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आगर मालवाब्रेकिंग न्यूजसम-सामयिकस्पेशल रिपोर्ट

विश्व आदिवासी दिवस : आदिवासी संस्कृति कोई संग्रहालय की वस्तु नहीं, भारत की जीवित आत्मा है

ढोल की थाप, बांसुरी की तान और बिरसा मुंडा | सोयतकलां में विश्व आदिवासी दिवस की अद्भुत झलक

 विश्लेषण : राजेश कुमरावत ‘सार्थक’

ढोल की थाप थी।
बांसुरी की तान थी।
रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान थे।
महिलाओं के कदमों में लोकनृत्य की लय थी और पुरुषों के हाथों में परंपरा के प्रतीक वाद्य।

सड़क के दोनों ओर खड़े लोग इस दृश्य को केवल देख नहीं रहे थे, बल्कि जैसे भारत की किसी पुरानी स्मृति से उनका साक्षात्कार हो रहा था।

यह दृश्य किसी महानगर के सांस्कृतिक महोत्सव का नहीं था। यह दृश्य था मध्यप्रदेश के आगर-मालवा जिले के सोयतकलां नगर का, जहां 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आदिवासी समाज ने पहली बार नगर के प्रमुख मार्गों से ऐसी भव्य सांस्कृतिक शोभायात्रा निकाली, जिसमें परंपरा, संस्कृति, स्वाभिमान और राष्ट्रनायकों की स्मृति एक साथ दिखाई दी।

शोभायात्रा में भगवान बिरसा मुंडा का चित्र विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। झाबुआ क्षेत्र से आए पारंपरिक कलाकारों एवं समाजजनों की वेशभूषा, बांसुरी और लोकवाद्यों ने वातावरण को ऐसा बना दिया कि आधुनिक बाजारों और दुकानों के बीच कुछ समय के लिए जैसे आदिवासी भारत अपनी पूरी सांस्कृतिक गरिमा के साथ सामने आ खड़ा हुआ।

नगर के लोगों ने जगह-जगह शोभायात्रा का स्वागत किया। महिलाएं, पुरुष, बच्चे और युवा बड़ी संख्या में इस सांस्कृतिक यात्रा के साक्षी बने। आतिशबाजी हुई, लोकनृत्य हुए और अंततः शोभायात्रा सुंदरम गार्डन पहुंची, जहां कार्यक्रम का समापन हुआ।

लेकिन इस पूरे दृश्य के बीच एक प्रश्न मन में उठता है—

क्या आदिवासी दिवस केवल एक दिन आदिवासी नृत्य देखने और पारंपरिक वेशभूषा की प्रशंसा करने का अवसर है?

नहीं।

वास्तव में यह दिवस हमें भारत को समझने का एक अवसर देता है।


आदिवासी कौन हैं—और भारत के लिए उनका अर्थ क्या है?

‘आदिवासी’ शब्द सुनते ही अक्सर हमारे सामने जंगल, पहाड़, पारंपरिक वेशभूषा और लोकनृत्य की तस्वीर उभरती है। यह तस्वीर अधूरी है।

आदिवासी समाज को केवल उसकी वेशभूषा, नृत्य और भौगोलिक स्थिति से समझना उसके विराट योगदान को सीमित कर देना होगा।

भारत के जनजातीय समाजों ने सदियों से प्रकृति, जल, जंगल, जमीन और सामुदायिक जीवन के साथ एक विशिष्ट संबंध विकसित किया है। उनकी जीवनशैली में प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। उनके लोकगीतों में जंगल बोलता है, उनकी कथाओं में नदियां और पर्वत जीवित पात्रों की तरह उपस्थित होते हैं और उनके पर्व-त्योहार सामूहिक जीवन की भावना को मजबूत करते हैं।

आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट, जल संकट, जैव विविधता के संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली की बात कर रही है, तब आदिवासी समाज की परंपराओं और ज्ञान को नए दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।

संयुक्त राष्ट्र भी यह स्वीकार करता है कि दुनिया के आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और जीवन-पद्धतियों में प्रकृति एवं जैव विविधता के संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण अनुभव निहित हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार विश्व में लगभग 476 मिलियन आदिवासी लोग 90 देशों में रहते हैं और वे हजारों विशिष्ट संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अर्थात आदिवासी संस्कृति पिछड़ेपन की निशानी नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अनुभव का एक महत्वपूर्ण ज्ञान-स्रोत भी है।


