वीडियो कॉल पर अंतिम विदाई: रिश्ते, सोशल मीडिया और कुटुम्ब प्रबोधन
₹5100 की ऑनलाइन रसीद, वीडियो कॉल पर अंतिम विदाई, लाखों फॉलोअर्स का भ्रम और कुटुम्ब प्रबोधन की आवश्यकता पर आधारित समसामयिक विश्लेषण।

जब तकनीक जीत गई और संवेदनाएं हार गईं
समसामयिक विश्लेषण
लेखक : राजेश कुमरावत ‘सार्थक
सभ्यताएँ केवल ऊँची-ऊँची इमारतों, तेज़ इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता या आर्थिक प्रगति से महान नहीं बनतीं। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपने माता-पिता, बुज़ुर्गों, गुरुजनों और परिवार जैसी मूल संस्थाओं के प्रति कितना संवेदनशील है। भारतीय संस्कृति ने हजारों वर्षों से मनुष्य को यही शिक्षा दी है—“मातृदेवो भवः, पितृदेवो भवः, आचार्यदेवो भवः।” अर्थात माता, पिता और गुरु केवल रिश्ते नहीं, बल्कि जीवन के प्रथम देवता हैं। यही कारण है कि भारतीय समाज ने श्रवण कुमार और भगवान श्रीराम जैसे आदर्शों को केवल कथाओं में नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों के रूप में स्थापित किया।
आज भारत डिजिटल युग के स्वर्णिम दौर से गुजर रहा है। मोबाइल ने दुनिया को हथेली पर ला दिया है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है। विज्ञान और तकनीक का स्वागत होना चाहिए, किंतु चिंता तब उत्पन्न होती है जब तकनीक सुविधा का माध्यम न रहकर संवेदनाओं का विकल्प बनने लगे। जब रिश्तों का मूल्य ऑनलाइन ट्रांसफर से आँका जाने लगे और मोबाइल स्क्रीन किसी प्रियजन के स्पर्श की जगह लेने लगे, तब समाज को आत्ममंथन करना ही पड़ता है।
पिछले दिनों सामने आई दो घटनाएँ इसी आत्ममंथन के लिए विवश करती हैं। पहली घटना हरियाणा के सोनीपत स्थित ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम की है। मुंबई के कभी प्रतिष्ठित कपड़ा व्यापारी रहे 74 वर्षीय शिवचरण रामरतन गुप्ता जीवन के अंतिम वर्षों में वृद्धाश्रम में रह रहे थे। व्यापार में भारी नुकसान के बाद वे अपनी पत्नी के साथ आश्रम पहुँचे थे। पत्नी के निधन के बाद वे पूरी तरह अकेले पड़ गए। उनकी तीनों बेटियों को उनकी गंभीर बीमारी की सूचना लगभग बीस दिन पहले दे दी गई थी, लेकिन कोई भी उनसे मिलने नहीं पहुँची।
शिवचरण जी के निधन के बाद जो हुआ, उसने पूरे समाज को झकझोर दिया। बेटियों ने अंतिम संस्कार के लिए ₹5,100 ऑनलाइन भेज दिए और अनुरोध किया कि पूरी प्रक्रिया उन्हें वीडियो कॉल पर दिखा दी जाए। इतना ही नहीं, बाद में उन्होंने अस्थियों को लेने आने में भी असमर्थता जताई और आश्रम से ही गंगा विसर्जन कराने का आग्रह किया। वृद्धाश्रम के संचालकों और स्थानीय नागरिकों ने पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया। यह दृश्य केवल एक पिता की पीड़ा नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों का कठोर दस्तावेज़ बन गया।
इसी समय पंजाब की एक दूसरी घटना ने डिजिटल दुनिया के भ्रम को भी उजागर कर दिया। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर कंचन कुमारी (कमल कौर) के लाखों फॉलोअर्स थे। उनकी हर पोस्ट पर हजारों ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ आते थे। लेकिन जब उनकी दुखद मृत्यु के बाद अंतिम यात्रा निकली, तब उन लाखों डिजिटल प्रशंसकों में से कोई भी कंधा देने नहीं पहुँचा। अंतिम विदाई में केवल तीन निकट संबंधी उपस्थित थे। यह दृश्य बताता है कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता और वास्तविक जीवन के आत्मीय संबंध दो बिल्कुल अलग संसार हैं।
इन दोनों घटनाओं का संदेश एक ही है। आज हम डिजिटल रूप से पूरी दुनिया से जुड़े हुए हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से अपने ही परिवार से दूर होते जा रहे हैं। ‘फॉलोअर्स’ की संख्या सामाजिक प्रतिष्ठा का पैमाना बनती जा रही है, जबकि संकट की घड़ी में वही व्यक्ति साथ खड़ा होता है जिसके साथ विश्वास, अपनापन और वर्षों का संबंध हो। मोबाइल की स्क्रीन संवेदना का चित्र दिखा सकती है, पर किसी के आँसू नहीं पोंछ सकती। ऑनलाइन भुगतान जिम्मेदारी का विकल्प नहीं बन सकता और वीडियो कॉल किसी पिता के अंतिम स्पर्श की भरपाई नहीं कर सकती।
