IMG-20260815-WA0013
previous arrow
next arrow
'सार्थक' दृष्टिकोणआपके लेखसम-सामयिकसम्पादकीय

हनुमान अंश: ₹2 करोड़ की फिल्म ने कैसे जगाई सनातन चेतना? | राजेश कुमरावत ‘सार्थक’

हनुमान अंश: नीम करौली बाबा की जीवनगाथा पर आधारित ‘हनुमान अंश’ ने दर्शकों के बीच बनाई विशेष जगह। जानिए कैसे छोटे बजट की इस फिल्म ने सिनेमा और सनातन चेतना के बीच नया संवाद खड़ा किया।

हनुमान अंश : सिनेमा जब साधना बना और हार गया बॉलीवुड का वैचारिक विष

₹2 करोड़ के लघु बजट में उपजी सनातन चेतना की वह गाथा, जिसने बॉक्स ऑफिस के स्थापित गणित को चुनौती देकर सिनेमाघरों को सत्संग स्थल में बदल दिया

लेखक – राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
वरिष्ठ पत्रकार | समसामयिक विषयों के विश्लेषक | सनातन संस्कृति अनुरागी

थियेटर जब साक्षात पावन धाम बन गया

पिछले सप्ताह अहमदाबाद के एक खचाखच भरे सिनेमाघर में प्रवेश करते समय यह आभास नहीं था कि आधुनिक मनोरंजन की चकाचौंध के बीच एक ऐसी आध्यात्मिक अनुभूति प्रतीक्षा कर रही है, जो भीतर तक स्पर्श कर जाएगी।

सामान्यतः सिनेमाघरों की पहचान मनोरंजन, शोर और भागदौड़ से होती है, लेकिन ‘हनुमान अंश’ की कथा आरंभ होते ही वातावरण बदल गया। पर्दे पर नीम करौली बाबा के बाल्यकाल, वैराग्य, भक्ति और जनसेवा की यात्रा आगे बढ़ती गई और पूरा सभागार जैसे किसी सत्संग में परिवर्तित होता चला गया।

बाबा की जीवनयात्रा के भावपूर्ण प्रसंगों ने मेरी आँखों को चार-पाँच बार नम कर दिया। लेकिन यह केवल मेरा अनुभव नहीं था। आसपास नजर दौड़ाई तो अनेक दर्शक उसी भाव में डूबे दिखाई दिए। किसी की आँखें नम थीं, किसी के चेहरे पर भक्ति का भाव था और किसी के होंठों पर अनायास ही जयकारा।

यह दृश्य अपने आप में एक प्रश्न भी था—क्या भारतीय दर्शक वास्तव में अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर हो गए हैं, या फिर उन्हें केवल ऐसी सार्थक अभिव्यक्ति की प्रतीक्षा थी, जिसमें उन्हें अपना भारत दिखाई दे?

परिवार लौटा तो सिनेमाघर फिर परिवार का हो गया

भारतीय परिवार और सिनेमा का रिश्ता पिछले कुछ वर्षों में कई कारणों से कमजोर हुआ है। मर्यादाहीन मनोरंजन, अनावश्यक हिंसा और परिवार के साथ बैठकर देखने में असहज करने वाली सामग्री ने बड़ी संख्या में परिवारों को सिनेमाघरों से दूर किया।

लेकिन ‘हनुमान अंश’ का दृश्य अलग था।

दादा-दादी, माता-पिता और छोटे बच्चे एक साथ फिल्म देखने पहुंचे थे। यह केवल फिल्म देखने का अवसर नहीं, बल्कि एक पारिवारिक सांस्कृतिक समागम जैसा अनुभव बन गया।

जब पर्दे पर बाबा की भक्ति और सनातन चेतना के प्रसंग आते, पूरा सभागार ‘नीम करौली बाबा की जय’ और ‘जय श्री राम’ के जयघोष से गूंज उठता।

बच्चों के चेहरे पर उत्साह, बड़ों की आँखों में श्रद्धा और वातावरण में गूंजते जयकारे—यह दृश्य बताता है कि भारतीय समाज के भीतर अपनी जड़ों से जुड़ने की आकांक्षा आज भी उतनी ही जीवंत है।

लोकल ट्रेन में गाने वाले सुनील की आवाज बनी फिल्म की आत्मा

‘हनुमान अंश’ की सबसे मार्मिक विशेषताओं में से एक है—नेत्रहीन गायक सुनील लोधी की आवाज।