बिरसा मुंडा: एक नाम नहीं, स्वाभिमान की चेतना

सोयतकलां की शोभायात्रा में बिरसा मुंडा का चित्र इसलिए विशेष अर्थ रखता है क्योंकि बिरसा मुंडा केवल एक जनजातीय नेता नहीं थे। वे भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में जनजातीय समाज के स्वाभिमान और प्रतिरोध के एक महान प्रतीक थे।

15 नवंबर 1875 को जन्मे बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश शासन और शोषणकारी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष किया। उन्होंने अपने समाज में आत्मसम्मान, संगठन और जागरण की भावना पैदा की। भारत सरकार के सांस्कृतिक स्रोत भी उन्हें जनजातीय नेता और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में रेखांकित करते हैं।

उनका संघर्ष केवल राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध नहीं था। उसमें अपने समाज की पहचान, सम्मान और अधिकारों की रक्षा का भाव भी था।

इसीलिए बिरसा मुंडा की स्मृति आज भी जनजातीय समाज के लिए प्रेरणा है।

भारत सरकार ने वर्ष 2021 से बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय किया। सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ सामाजिक सुधारक और जनजातीय आंदोलन के प्रमुख नायक के रूप में भी रेखांकित किया है।

यह बदलाव महत्वपूर्ण है।

क्योंकि इतिहास तब पूरा होता है, जब उसमें केवल राजमहलों और बड़े राजनीतिक केंद्रों की कहानी नहीं, बल्कि जंगलों, पहाड़ों और गांवों में संघर्ष करने वाले उन लोगों की गाथा भी शामिल होती है, जिन्होंने अपनी धरती और स्वाभिमान के लिए बलिदान दिया।


भारत का स्वतंत्रता संघर्ष केवल शहरों में नहीं लड़ा गया

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को यदि केवल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ या अहमदाबाद की राजनीतिक गतिविधियों के माध्यम से समझा जाएगा तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी।

देश के वनांचलों और जनजातीय क्षेत्रों में भी विदेशी शासन और शोषण के विरुद्ध अनेक आंदोलन हुए।

तिलका मांझी, सिद्धो-कान्हू, रानी गाइडिन्ल्यू, वीर नारायण सिंह, टंट्या भील, अल्लूरी सीताराम राजू, तेलंगा खड़िया, लक्ष्मण नायक और अनेक जननायकों ने अपने-अपने क्षेत्रों में संघर्ष की मशाल जलाई।

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने भी जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों की इस लंबी परंपरा को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण धारा के रूप में रेखांकित किया है।

दुर्भाग्य यह रहा कि इन अनेक नायकों की कहानियां लंबे समय तक व्यापक राष्ट्रीय विमर्श में उतनी प्रमुखता से नहीं पहुंचीं, जितनी पहुंचनी चाहिए थी।

इसलिए आज आवश्यकता केवल उनके नाम लेने की नहीं है।

आवश्यकता है कि उनके विचारों और संघर्ष को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।


आदिवासी समाज हमें क्या सिखा सकता है?

यह प्रश्न आज के भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

जब हम आदिवासी समाज की ओर देखते हैं तो हमें केवल उनकी समस्याएं नहीं देखनी चाहिए। हमें यह भी देखना चाहिए कि उनके जीवन में ऐसी कौन-सी शक्तियां हैं जिनसे आधुनिक समाज कुछ सीख सकता है।

पहली सीख—प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व

आधुनिक विकास की दौड़ ने मनुष्य और प्रकृति के बीच दूरी बढ़ाई है। आदिवासी जीवन-पद्धति में प्रकृति के साथ संबंध अपेक्षाकृत अधिक आत्मीय रहा है।

जंगल केवल लकड़ी का भंडार नहीं।
नदी केवल पानी का स्रोत नहीं।
पहाड़ केवल खनिजों का भंडार नहीं।

प्रकृति जीवन है।

आज जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट के दौर में यह दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक है।

दूसरी सीख—सामूहिकता

आदिवासी समाज की अनेक परंपराओं में सामूहिक श्रम और सामुदायिक सहभागिता का महत्व दिखाई देता है।

