नलखेड़ा में आठ मौतें: मां बगलामुखी धाम के पास नाला उफना या व्यवस्था सो रही थी?
मां बगलामुखी धाम के पास दर्दनाक हादसे में तीन मासूमों समेत आठ जिंदगियां खत्म; घटना ने सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक तैयारी और जवाबदेही पर खड़े किए असहज सवाल

आस्था के दरबार में आठ मौतें : नाला उफना था या व्यवस्था सो रही थी?
मां बगलामुखी के दर पर मौत का मंजर, तीन मासूमों समेत आठ जिंदगियां खत्म; हादसे ने प्रशासन की तैयारी और जवाबदेही पर खड़े किए असहज सवाल
विशेष समसामयिक | राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
जिस दरबार में लोग अपने संकटों का समाधान मांगने आते हैं, उसी दरबार के बाहर आठ जिंदगियां एक ऐसे संकट में चली गईं, जिसे शायद समय रहते टाला जा सकता था। नलखेड़ा की मां बगलामुखी के दर्शन करने ओडिशा से आए श्रद्धालु महाकाल की नगरी उज्जैन से होकर इस पवित्र धाम पहुंचे थे। दर्शन के बाद लौटते समय बरसाती नाले के तेज बहाव में उनकी कार बह गई और तीन मासूम बच्चों, दो महिलाओं तथा तीन पुरुषों समेत आठ लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। घटना ने पूरे मालवा को स्तब्ध कर दिया है। पुलिस और प्रशासन मौके पर पहुंचे, रेस्क्यू हुआ, शव निकाले गए, जांच शुरू हुई और अब सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं। लेकिन मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा है—अगर प्रशासन को हादसे के बाद सब दिखाई दे जाता है, तो खतरा हादसे से पहले क्यों दिखाई नहीं दिया?
बारिश हुई, नाला उफना—यह प्रकृति है। लेकिन नाला कहां है, पानी किस दिशा में जाता है, बारिश में उसका बहाव कितना बढ़ सकता है, पुलिया कहां है, वाहन किस रास्ते से गुजरते हैं और श्रद्धालुओं की आवाजाही किस समय तक रहती है—यह सब प्रशासनिक व्यवस्था के दायरे में आता है। आखिर प्रशासन का मतलब केवल सरकारी गाड़ी, वायरलेस और अधिकारी का घटनास्थल पर पहुंचना ही तो नहीं है। प्रशासन का सबसे बड़ा काम दुर्घटना के बाद पंचनामा बनाना नहीं, दुर्घटना से पहले खतरे को पहचानना होना चाहिए।
और यही नलखेड़ा की घटना का सबसे कड़वा सवाल है।
मंदिर कोई अनजान, सुनसान स्थान नहीं है। यह देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां बाहर से लोग आते हैं, धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, देर रात तक आवाजाही होती है। मंदिर तक पहुंचने वाले रास्ते में बरसाती नाला है, पुलिया है और बारिश के दिनों में जलस्तर बढ़ने की संभावना कोई नई बात नहीं हो सकती। फिर सवाल यह है कि क्या मानसून से पहले उस पूरे क्षेत्र का सुरक्षा ऑडिट हुआ था? क्या यह तय किया गया था कि पानी बढ़ने पर किस बिंदु से वाहनों को रोका जाएगा? क्या वहां मजबूत बैरिकेड थे? क्या रात में पर्याप्त रोशनी थी? क्या कोई सुरक्षाकर्मी तैनात था? क्या चेतावनी का ऐसा इंतजाम था जिसे बाहर से आया श्रद्धालु भी बिना स्थानीय जानकारी के समझ सके?
अगर इन सवालों का जवाब ‘हां’ है तो फिर यह भी पूछा जाना चाहिए कि उस रात वह व्यवस्था काम क्यों नहीं कर सकी। और यदि जवाब ‘नहीं’ है तो फिर सवाल और गंभीर हो जाता है—इतने बड़े धार्मिक स्थल पर ऐसी व्यवस्था थी ही क्यों नहीं?
प्रशासन हादसे के बाद जागा या पहले से जाग रहा था?
हादसे के बाद प्रशासन और पुलिस की टीम मौके पर पहुंची, बचाव अभियान चलाया गया और कार को बाहर निकालने की कोशिश की गई। यह प्रशासन का कर्तव्य था और उसने किया। लेकिन जनता का सवाल इससे आगे है। राहत और बचाव व्यवस्था होना जरूरी है, मगर उससे पहले रोकथाम की व्यवस्था होना उससे भी ज्यादा जरूरी है।
आज तकनीक का युग है। मोबाइल नेटवर्क है, सीसीटीवी है, मौसम की चेतावनियां हैं, कंट्रोल रूम हैं, पुलिस वायरलेस है और प्रशासन के पास आपदा प्रबंधन की पूरी व्यवस्था है। फिर किसी प्रमुख धार्मिक स्थल के समीप बरसाती नाले को केवल ‘बारिश में बहने वाला नाला’ मानकर छोड़ देना क्या पर्याप्त है?
