सुसनेर नगर सरकार का रण: वार्ड-4 की जंग अब अध्यक्ष की कुर्सी तक!
पुराने प्रतिद्वंद्वी फिर आमने-सामने? पूर्व विधायक के बेटे VS पूर्व विधायक के समधी की संभावित टक्कर ने बढ़ाया सियासी रोमांच

क्या 2022 के वार्ड पार्षद चुनाव का अधूरा हिसाब अब अध्यक्ष पद के चुनाव में होगा? प्रत्यक्ष चुनाव ने बढ़ाया रोमांच, कई पुराने प्रतिद्वंद्वी फिर आ सकते हैं आमने-सामने
“मैदान की खबर, संपादक की नजर”
✍️दीपक जैन की राजनीतिक पड़ताल के साथ राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ का संपादकीय दृष्टिकोण
नगर परिषद अध्यक्ष की रिक्त कुर्सी के लिए घोषित उपचुनाव ने सुसनेर की राजनीति में अचानक गर्माहट पैदा कर दी है। वर्ष 2022 में अप्रत्यक्ष प्रणाली से चुनी गई नगर परिषद अध्यक्ष श्रीमती लक्ष्मी राहुल सिसोदिया के इस्तीफे के बाद रिक्त हुए पद के लिए अब नए सिरे से चुनावी बिसात बिछ रही है।
इस बार सबसे बड़ा बदलाव चुनाव प्रणाली का है। अध्यक्ष का चयन सीधे जनता के मतदान से होगा। यानी अब फैसला पार्षदों के गणित से नहीं, बल्कि सुसनेर नगर की जनता के जनादेश से होगा। यही बदलाव इस चुनाव को सामान्य उपचुनाव से कहीं अधिक दिलचस्प बना रहा है।
अध्यक्ष पद पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षित है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में संभावित दावेदारों और सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों को लेकर मंथन तेज है।
लेकिन सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा एक ऐसे संभावित मुकाबले की है, जिसकी पटकथा वर्ष 2022 में लिखी जा चुकी थी।

वार्ड-4 की पुरानी जंग, अब पूरे नगर की सत्ता के लिए?
2022 के नगर परिषद चुनाव में वार्ड क्रमांक-4 में भाजपा की ओर से प्रदीप सोनी और कांग्रेस की ओर से विष्णु प्रसाद पाटीदार आमने-सामने थे।
चार वर्ष बाद परिस्थितियां बदल चुकी हैं, लेकिन राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की संभावना फिर चर्चा में है।
भाजपा से प्रदीप सोनी को प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा है। वहीं कांग्रेस की ओर से विष्णु प्रसाद पाटीदार का नाम भी राजनीतिक चर्चाओं में प्रमुखता से सामने आ रहा है।
यदि दोनों दल इन्हीं नामों पर मुहर लगाते हैं तो यह मुकाबला निश्चित रूप से सुसनेर नगर परिषद चुनाव की सबसे रोचक राजनीतिक कहानी बन सकता है।
पिछली बार मुकाबला एक वार्ड जीतने का था।
इस बार दांव पूरे नगर की सरकार की सबसे बड़ी कुर्सी का होगा।
भाजपा में प्रदीप सोनी का नाम क्यों चर्चा में?
प्रदीप सोनी पूर्व विधायक बद्रीलाल सोनी के सुपुत्र हैं। संगठनात्मक राजनीति में भी उनका अनुभव रहा है। वे पूर्व में शाजापुर युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष तथा आगर जिले में दो बार भाजपा जिला मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
वर्तमान में वे वार्ड-4 के पार्षद हैं और नगर परिषद के कार्यवाहक अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं।
ऐसे में राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक पहचान और वर्तमान नगर परिषद व्यवस्था की समझ के कारण उनका नाम भाजपा के संभावित दावेदारों में प्रमुखता से लिया जा रहा है।
हालांकि अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व को करना है और टिकट की घोषणा तक राजनीतिक समीकरणों में बदलाव की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस में विष्णु पाटीदार की चर्चा क्यों?
