया के अवसर पर धर्म नगरी सुसनेर ने एक ऐतिहासिक अध्याय रच दिया। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के पारणा प्रसंग की स्मृति में नगर के 108 परिवारों ने एकजुट होकर दिगम्बर जैन संतों का नवधा भक्ति से पड़गाहन कर आध्यात्मिक वातावरण को सजीव कर दिया।
ग्रीष्मकालीन प्रवास पर विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर जी के शिष्य मुनि श्री श्रमण सागर जी एवं मुनि श्री ओंकार सागर जी के सान्निध्य में यह आयोजन श्रद्धा और समर्पण का अनुपम उदाहरण बन गया। शुक्रवारिया बाजार क्षेत्र में हुए इस पड़गाहन में बालक से लेकर युवा और बुजुर्ग तक सभी वर्गों की सहभागिता रही।

“हे स्वामी नमोस्तु… नमोस्तु… नमोस्तु, अत्र… अत्र… तिष्ठो… तिष्ठो…” के गूंजते मंत्रोच्चार से संपूर्ण नगर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। मार्ग को आकर्षक रंगोलियों से सजाया गया, जिसने इस आयोजन को और अधिक भव्य बना दिया।
निष्काम भक्ति ही सच्चा साधन — मुनि श्रमण सागर जी

धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री श्रमण सागर जी ने निष्काम भक्ति के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि
“माल वाले जरूरत के पास जाते हैं, लेकिन माला वाले के पास जरूरत स्वयं चलकर आती है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्ची भक्ति वही है जिसमें कोई अपेक्षा न हो—यहां तक कि यदि स्वयं भगवान भी सामने आ जाएं, तो भी कुछ न मांगना ही श्रेष्ठ साधना है।
आहार दान का आध्यात्मिक महत्व — मुनि ओंकार सागर जी
मुनि श्री ओंकार सागर जी ने जैन दर्शन के चार दानों—औषधिदान, ज्ञानदान, अभयदान और आहारदान—में आहार दान को विशेष महत्व देते हुए बताया कि भगवान आदिनाथ को भी पूर्व कर्मों के उदय में लंबे समय तक आहार नहीं मिला।
उन्होंने कहा कि जब पुण्य का उदय हुआ, तब हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस ने इक्षु रस से उनका पारणा कराया। यही कारण है कि यह तिथि ‘अक्षय तृतीया’ कहलाती है और इसे अक्षय पुण्य प्रदान करने वाली माना जाता है।
गुरु पूजन से हुआ शुभारंभ, समाजजनों की गरिमामयी उपस्थिति

कार्यक्रम का शुभारंभ गुरु पूजन से हुआ। मंगलाचरण भूपेंद्र साँवला एवं अद्वेत जैन द्वारा किया गया। विभिन्न शहरों से पधारे श्रद्धालुओं ने श्रीफल एवं शास्त्र भेंट कर अपनी आस्था व्यक्त की।
इस ऐतिहासिक अवसर पर सुसनेर सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि समाज की एकजुटता, संस्कार और समर्पण की जीवंत मिसाल भी प्रस्तुत कर गया।