यदि किसी मार्ग पर पानी का बहाव इतना बढ़ जाए कि वाहन बह सकता है, तो वहां लाल झंडा, बैरिकेड, चेतावनी बोर्ड, प्रकाश व्यवस्था और रात्रि सुरक्षा जैसी सामान्य सावधानियां क्यों नहीं दिखाई देनी चाहिए? क्या प्रशासन इस उम्मीद में रहता है कि हर चालक खुद खतरे को पहचान लेगा? अगर ऐसा है तो फिर सुरक्षा व्यवस्था का अर्थ ही क्या रह जाता है?
पुलिस की प्रारंभिक जांच में तेज बहाव के बीच कार द्वारा नाला पार करने की आशंका जताई गई है। इस पहलू की जांच होना स्वाभाविक है। यदि चालक की कोई गलती सामने आती है तो वह भी तथ्य के आधार पर तय होनी चाहिए। लेकिन एक चालक की संभावित गलती को जांच का अंतिम अध्याय बना देना उचित नहीं होगा। क्योंकि उसके बाद भी एक सवाल बचा रहेगा—उसे रोकने वाला कौन था?
यही वह प्रश्न है जिससे प्रशासन को असहजता हो सकती है, लेकिन जनता को जवाब चाहिए।
किसी भी व्यवस्था की मजबूती का पता उसके सामान्य दिनों से नहीं, बल्कि असामान्य परिस्थितियों में चलता है। बारिश हुई और पानी बढ़ गया—यही तो वह असामान्य परिस्थिति थी जिसके लिए प्रशासन को तैयार रहना चाहिए था। अगर उस क्षण व्यवस्था केवल देखने की स्थिति में थी, रोकने की स्थिति में नहीं, तो व्यवस्था की समीक्षा तो करनी ही पड़ेगी।

आठ मौतें केवल मुआवजे से शांत नहीं होंगी
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घटना पर दुख व्यक्त करते हुए मृतकों के परिजनों को चार-चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। सरकार की ओर से आर्थिक सहायता शोकाकुल परिवारों के लिए तत्काल सहारा है और इस संवेदनशील समय में सरकार की जिम्मेदारी का हिस्सा भी है। लेकिन सच यह है कि मुआवजा किसी मां का बच्चा वापस नहीं ला सकता, किसी पति की पत्नी वापस नहीं ला सकता और किसी परिवार का सहारा वापस नहीं ला सकता।
इसलिए अब सरकार और प्रशासन के सामने असली चुनौती आर्थिक सहायता से आगे की है।
आठ मौतों के बाद क्या बदलेगा?
क्या वही नाला फिर बारिश में उफनेगा?
क्या वही पुलिया फिर वाहनों को गुजरते देखेगी?
क्या फिर कोई बाहर से आया श्रद्धालु यह जाने बिना उस रास्ते पर जाएगा कि आगे मौत का पानी खड़ा है?
या इस घटना के बाद वहां ऐसी व्यवस्था होगी कि पानी का स्तर बढ़ते ही रास्ता अपने आप बंद हो जाए?
यही तय करेगा कि नलखेड़ा की आठ मौतें केवल एक दुखद खबर बनकर रह गईं या उन्होंने व्यवस्था को सचमुच बदल दिया।
हादसे के बाद नलखेड़ा में लोगों का आक्रोश भी सामने आया और चक्काजाम की स्थिति बनी। रिपोर्टों में मंदिर के आसपास निजी हवन कुंडों को लेकर भी स्थानीय लोगों की नाराजगी का उल्लेख है। जनता के इस आक्रोश को केवल भीड़ की उत्तेजना समझकर दबा देना आसान रास्ता हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक प्रशासन का रास्ता आसान नहीं, जवाबदेह होना चाहिए। जनता पूछ रही है तो उसे यह बताया जाना चाहिए कि क्या हुआ, क्यों हुआ और अब क्या बदलेगा।
लाठी से रास्ता खाली कराया जा सकता है, सवाल खाली नहीं कराए जा सकते।
यही इस घटना का सबसे बड़ा संदेश है।
यदि स्थानीय स्तर पर पहले भी मंदिर क्षेत्र की व्यवस्थाओं, नाले, पुलिया या अन्य समस्याओं को लेकर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया गया था, तो उन शिकायतों की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। शिकायत किसने की, कब की, किस अधिकारी के पास गई, उस पर क्या कार्रवाई हुई—इन सबका रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। यदि शिकायतें नहीं हुई थीं तो भी यह जांचना होगा कि नियमित निरीक्षण व्यवस्था क्या थी।
क्योंकि व्यवस्था की जिम्मेदारी केवल शिकायत मिलने के बाद शुरू नहीं होती।
प्रशासन को कई बार वह खतरा भी देखना पड़ता है जिसकी शिकायत किसी ने अभी की ही नहीं।
यही प्रशासनिक दूरदृष्टि है।
नलखेड़ा में अब सबसे जरूरी काम किसी एक व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का पोस्टमार्टम करना है। मंदिर परिसर से लेकर नाले तक, पुलिया से लेकर सड़क तक, प्रकाश व्यवस्था से लेकर सीसीटीवी तक, रात्रि सुरक्षा से लेकर आपदा प्रबंधन तक—हर बिंदु की जांच होनी चाहिए। यदि कहीं लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
और जिम्मेदारी तय करने का अर्थ किसी निर्दोष को बलि का बकरा बनाना नहीं है। जिम्मेदारी का अर्थ है—जिसके हिस्से का काम था, उसने वह काम किया या नहीं, इसका तथ्यात्मक परीक्षण।
नलखेड़ा को अब केवल सुंदर मंदिर, विशाल योजनाओं और बढ़ते धार्मिक पर्यटन के केंद्र के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उसे एक ऐसे तीर्थ के रूप में विकसित करना होगा जहां श्रद्धालु दर्शन के लिए आए तो प्रशासन की व्यवस्था उसके साथ एक अदृश्य सुरक्षा कवच की तरह चलती रहे।
मंदिर बड़ा हो गया, श्रद्धालु बढ़ गए, धार्मिक पर्यटन बढ़ गया—तो क्या सुरक्षा व्यवस्था भी उसी अनुपात में बढ़ी?
यह सवाल आज नलखेड़ा पूछ रहा है।
और इसका उत्तर केवल नलखेड़ा नहीं, पूरे मध्यप्रदेश के बड़े धार्मिक स्थलों को देना होगा।
क्योंकि यदि किसी तीर्थ की ख्याति देशभर में है तो उसकी सुरक्षा व्यवस्था भी स्थानीय सोच से नहीं, व्यापक दृष्टि से बननी चाहिए। बाहर से आने वाला श्रद्धालु रास्ता नहीं जानता, खतरे की भाषा नहीं समझता और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों से परिचित नहीं होता। उसके लिए प्रशासन ही रास्ते का सबसे भरोसेमंद मार्गदर्शक है।
आज जरूरत है कि नलखेड़ा में स्थायी सुरक्षा प्रोटोकॉल बने। बरसाती नालों और संवेदनशील पुलियाओं की पहचान हो। मानसून में जलस्तर बढ़ने पर तत्काल मार्ग बंद करने की व्यवस्था हो। पर्याप्त रोशनी और बैरिकेडिंग हो। रात्रि में पुलिस या सुरक्षा कर्मियों की तैनाती हो। सीसीटीवी निगरानी प्रभावी हो। मंदिर प्रबंधन, नगर परिषद, पुलिस, प्रशासन और आपदा प्रबंधन के बीच तत्काल सूचना का तंत्र हो। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए स्पष्ट सुरक्षा निर्देश लगाए जाएं।
और सबसे बढ़कर—हर मानसून से पहले उस पूरे क्षेत्र का सुरक्षा ऑडिट हो।
आठ मौतों के बाद अब फाइलें नहीं, फैसले चाहिए।
रिपोर्ट नहीं, परिणाम चाहिए।
बैठक नहीं, जमीन पर व्यवस्था चाहिए।
और आश्वासन नहीं, ऐसी सुरक्षा चाहिए जिसे अगली बारिश खुद प्रमाणित करे।
मां बगलामुखी के दरबार में जिन आठ लोगों ने अपनी जान गंवाई, उनमें तीन मासूम बच्चे भी थे। उनके परिवारों का दुःख शब्दों में नहीं मापा जा सकता। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि केवल शोक संदेश और मुआवजे में नहीं होगी।
सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी, जब उस नाले के किनारे अगली बारिश में कोई मां अपने बच्चे को लेकर यह डर महसूस न करे कि दर्शन से लौटते समय कहीं रास्ता ही मौत का रास्ता न बन जाए।
नलखेड़ा की यह घटना प्रशासन से बदला नहीं मांगती, जवाब मांगती है।
जनता किसी अधिकारी की कुर्सी नहीं मांग रही, वह अपनी सुरक्षा का भरोसा मांग रही है।
और यह मांग अनुचित नहीं है।
क्योंकि आस्था के दरबार तक श्रद्धालु को सुरक्षित पहुंचाना व्यवस्था की जिम्मेदारी है, लेकिन उसे सुरक्षित वापस घर पहुंचाना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है—
“नाला तो बारिश में उफना था, लेकिन क्या व्यवस्था भी उसी समय तक सोई हुई थी?”
लेखक –
वरिष्ठ पत्रकार | समसामयिक विषयों के विश्लेषक
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