आज शहरी जीवन में पड़ोसी एक-दूसरे को पहचानते तक नहीं और परिवार मोबाइल स्क्रीन में बंटते जा रहे हैं। ऐसे समय में सामूहिकता की भावना समाज को फिर से जोड़ सकती है।

तीसरी सीख—अपनी पहचान पर गर्व

आधुनिकता का अर्थ अपनी पहचान छोड़ देना नहीं है।

सोयतकलां की शोभायात्रा में जब युवा पारंपरिक वेशभूषा पहनकर निकले, जब महिलाएं लोकनृत्य करती हुई आगे बढ़ीं और जब पारंपरिक वाद्य बजाए गए, तब यह संदेश स्पष्ट था कि आधुनिक भारत अपनी जड़ों से जुड़कर भी आधुनिक हो सकता है।

जो समाज अपनी जड़ों को भूल जाता है, वह विकास तो कर सकता है, लेकिन दिशा खो सकता है।


लोकनृत्य केवल मनोरंजन नहीं, इतिहास की मौखिक पुस्तक है

आज के डिजिटल युग में इतिहास पुस्तकों, फिल्मों और इंटरनेट पर खोजा जाता है।

लेकिन भारत में इतिहास का एक बड़ा हिस्सा लोकगीतों और लोकनृत्यों में भी सुरक्षित रहा है।

आदिवासी समाज की लोककलाओं में पीढ़ियों की स्मृतियां हैं। उनकी धुनों में उनके उत्सव हैं, उनके संघर्ष हैं, उनके रिश्ते हैं और प्रकृति के साथ उनका संवाद है।

सोयतकलां की शोभायात्रा में दिखाई दिया पारंपरिक नृत्य इसलिए महत्वपूर्ण था कि वह किसी मंच पर प्रस्तुत की गई ‘कलात्मक प्रस्तुति’ मात्र नहीं थी।

वह जीती-जागती संस्कृति थी।

झाबुआ क्षेत्र की पारंपरिक वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के साथ जब कलाकार सोयतकलां की सड़कों पर आगे बढ़े, तो यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी सुंदर उदाहरण बन गया।

एक नगर ने दूसरी क्षेत्रीय परंपरा का स्वागत किया और उसे सम्मान दिया।

यही तो भारत है।

भाषाएं अलग, बोलियां अलग, वेशभूषाएं अलग, नृत्य अलग—लेकिन आत्मा एक।


आदिवासी दिवस को उत्सव से आगे ले जाने की जरूरत

9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1994 में 9 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया था। यह तारीख 1982 में संयुक्त राष्ट्र के आदिवासी जनसंख्या संबंधी कार्यसमूह की पहली बैठक की स्मृति से जुड़ी है।

लेकिन किसी दिवस की सार्थकता तभी है जब वह समाज में कोई स्थायी चेतना पैदा करे।

यदि 9 अगस्त को हम केवल नृत्य करें, तस्वीरें खिंचवाएं और अगले दिन सब भूल जाएं तो दिवस औपचारिकता बनकर रह जाएगा।

आदिवासी दिवस का वास्तविक अर्थ तब होगा जब—

  • आदिवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले।
  • उनकी भाषाओं और लोक परंपराओं का संरक्षण हो।
  • उनकी पारंपरिक कला को सम्मान और बाजार मिले।
  • उनके इतिहास को भारतीय इतिहास के मुख्य पाठ्यक्रम में उचित स्थान मिले।
  • उनके युवाओं को आधुनिक अवसरों के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान से भी जोड़ा जाए।
  • उनकी पारंपरिक पर्यावरणीय समझ का वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन हो।
  • और सबसे महत्वपूर्ण—आदिवासी समाज को केवल ‘वंचित वर्ग’ के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता के सक्रिय निर्माता के रूप में देखा जाए।

संयुक्त राष्ट्र भी शिक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान और आदिवासी समुदायों की निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी के महत्व को रेखांकित करता रहा है।


नई पीढ़ी को बिरसा से जोड़ना होगा

आज का युवा मोबाइल, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में जी रहा है।

यह बुरा नहीं है।

प्रश्न यह है कि उसके हाथ में तकनीक के साथ इतिहास भी है या नहीं?

क्या उसे पता है कि बिरसा मुंडा कौन थे?

क्या उसे पता है कि टंट्या भील ने क्या किया?

क्या उसे रानी गाइडिन्ल्यू की कहानी मालूम है?

क्या उसे सिद्धो-कान्हू के संघर्ष की जानकारी है?

यदि नहीं, तो हमारी शिक्षा और सामाजिक चेतना दोनों के सामने चुनौती है।

हमें नई पीढ़ी को यह बताना होगा कि भारत का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं है। यह समाज के आत्मसम्मान, संस्कृति की रक्षा और स्वतंत्रता के लिए किए गए अनगिनत संघर्षों का इतिहास है।


सोयतकलां का संदेश राष्ट्रीय विमर्श तक पहुंचे

सोयतकलां की यह शोभायात्रा स्थानीय आयोजन जरूर थी, लेकिन इसका संदेश स्थानीय नहीं था।

यह संदेश पूरे देश के लिए था—

अपनी संस्कृति को बचाइए।
अपने नायकों को याद कीजिए।
अपनी जड़ों से जुड़िए।
प्रकृति का सम्मान कीजिए।
और समाज को विभाजित करने के बजाय विविधताओं को भारत की शक्ति बनाइए।

जिस समय दुनिया अपनी सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरणीय भविष्य को लेकर चिंतित है, उस समय भारत के जनजातीय समाज की परंपराओं को नए सम्मान और नए अध्ययन की आवश्यकता है।

यह सम्मान केवल सरकारी योजनाओं या समारोहों से नहीं आएगा।

यह तब आएगा जब समाज की दृष्टि बदलेगी।

जब कोई बच्चा आदिवासी नृत्य देखकर केवल यह नहीं कहेगा कि ‘कितना सुंदर नृत्य है’, बल्कि यह भी पूछेगा—

“इस नृत्य के पीछे की कहानी क्या है?”

जब कोई युवा बिरसा मुंडा का चित्र देखकर केवल नाम नहीं पहचानेगा, बल्कि उनके संघर्ष को समझेगा।

और जब कोई आधुनिक भारत का नागरिक यह महसूस करेगा कि जिस भारत को वह आज देख रहा है, उसकी नींव केवल आधुनिक संस्थाओं ने नहीं, बल्कि उन अनगिनत समुदायों ने भी रखी है जिन्होंने सदियों से इस भूमि, इसकी प्रकृति और इसकी संस्कृति के साथ अपना जीवन जोड़ा है।


संस्कृति बचेगी तो भारत की आत्मा बचेगी

सोयतकलां में विश्व आदिवासी दिवस की शोभायात्रा समाप्त हो गई।

आतिशबाजी थम गई।
ढोल की थाप शांत हो गई।
बांसुरी की आवाज बाजार की भीड़ में खो गई।
पारंपरिक वेशभूषा पहने कलाकार अपने घर लौट गए।

लेकिन एक प्रश्न पीछे छोड़ गए—

क्या हम केवल आज उन्हें देखकर लौट जाएंगे, या उनकी संस्कृति और जीवन-दृष्टि से कुछ सीखकर भी लौटेंगे?

आदिवासी समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संस्कृति है। उसकी सबसे बड़ी पूंजी उसकी सामूहिकता है। उसकी सबसे बड़ी विरासत उसके लोकनायक हैं और उसकी सबसे बड़ी सीख प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व है।

भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, लेकिन विविधता तभी शक्ति बनती है जब उसमें परस्पर सम्मान हो।

इसलिए विश्व आदिवासी दिवस का संदेश केवल आदिवासी समाज के लिए नहीं है।

यह पूरे भारत के लिए है।

भारत को आधुनिक बनना है, लेकिन अपनी स्मृति खोकर नहीं।
भारत को विकसित होना है, लेकिन अपनी प्रकृति को नष्ट करके नहीं।
भारत को आगे बढ़ना है, लेकिन अपनी जड़ों से कटकर नहीं।

सोयतकलां की सड़कों पर थिरकते वे कदम इसी भारत की तस्वीर थे—
एक ऐसा भारत जिसमें परंपरा और आधुनिकता आमने-सामने नहीं, साथ-साथ चल सकती हैं।

और शायद यही विश्व आदिवासी दिवस की सबसे बड़ी सार्थकता है।

क्योंकि आदिवासी संस्कृति भारत की परिधि नहीं है—
वह भारत की मूलधारा का एक जीवंत प्रवाह
है।

 

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