बुंदेलखंड के सुनील लोधी कभी दो वक्त की रोटी के लिए लोकल ट्रेनों में गाया करते थे। औपचारिक संगीत शिक्षा के अभाव में उन्होंने लता मंगेशकर के गीत सुन-सुनकर अपने सुर साधे। आज वही आवाज करोड़ों दर्शकों के हृदय तक पहुंच रही है।

जब बड़े पर्दे पर सुनील की निष्कपट और रूहानी आवाज गूंजती है तो वातावरण में एक अलग ही कंपन महसूस होता है—

“इनमें मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, अपनी नाव है चलाई…
अब तुम ही बचाओ मोहे संकट से, हे पवनपुत्र सुखदाई…”

इन पंक्तियों में केवल संगीत नहीं, बल्कि समर्पण है। एक दृष्टिबाधित कलाकार की आवाज जब भक्त और भगवान के बीच संवाद का माध्यम बनती है, तो वह मनोरंजन से कहीं आगे निकल जाती है।

यही वह क्षण है जब सिनेमा कला नहीं, साधना दिखाई देने लगता है।

घर के मंदिर में लिखी स्तुति बनी फिल्म के महत्वपूर्ण दृश्य की आत्मा

‘हनुमान अंश’ की निर्माण यात्रा में भी कई ऐसे प्रसंग हैं, जो इसे सामान्य व्यावसायिक फिल्म से अलग बनाते हैं।

ग्वालियर के श्रेयस धर्माधिकारी के घर में एक छोटा-सा हनुमान मंदिर है। उन्होंने अपने आराध्य की सेवा और श्रद्धा के भाव से एक स्तुति लिखी थी। इसका उद्देश्य किसी व्यावसायिक लाभ से जुड़ा नहीं था।

जब फिल्म के निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी नीम करौली बाबा द्वारा मंदिर निर्माण के महत्वपूर्ण दृश्य के लिए उपयुक्त गीत की तलाश में थे, तब श्रेयस ने अपनी रचना उन्हें सुनाई।

गीत दृश्य के भाव से इस तरह जुड़ा कि लगा मानो वह उसी प्रसंग के लिए रचा गया हो। श्रेयस ने भी इसे किसी व्यावसायिक सौदे के रूप में नहीं, बल्कि ‘हनुमान काज’ मानकर समर्पित कर दिया।

यह प्रसंग बताता है कि कभी-कभी रचनाएं बाजार की जरूरत से नहीं, आस्था की अनुभूति से जन्म लेती हैं।

कैंची धाम से लौटे संगीतकार ने घर को ही बना दिया स्टूडियो

संगीतकार धीरेंद्र मुल्कलवार के लिए भी यह फिल्म एक विशेष आध्यात्मिक अनुभव लेकर आई।

कैंची धाम की यात्रा से लौटने के कुछ समय बाद उन्हें फिल्म के संगीत से जुड़ने का अवसर मिला। बड़े स्टूडियो की लागत से बचने के लिए उन्होंने अपने घर को ही रिकॉर्डिंग स्टूडियो में बदल लिया।

‘सियावर रामचंद्र की जय’ का उद्घोष और पृष्ठभूमि संगीत जब तैयार हुआ तो उसमें ऐसी ऊर्जा दिखाई दी, जिसने सिनेमाघर के वातावरण को ही बदल दिया।

यही छोटे-छोटे प्रसंग मिलकर फिल्म की उस आत्मा का निर्माण करते हैं, जिसमें भव्यता से अधिक भाव दिखाई देता है।

₹2 करोड़ बनाम ₹200 करोड़—बॉक्स ऑफिस से बड़ा है संदेश

7 अगस्त को देश की सीमित संख्या में स्क्रीन्स से शुरुआत करने वाली इस फिल्म ने जिस प्रकार दर्शकों का विश्वास अर्जित किया, उसने स्थापित व्यावसायिक गणित को चुनौती दी।

लगभग ₹2 करोड़ के लघु बजट से बनी फिल्म की ₹200 करोड़ से अधिक की कमाई का दावा अपने आप में चर्चा का विषय है। लेकिन ‘हनुमान अंश’ की वास्तविक सफलता केवल कमाई के आंकड़े में नहीं है।

इसकी असली सफलता उस दर्शक के चेहरे पर दिखाई देती है, जो अपने परिवार के साथ सिनेमाघर से बाहर निकलकर भीतर एक संतोष लेकर लौटता है।

यह फिल्म उस धारणा को भी चुनौती देती दिखाई देती है कि दर्शक केवल बड़े सितारों, विशाल बजट और आक्रामक प्रचार से ही आकर्षित होता है।

दर्शक को कहानी चाहिए। संवेदना चाहिए। अपनी संस्कृति से जुड़ने का अवसर चाहिए।

और जब उसे यह सब ईमानदारी से मिलता है, तो वह छोटे बजट की फिल्म को भी बड़ा बना सकता है।

क्या बदल रहा है भारतीय दर्शक का स्वाद?