ऐसे समय में भारतीय परिवार व्यवस्था की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष में ‘पंच परिवर्तन’ के अंतर्गत ‘कुटुम्ब प्रबोधन’ को प्रमुख सामाजिक अभियान बनाया है। इसका उद्देश्य परिवारों में संवाद, संस्कार, सामूहिकता और उत्तरदायित्व की भावना को पुनर्जीवित करना है। यह अभियान किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दृष्टि का विस्तार प्रतीत होता है, जो मानती है कि परिवार केवल साथ रहने वालों का समूह नहीं, बल्कि संस्कारों की पहली पाठशाला है।
‘कुटुम्ब प्रबोधन’ हमें याद दिलाता है कि सप्ताह में कुछ समय परिवार के साथ बैठना, एक साथ भोजन करना, घर के बुजुर्गों के अनुभव सुनना और बच्चों को परिवार के प्रति उत्तरदायित्व सिखाना केवल पारिवारिक परंपरा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार है। यदि परिवार मजबूत रहेगा, तो समाज भी मजबूत रहेगा और समाज मजबूत होगा, तो राष्ट्र भी सुदृढ़ बनेगा।
सोनीपत की घटना का एक सकारात्मक पक्ष भी है। जहाँ रक्त संबंध अपने दायित्व से पीछे हट गए, वहीं वृद्धाश्रम के संचालकों, कर्मचारियों और स्थानीय नागरिकों ने आगे बढ़कर पूरे सम्मान के साथ शिवचरण जी का अंतिम संस्कार किया। यह भारतीय समाज की उस जीवंत परंपरा का प्रमाण है जो आज भी “वसुधैव कुटुम्बकम्” को केवल श्लोक नहीं, बल्कि जीवन का व्यवहार मानती है।
आज आवश्यकता तकनीक का विरोध करने की नहीं, बल्कि तकनीक और संस्कृति के बीच संतुलन स्थापित करने की है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इंटरनेट की गति बढ़ने के साथ-साथ रिश्तों की गर्माहट भी बनी रहे; कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास हो, लेकिन मानवीय संवेदनाएँ कृत्रिम न बनें; और सोशल मीडिया की लोकप्रियता वास्तविक जीवन के संबंधों पर भारी न पड़ जाए।
शिवचरण गुप्ता की वीडियो कॉल पर देखी गई अंतिम विदाई और कंचन कुमारी की लगभग सूनी अंतिम यात्रा हमें एक ही प्रश्न पूछने पर विवश करती है—क्या हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपने ही संस्कारों का अंतिम संस्कार तो नहीं कर रहे?
शास्त्रों ने बेटियों को भी दिया है अंतिम संस्कार का अधिकार
सोनीपत की यह घटना एक और भ्रांति को तोड़ने का अवसर देती है। समाज में प्रायः यह माना जाता है कि माता-पिता के अंतिम संस्कार का अधिकार केवल पुत्र को है, जबकि सनातन धर्म के शास्त्र ऐसा नहीं कहते।
गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु-गरुड़ संवाद के अनुसार, योग्य पुरुष सदस्य के अभाव में पत्नी, पुत्री या बहन भी अंतिम संस्कार का दायित्व निभा सकती है। महाभारत में भी महिलाओं द्वारा अपने परिजनों को जलांजलि देने के प्रसंग मिलते हैं। स्पष्ट है कि बेटियों को यह अधिकार धर्मसम्मत है।
ऐसे में शिवचरण जी की बेटियाँ चाहतीं तो अपने पिता की अंतिम विदाई में सम्मिलित होकर यह कर्तव्य निभा सकती थीं। धर्म ने उन्हें नहीं रोका, बल्कि अधिकार दिया था। यदि वे नहीं पहुँचीं, तो इसका कारण शास्त्र नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली, संवादहीनता और रिश्तों में बढ़ती संवेदनहीनता है।
यही इस घटना का सबसे बड़ा संदेश है—संतान को सबसे बड़ी विरासत धन नहीं, बल्कि समय, संस्कार और पारिवारिक मूल्य हैं। आज आवश्यकता है कि हम अपने बच्चों को केवल सफल ही नहीं, बल्कि संवेदनशील भी बनाएँ। क्योंकि परिवार बचेंगे, तभी समाज और राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक आत्मा के साथ सुरक्षित रहेंगे।
यदि इस प्रश्न का उत्तर हमें बेचैन करता है, तो यही बेचैनी हमारी आशा भी है। यही समय है जब हमें अपने परिवारों की ओर लौटना होगा, अपने बुजुर्गों का हाथ थामना होगा और अगली पीढ़ी को यह सिखाना होगा कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी तकनीक नहीं, बल्कि उसके परिवारों की आत्मीयता, समाज की संवेदनशीलता और संस्कृति की जीवंतता होती है। लेखक – वरिष्ठ पत्रकार एवं समसामयिक विषयों के विश्लेषक