कांग्रेस की संभावित दावेदारी में वरिष्ठ नेता विष्णु प्रसाद पाटीदार का नाम चर्चा में है। संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभा चुके विष्णु पाटीदार की स्थानीय राजनीति में अपनी अलग पहचान है।
उनके राजनीतिक परिचय का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि वे पूर्व विधायक वल्लभ भाई अम्बावतिया के समधी हैं।
यदि भाजपा प्रदीप सोनी और कांग्रेस विष्णु पाटीदार को मैदान में उतारती है तो मुकाबले को एक दिलचस्प राजनीतिक नैरेटिव मिल सकता है—
एक तरफ पूर्व विधायक का बेटा, दूसरी तरफ पूर्व विधायक का समधी।
लेकिन चुनाव केवल रिश्तों और राजनीतिक विरासत का नहीं होगा। असली फैसला जनता की स्वीकार्यता, संगठन की ताकत और चुनावी मुद्दों पर होगा।
क्या पूरा होगा दोनों का अधूरा राजनीतिक सपना?
इस संभावित मुकाबले की सबसे दिलचस्प बात केवल पुरानी प्रतिद्वंद्विता नहीं है।
2022 में दोनों नेताओं ने वार्ड स्तर की राजनीति में अपनी ताकत आजमाई थी। लेकिन अध्यक्ष पद का चुनाव पूरे नगर की राजनीतिक स्वीकार्यता की परीक्षा होगा।
इसलिए सवाल उठ रहा है—
क्या 2022 की वार्ड-4 की लड़ाई अब एक बड़े राजनीतिक मुकाबले में बदलने जा रही है?
और यदि ऐसा होता है तो क्या किसी एक प्रत्याशी का नगर सरकार का नेतृत्व करने का अधूरा सपना पूरा होगा?
वार्ड-3 का समीकरण भी नजरअंदाज नहीं
राजनीतिक चर्चाओं में वार्ड क्रमांक-3 के पुराने चुनावी समीकरण भी सामने आ रहे हैं।
भाजपा से वरिष्ठ नेता मंगीलाल सोनी और कांग्रेस से वर्तमान पार्षद नईम अहमद मेव के नामों को भी संभावित दावेदारों के रूप में देखा जा रहा है।
दोनों की अपनी राजनीतिक सक्रियता और स्थानीय पकड़ है। ऐसे में टिकट वितरण के दौरान यदि दल सामाजिक और स्थानीय समीकरणों पर अलग रणनीति बनाते हैं तो मुकाबले की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
यानी फिलहाल चुनावी मैदान में केवल दो नामों की चर्चा करना जल्दबाजी होगी।
प्रत्यक्ष चुनाव ने बदल दिया पूरा खेल
इस उपचुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक परिवर्तन प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली है।
अब उम्मीदवार को सीधे जनता के बीच जाना होगा। हर वार्ड, हर मोहल्ले और हर सामाजिक वर्ग में अपनी स्वीकार्यता साबित करनी होगी।
यहां पार्टी संगठन महत्वपूर्ण होगा, लेकिन उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि भी उतनी ही निर्णायक बन सकती है।
चुनाव में प्रमुख मुद्दे क्या होंगे, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। लेकिन नगर विकास, सफाई व्यवस्था, पेयजल, सड़कें, यातायात और नागरिक सुविधाएं मतदाताओं की प्राथमिकताओं में रह सकती हैं।
सियासी शतरंज में कौन बनेगा निर्णायक खिलाड़ी?
फिलहाल भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
लेकिन राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है।
कुछ नाम खुलकर चर्चा में हैं, कुछ दावेदार पर्दे के पीछे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में लगे हैं और कुछ चेहरे अंतिम समय में समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं।
सुसनेर का यह उपचुनाव इसलिए भी रोचक होगा क्योंकि यहां मुकाबला केवल दो राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता का भी होगा।
2022 में वार्ड की सीमा थी, 2026 में पूरा नगर मैदान है।
अब देखना यह होगा कि पुराने प्रतिद्वंद्वी फिर आमने-सामने आते हैं या राजनीतिक दल कोई नया चेहरा सामने लाकर पूरी चुनावी पटकथा बदल देते हैं।
फिलहाल इतना तय है—सुसनेर की नगर सरकार की कुर्सी के लिए बिसात सज चुकी है, लेकिन असली चाल चलना अभी बाकी है।
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✍️ संपादक की कलम से
सुसनेर को अध्यक्ष नहीं, दिशा चुननी है
नगर सरकार की कुर्सी से बड़ा सवाल—अगले वर्षों में सुसनेर किस दिशा में जाएगा?
चुनाव आते ही राजनीति में सबसे पहले नाम उछलते हैं। कौन लड़ेगा? किसे टिकट मिलेगा? किसका पलड़ा भारी है? कौन किसका रिश्तेदार है? किसके पीछे किस बड़े नेता का हाथ है? लोकतंत्र की विडंबना यह है कि इन सवालों के शोर में अक्सर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न दब जाता है—
नगर को वास्तव में चाहिए क्या?
सुसनेर नगर परिषद अध्यक्ष का उपचुनाव भी धीरे-धीरे इसी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में पहुंच रहा है। संभावित प्रत्याशियों के नामों पर बहस शुरू हो चुकी है। राजनीतिक विरासतों की चर्चा है, पुराने चुनावी मुकाबलों की यादें ताजा की जा रही हैं और रिश्तों से लेकर संगठनात्मक ताकत तक के समीकरण गिनाए जा रहे हैं।
यह सब चुनावी राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा है।
लेकिन संपादकीय दृष्टि से इससे बड़ा प्रश्न है—
क्या सुसनेर इस चुनाव में केवल एक अध्यक्ष चुनेगा या अपने भविष्य की दिशा भी तय करेगा?
नगर परिषद का अध्यक्ष केवल एक राजनीतिक पदाधिकारी नहीं होता। वह नगर की प्राथमिकताओं का निर्धारक भी होता है।
उसकी सोच तय करती है कि नगर की सड़कें केवल चुनावी मौसम में याद की जाएंगी या योजनाबद्ध विकास का हिस्सा बनेंगी।
उसकी कार्यशैली तय करती है कि सफाई व्यवस्था केवल शिकायतों के बाद सुधरेगी या एक स्थायी व्यवस्था बनेगी।
उसकी प्राथमिकताएं तय करती हैं कि युवा, व्यापारी, महिलाएं, बुजुर्ग और आम नागरिक नगर सरकार को अपना सहयोगी मानेंगे या केवल सरकारी कार्यालय।इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि—अगला अध्यक्ष कौन होगा? बल्कि सवाल होना चाहिए—अगला अध्यक्ष कैसा होगा?
विरासत सम्मान की बात है, लेकिन योग्यता की कसौटी जरूरी
लोकतंत्र में राजनीतिक परिवार होना कोई अपराध नहीं है। कई बार राजनीतिक अनुभव और जनसेवा की परंपरा नई पीढ़ी को बेहतर नेतृत्व भी देती है।
लेकिन मतदाता को यह भी देखना होगा कि विरासत केवल परिचय है या क्षमता का प्रमाण?
किसी नेता का पुत्र होना, किसी प्रभावशाली परिवार से संबंध होना अथवा बड़े राजनीतिक नामों से जुड़ाव चुनावी पहचान दे सकता है, लेकिन नगर चलाने की योग्यता का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता।
सुसनेर की जनता को व्यक्ति का नाम नहीं, उसकी कार्ययोजना सुननी चाहिए।उससे पूछा जाना चाहिए— आपके पास अगले पांच वर्षों के लिए नगर का विजन क्या है? आप पेयजल के लिए क्या करेंगे?सफाई व्यवस्था कैसे सुधरेगी? यातायात और अतिक्रमण की चुनौती से कैसे निपटेंगे? युवाओं के लिए नगर स्तर पर क्या अवसर तैयार होंगे? व्यापारिक गतिविधियों को कैसे बढ़ावा मिलेगा? नगर के विस्तार और भविष्य की योजना क्या होगी?
जिस उम्मीदवार के पास इन सवालों के स्पष्ट जवाब होंगे, उसे केवल राजनीतिक समर्थक नहीं, जागरूक मतदाता भी मिलेंगे।
प्रत्यक्ष चुनाव: जनता को मिली ताकत, जिम्मेदारी भी बढ़ी
इस चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता प्रत्यक्ष मतदान है। अब निर्णय कुछ चुनिंदा जनप्रतिनिधियों के हाथ में नहीं, बल्कि सीधे जनता के हाथ में होगा।यह लोकतंत्र की बड़ी ताकत है। लेकिन हर अधिकार अपने साथ जिम्मेदारी भी लेकर आता है। जनता को यह तय करना होगा कि वोट— जाति के आधार पर देना है? रिश्तों के आधार पर देना है? राजनीतिक दबाव में देना है? भावनात्मक नारों के आधार पर देना है? या फिर नगर के भविष्य को देखकर देना है?लोकतंत्र की असली परीक्षा मतदान केंद्र पर होती है।और सुसनेर के मतदाता के सामने इस बार अवसर है कि वह राजनीतिक दलों को भी संदेश दे सके कि टिकट केवल जीतने की गणित देखकर नहीं, बल्कि नेतृत्व की गुणवत्ता देखकर दिए जाने चाहिए।
चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई मत बनने दीजिए
स्थानीय चुनावों की एक बड़ी समस्या यह है कि वे अक्सर विकास की बहस से निकलकर प्रतिष्ठा की लड़ाई बन जाते हैं। कौन बड़ा नेता? किसका परिवार प्रभावशाली? किसके समर्थक अधिक? किसकी राजनीतिक पकड़ मजबूत? इन प्रश्नों में नगर कहीं पीछे छूट जाता है। सुसनेर को इस बार इस प्रवृत्ति से बाहर निकलना होगा। नगर परिषद अध्यक्ष की कुर्सी किसी व्यक्ति की राजनीतिक उपलब्धि का स्मारक नहीं है। यह जनता द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी है।
कुर्सी सम्मान नहीं, जवाबदेही है। जिस दिन राजनीति इस बात को समझ लेगी, स्थानीय लोकतंत्र की गुणवत्ता बदल जाएगी।
विपक्ष भी केवल आलोचक नहीं, विकल्प बने
यह चुनाव केवल सत्ताधारी दल की परीक्षा नहीं है।विपक्ष की भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष केवल कमियां गिनाने के लिए नहीं होता, बल्कि बेहतर विकल्प प्रस्तुत करने के लिए होता है। कांग्रेस हो या भाजपा—दोनों दलों को केवल यह नहीं बताना चाहिए कि दूसरा दल क्या नहीं कर पाया।उन्हें यह भी बताना चाहिए कि— यदि जनता हमें चुनेगी तो हम क्या करेंगे?
सुसनेर की राजनीति को आरोपों की प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़कर विकास के विजन की प्रतिस्पर्धा तक पहुंचना होगा।
सुसनेर को नाम नहीं, काम का नेतृत्व चाहिए
यह चुनाव कई राजनीतिक चेहरों के लिए अवसर हो सकता है। किसी के लिए राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का अवसर । किसी के लिए वर्षों के राजनीतिक अनुभव को सत्ता में बदलने का अवसर।किसी के लिए स्थानीय नेतृत्व स्थापित करने का अवसर। लेकिन जनता के लिए यह अवसर सबसे बड़ा है। उसे तय करना है कि वह केवल एक चुनाव जीते हुए प्रत्याशी को चुन रही है या एक ऐसा नेतृत्व चुन रही है जो अगले वर्षों में नगर की तस्वीर बदलने की क्षमता रखता हो। सुसनेर की गलियों, बाजारों और चौपालों में आने वाले दिनों में बहुत से नारे सुनाई देंगे।बहुत से वादे होंगे। बहुत से राजनीतिक दावे किए जाएंगे। लेकिन मतदाता को शोर से अलग होकर एक सवाल जरूर पूछना चाहिए—क्या यह व्यक्ति केवल चुनाव जीत सकता है, या वास्तव में नगर को नेतृत्व भी दे सकता है? यही प्रश्न इस उपचुनाव का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होना चाहिए।
अंतिम बात
राजनीतिक मुकाबले रोचक होते हैं। पुराने प्रतिद्वंद्वियों का फिर आमने-सामने आना खबर बनता है। राजनीतिक परिवारों और रिश्तों के समीकरण चर्चा पैदा करते हैं। लेकिन नगरों का भविष्य चर्चाओं से नहीं, नेतृत्व से बदलता है। इसलिए सुसनेर को इस बार केवल यह तय नहीं करना है कि—“कौन अध्यक्ष बनेगा?”उसे यह तय करना है कि—
“सुसनेर को कैसा अध्यक्ष चाहिए?”
क्योंकि चुनाव पांच वर्ष की राजनीति तय कर सकता है, लेकिन सही नेतृत्व आने वाली पीढ़ियों के लिए नगर की दिशा तय करता है। सुसनेर की जनता के हाथ में इस बार केवल एक वोट नहीं, अपने नगर के भविष्य की दिशा लिखने का अवसर है।
— राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
संपादक, जनमत जागरण