यहाँ ‘हनुमान अंश’ से आगे जाकर एक व्यापक प्रश्न खड़ा होता है।

क्या भारतीय दर्शक अब उस मनोरंजन से ऊब रहा है, जिसमें नशे, अमर्यादा, अनावश्यक हिंसा और सांस्कृतिक हीनभावना को आधुनिकता का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया जाता है?

शायद इसका उत्तर इन सिनेमाघरों में दिखाई दे रहे पारिवारिक दृश्यों में छिपा है।

भारतीय समाज अपनी संस्कृति को लेकर शर्मिंदा नहीं है। वह अपनी परंपराओं को आधुनिक संदर्भ में देखने और समझने के लिए तैयार है। वह मनोरंजन का विरोधी नहीं है, लेकिन मनोरंजन के नाम पर अपनी संवेदनाओं का अपमान स्वीकार करना भी नहीं चाहता।

यही कारण है कि जब कोई रचना श्रद्धा, परिवार, संस्कार और राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना को सकारात्मक रूप में सामने रखती है, तो उसके साथ दर्शकों का भावनात्मक संबंध बन जाता है।

यह केवल फिल्म नहीं, सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेत है

‘हनुमान अंश’ को केवल बॉक्स ऑफिस की सफलता के चश्मे से देखना उसके प्रभाव को छोटा कर देना होगा।

इस फिल्म का महत्व इस बात में है कि इसने सिनेमाघर और सत्संग, मनोरंजन और साधना, परिवार और संस्कृति के बीच एक ऐसा सेतु बनाया है जिसकी आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

अहमदाबाद के उस सिनेमाघर से बाहर निकलते हुए चेहरों पर जो संतोष दिखाई दिया, वह किसी फिल्म के सफल होने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था।

वह संतोष इस बात का संकेत था कि भारत की सांस्कृतिक चेतना अभी जीवित है।

और शायद यही ‘हनुमान अंश’ का सबसे बड़ा संदेश है—जब नीयत निर्मल हो, उद्देश्य लोककल्याण का हो और रचना अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा से जन्म ले, तो छोटी-सी शुरुआत भी बड़े परिवर्तन का कारण बन सकती है।

रामायण में सेतु निर्माण के समय गिलहरी का योगदान छोटा था, लेकिन उसकी भावना छोटी नहीं थी।

सिनेमा के विशाल बाजार में ‘हनुमान अंश’ भी शायद ऐसी ही एक गिलहरी का प्रयास है।

और यदि इस प्रयास ने परिवारों को फिर से सिनेमाघर तक पहुंचाया, दर्शकों को अपनी जड़ों से जोड़ा और मनोरंजन के बीच भक्ति की अनुभूति कराई, तो इसकी सफलता केवल बॉक्स ऑफिस की सफलता नहीं कही जा सकती।

यह उस भारत की सफलता है, जो आधुनिकता को स्वीकार करता है, लेकिन अपनी आत्मा को विस्मृत नहीं करता।

जय नीम करौली बाबा।
जय पवनपुत्र हनुमान।

लेखक: वरिष्ठ पत्रकार एवं समसामयिक विषयों के प्रखर विश्लेषक हैं। वे सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय विचारों को जन-जन तक पहुंचाने वाले वैचारिक मंच ‘जनमत जागरण’ के संस्थापक एवं संपादक हैं।

यह भी पढ़ें 👉 दिल्ली जंतर मंतर आंदोलन : लोकतंत्र, सूचना युद्ध और राष्ट्रीय चेतना के सामने खड़े होते नए प्रश्न

वैश्विक विमर्श: वसुधैव कुटुम्बकम् से घबराहट क्यों? तिरंगे के अपमान ने खोला भारत-विरोध का सच

सुसनेर नगर सरकार का रण: वार्ड-4 की जंग अब अध्यक्ष की कुर्सी तक!

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *