सुसनेर निकाय उपचुनाव: नामांकन की आखिरी तारीख, फिर भी भाजपा-कांग्रेस का मैंडेट गायब! फैसला या फुल सस्पेंस?
आज नामांकन की अंतिम तारीख, लेकिन दोनों दलों ने अब तक किसी प्रत्याशी को अधिकृत मैंडेट नहीं दिया; भाजपा में प्रदीप सोनी-मांगीलाल सोनी के नाम पर सस्पेंस, कांग्रेस में विष्णु पाटीदार चर्चा में

पर्चे तैयार, दावेदार तैयार… लेकिन मैंडेट का पता नहीं!
सुसनेर निकाय उपचुनाव में भाजपा-कांग्रेस का ‘महासस्पेंस’—अंतिम दिन भी प्रत्याशी के नाम पर सन्नाटा, संगठन की निर्णय क्षमता पर उठे सवाल
“सुसनेर की सियासी नब्ज पर नजर ”
राजनीतिक विश्लेषण : दीपक जैन | संवाददाता, जनमत जागरण
सुसनेर नगर परिषद अध्यक्ष पद के उपचुनाव में आज नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख है। निर्वाचन कार्यालय में दावेदार अपने-अपने नामांकन दाखिल करने की तैयारी में हैं। करीब एक दर्जन संभावित दावेदार नामांकन पत्र ले चुके हैं। चुनावी मैदान तैयार है, राजनीतिक समीकरण बन चुके हैं, समर्थक सक्रिय हैं और सोशल मीडिया पर संभावित प्रत्याशियों के नाम भी घूम रहे हैं—लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अब तक किसी भी प्रत्याशी को अधिकृत मैंडेट नहीं दिया है।
यही इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक सस्पेंस है।
पर्चा कौन भरेगा, यह दावेदार तय कर चुके हैं… लेकिन पार्टी का प्रत्याशी कौन होगा, यह पार्टी अभी तक तय नहीं कर पाई है!
और अब यह स्थिति महज टिकट का सस्पेंस नहीं रह गई है। यह स्थानीय संगठन से लेकर प्रदेश स्तर के नेतृत्व की निर्णय क्षमता, रणनीति और समय पर फैसला लेने की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रही है।
टिकट गोपनीय है या फैसला ही गोपनीय है?
भाजपा और कांग्रेस द्वारा अंतिम समय तक टिकट का नाम और मैंडेट रोककर रखने के पीछे राजनीतिक रणनीति बताई जा रही है। तर्क यह हो सकता है कि यदि पहले ही प्रत्याशी का नाम घोषित कर दिया गया तो टिकट से वंचित दावेदार बगावत कर सकते हैं, निर्दलीय मैदान में उतर सकते हैं या भीतरघात का खतरा पैदा हो सकता है।
रणनीति अपनी जगह सही हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि— जब नामांकन की अंतिम तारीख आज है, तो टिकट के बाद असंतुष्टों को मनाने, कार्यकर्ताओं को एकजुट करने और चुनावी मशीनरी को सक्रिय करने के लिए समय कितना बचेगा?
क्या संगठन यह मानकर चल रहा है कि टिकट मिलते ही बाकी सभी दावेदार कुछ घंटों में संतुष्ट हो जाएंगे?
राजनीति में यह गणित कागज पर जितना आसान दिखाई देता है, जमीन पर उतना ही कठिन होता है।
भाजपा में प्रदीप सोनी या मांगीलाल सोनी?
भाजपा के भीतर फिलहाल प्रदीप सोनी और मांगीलाल सोनी के नाम सबसे अधिक चर्चा में हैं।
प्रदीप सोनी को युवा चेहरा, हाल के चार माह के कार्यकाल से बनी लोकप्रियता और सोशल मीडिया पर मजबूत उपस्थिति का लाभ मिलने की चर्चा है। वहीं मांगीलाल सोनी को अनुभव, लंबे संगठनात्मक जुड़ाव और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से नजदीकी के कारण मजबूत दावेदार माना जा रहा है।
दोनों पिछड़ा वर्ग से आते हैं और सोनी समाज को नगर की राजनीति में महत्वपूर्ण प्रभाव वाला माना जाता है।
इसलिए भाजपा का फैसला केवल दो नामों में से एक नाम चुनने का फैसला नहीं होगा।
यह फैसला होगा— युवा बनाम अनुभव,
लोकप्रियता बनाम संगठनात्मक पकड़,
सोशल मीडिया बनाम जमीनी नेटवर्क
और स्थानीय समीकरण बनाम संगठन की पसंद के बीच।
चर्चा यह भी है कि पार्टी आंतरिक सर्वे और जीत की संभावनाओं को ध्यान में रखकर अंतिम निर्णय करना चाहती है।
लेकिन अब राजनीतिक गलियारों में व्यंग्य के साथ सवाल पूछा जा रहा है—
“सर्वे हो गया तो रिपोर्ट कहां है और रिपोर्ट आ गई तो फैसला कहां है?”
कांग्रेस में भी ‘आखिरी गेंद’ का इंतजार
कांग्रेस की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है।
संभावित दावेदारों को नामांकन दाखिल करने के लिए तैयार रहने के संकेत दिए जाने की चर्चा है। कांग्रेस की ओर से विष्णु पाटीदार का नाम प्रमुखता से सामने आया है और वे जनसंपर्क में सक्रिय भी बताए जा रहे हैं।
लेकिन पार्टी की ओर से अभी तक अधिकृत मैंडेट नहीं दिया गया है।
अर्थात कांग्रेस में भी स्थिति यही है—
दावेदार मैदान में, समर्थक मैदान में, नामांकन की तैयारी मैदान में… लेकिन पार्टी का अधिकृत फैसला अभी पर्दे के पीछे।
सोशल मीडिया ने प्रत्याशी तय कर दिए, पार्टियां अभी सोच रही हैं!
सुसनेर की चुनावी राजनीति का सबसे मजेदार पहलू यही है कि राजनीतिक दलों की आधिकारिक चुप्पी के बावजूद सोशल मीडिया पर संभावित प्रत्याशियों के नाम और फोटो तेजी से घूम रहे हैं। समर्थक अपने-अपने नेताओं को प्रत्याशी मानकर प्रचार कर रहे हैं। लेकिन पार्टी की ओर से अधिकृत मैंडेट का इंतजार जारी है। ऐसे में सुसनेर की राजनीतिक स्थिति पर एक व्यंग्य बिल्कुल फिट बैठता है—
“सोशल मीडिया ने टिकट बांट दिए, समर्थकों ने प्रचार शुरू कर दिया और दावेदारों ने पर्चे ले लिए… बस संगठन अभी मैंडेट की तलाश में है!”
जब संगठन फैसला न करे, तो मतदाता क्या समझे?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे हास्यप्रद और चिंताजनक पहलू यही है कि चुनाव तय है, नामांकन की तारीख तय है, दावेदार तय हैं, समर्थक तय हैं… लेकिन राजनीतिक दलों का निर्णय अभी तक तय नहीं!
ऐसे में आम मतदाता के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठना लाजिमी है—
क्या संगठन के जवाबदार अधिकारी निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं?
या निर्णय लेने से पहले किसी और ‘हरी झंडी’ का इंतजार है?
क्या स्थानीय नेतृत्व को निर्णय लेने का अधिकार नहीं है?
या प्रदेश स्तर पर फैसला इतना उलझा हुआ है कि अंतिम दिन तक भी ‘किसे मैदान में उतारा जाए’ तय नहीं हो पा रहा?
यदि स्थानीय परिस्थितियां स्पष्ट हैं, दावेदार सामने हैं और चुनावी समीकरणों का पूरा हिसाब संगठन के पास है, तो फिर फैसला समय पर क्यों नहीं?
और यदि किसी दबाव, असमंजस, राजनीतिक संतुलन या अन्य कारण से फैसला रुका हुआ है, तो सवाल और बड़ा हो जाता है—
क्या संगठन की स्थानीय इकाइयां केवल कार्यकर्ताओं को चुनाव में लगाने के लिए हैं या समय पर राजनीतिक निर्णय लेने के लिए भी?
प्रदेश संगठन पर भी उठती है उंगली
यह मामला अब केवल सुसनेर के स्थानीय पदाधिकारियों तक सीमित नहीं है।
यदि किसी दल में प्रत्याशी चयन का निर्णय प्रदेश स्तर तक जाता है, तो प्रदेश संगठन की भूमिका भी स्वाभाविक रूप से सवालों के घेरे में आती है।
राजनीति में सही समय पर सही निर्णय लेना नेतृत्व की पहचान माना जाता है।
यदि प्रदेश स्तर के जिम्मेदार पदाधिकारी स्थानीय समीकरणों, संभावित प्रत्याशियों की ताकत, सामाजिक संतुलन और चुनावी परिस्थितियों का समय रहते आकलन नहीं कर पाते, तो फिर अंतिम क्षण में लिया गया निर्णय कितना प्रभावी होगा?
और अगर सब कुछ पहले से तय है, तो फिर मैंडेट देने में इतनी गोपनीयता क्यों?
सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि टिकट मिलने के बाद सिर्फ प्रत्याशी को मैदान में नहीं उतरना होता—पूरे संगठन को उसके पीछे खड़ा करना होता है।
लेकिन यदि टिकट की घोषणा ही अंतिम क्षण में होगी तो नाराज दावेदारों को मनाने, समर्थकों को साथ लाने और संगठनात्मक ऊर्जा को एक दिशा देने का समय भी उतना ही कम होगा।
‘साहब, पर्चा कौन भरे?’—कार्यकर्ता का सबसे बड़ा सवाल!
कल्पना कीजिए, चुनाव कार्यालय के बाहर कार्यकर्ता खड़ा है।
वह पूछता है— “साहब, पार्टी का उम्मीदवार कौन है?”
जवाब आता है—“अभी पता नहीं।” वह फिर पूछता है—
“मैंडेट किसके पास है?” जवाब— “अभी आया नहीं।” फिर सवाल— “तो प्रचार किसका करें?” और शायद सबसे सुरक्षित जवाब होगा—“पहले ऊपर से पूछकर आने दीजिए!” यही स्थिति यदि बार-बार बने तो आम मतदाता और कार्यकर्ता के मन में संगठन की निर्णय क्षमता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
चुनाव मैदान में लड़ा जाता है, लेकिन फैसला यदि फाइलों और फोन कॉल के बीच आखिरी मिनट तक अटका रहे तो मैदान में उतरने वाला कार्यकर्ता आखिर किस रणनीति के साथ उतरे?
डैमेज कंट्रोल या डैमेज की नई शुरुआत?
दोनों दलों की ओर से टिकट देर से देने का एक तर्क यह हो सकता है कि इससे बगावत को रोका जा सकेगा।
लेकिन राजनीतिक सवाल यह है—कहीं बगावत रोकने के लिए अपनाई गई रणनीति ही बगावत के लिए समय कम न छोड़ दे?
क्योंकि टिकट कटने वाला दावेदार केवल नाराज नहीं होता। उसके साथ उसके समर्थक, सामाजिक संपर्क, व्यक्तिगत नेटवर्क और वर्षों की राजनीतिक मेहनत भी जुड़ी होती है।
यदि उसे टिकट की जानकारी नामांकन के अंतिम घंटों में मिलती है, तो उसके पास विकल्पों पर विचार करने का समय भी कम होगा—लेकिन नाराजगी उतनी ही तेज हो सकती है।
इसलिए असली परीक्षा टिकट घोषित होने के बाद शुरू होगी।
आज खुलेंगे बंद लिफाफे के राज
आज नामांकन की अंतिम तारीख है। अब देखना यह है कि भाजपा किस चेहरे पर भरोसा करती है और कांग्रेस किस नाम पर दांव लगाती है। क्या प्रदीप सोनी या मांगीलाल सोनी में से किसी एक के हाथ भाजपा का मैंडेट आता है?क्या कांग्रेस विष्णु पाटीदार के नाम पर भरोसा करती है?
या अंतिम क्षण में कोई ऐसा नाम सामने आता है जिसकी चर्चा अभी राजनीतिक गलियारों में कम है? और उससे भी बड़ा सवाल— टिकट नहीं मिलने वाले दावेदार क्या पार्टी के साथ खड़े रहेंगे या चुनावी मैदान में अलग राह चुनेंगे?
यही तय करेगा कि अंतिम समय तक टिकट रोककर रखने की रणनीति मास्टरस्ट्रोक थी या राजनीतिक जोखिम।
सुसनेर में आज सिर्फ प्रत्याशी नहीं, संगठन की परीक्षा भी है
आज का दिन सिर्फ भाजपा-कांग्रेस के प्रत्याशियों के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। यह दिन दोनों दलों के संगठनात्मक प्रबंधन और नेतृत्व क्षमता की भी परीक्षा है।
क्योंकि प्रत्याशी घोषित करना पहला काम होगा। उसके बाद—नाराज को मनाना,
कार्यकर्ता को जोड़ना,
समर्थकों को सक्रिय करना,
सामाजिक समीकरण साधना
और चुनावी मशीनरी को गति देना—
इन सबके लिए समय चाहिए। और अब समय सबसे कम है।
सार्थक दृष्टिकोण
टिकट में गोपनीयता रणनीति हो सकती है, लेकिन निर्णय में देरी को हमेशा रणनीति नहीं कहा जा सकता।
आम मतदाता के लिए यह सवाल बिल्कुल स्वाभाविक है कि जब चुनाव आयोग ने तारीख पहले से तय कर दी, नामांकन की अंतिम तारीख तय है और दावेदार महीनों से राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं, तो संगठन के जिम्मेदार लोग सही समय पर सही निर्णय क्यों नहीं ले पाए?
यदि निर्णय क्षमता है तो निर्णय हुआ क्यों नहीं?
यदि निर्णय हो चुका है तो मैंडेट मिला क्यों नहीं?
और यदि निर्णय किसी दबाव या उच्चस्तरीय स्वीकृति के इंतजार में है, तो फिर स्थानीय संगठन की भूमिका क्या है?
सुसनेर की जनता आज सिर्फ प्रत्याशी का नाम नहीं जानना चाहती—वह यह भी देख रही है कि निर्णय लेने वाला संगठन कितना तैयार है।
क्योंकि चुनाव में कभी-कभी गलत प्रत्याशी से ज्यादा नुकसान गलत समय पर लिया गया सही निर्णय भी कर सकता है।
और आज सुसनेर में सबसे बड़ा सस्पेंस यही है—
“मैंडेट किसे मिलेगा?” से बड़ा सवाल—
“फैसला लेने में इतनी देर क्यों लगी?”
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