योगाचार्य हरीश कुमार श्रीवास्तव: योग, शिक्षा और संस्कार की 5 दशकों की अद्भुत प्रेरक यात्रा
शिक्षक दिवस विशेष: 1974 से योग साधना से लेकर ‘आगर रत्न’ तक—योग, खेल, शिक्षा, संस्कार और राष्ट्रसेवा से जुड़ी हरीश कुमार श्रीवास्तव की प्रेरक जीवनयात्रा।

कुछ लोग नौकरी करते हैं… कुछ लोग जीवन गढ़ते हैं
शिक्षक दिवस विशेष | जनमत जागरण
शिक्षक की मेज पर रखी किताबें शायद कुछ वर्षों बाद पुरानी हो जाती हैं, विद्यालय की घंटियां बदल जाती हैं, कक्षाएं बदल जाती हैं और विद्यार्थी भी अपनी-अपनी मंजिलों की ओर निकल जाते हैं। लेकिन एक सच्चे शिक्षक द्वारा बोए गए संस्कार, अनुशासन और आत्मविश्वास के बीज कभी पुराने नहीं होते। वे विद्यार्थी के व्यक्तित्व में जीवित रहते हैं और फिर समाज के चरित्र का हिस्सा बन जाते हैं।
इस लेख में पढ़ें
– हरीश कुमार श्रीवास्तव की प्रारंभिक जीवनयात्रा
-1974 से योग साधना
-शिक्षक के रूप में योगदान
-खेल प्रशिक्षण
-श्री ऊं योग केंद्र की स्थापना
-योग शिक्षा और पाठ्यक्रम निर्माण
-मध्य प्रदेश योग आयोग
-आगर रत्न सम्मान
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योगाचार्य हरीश कुमार श्रीवास्तव का जीवन इसी अमिट शिक्षकत्व की कहानी है।
5 सितंबर 1955 को जन्मे हरीश कुमार श्रीवास्तव के लिए 5 सितंबर केवल जन्मदिन नहीं, बल्कि शिक्षक दिवस भी है। जैसे प्रकृति ने उनके जीवन की भूमिका पहले ही लिख दी हो—जन्म और शिक्षकत्व, दोनों का दिन एक।
ग्राम गोंडल मऊ से प्रारंभ हुई उनकी जीवनयात्रा ने योग की साधना से लेकर शिक्षा, खेल, साहित्य, संस्कार और राष्ट्रसेवा तक अनेक पड़ाव तय किए। पांच दशकों से अधिक की इस यात्रा में उन्होंने एक बात को निरंतर जिया—शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्ति को सफल बनाना नहीं, बल्कि उसे श्रेष्ठ इंसान बनाना है।
1974 में शुरू हुई साधना, जो आज तक जारी है
बचपन से ही पढ़ाई, योग, अध्यात्म और साधु-संतों की सेवा के प्रति उनका आकर्षण रहा। वर्ष 1974 से उन्होंने योग को गंभीर साधना के रूप में अपने जीवन में स्वीकार किया।
उस समय योग आज की तरह बाजार, मीडिया और आधुनिक जीवनशैली का लोकप्रिय विषय नहीं था। योग के लिए साधना चाहिए थी, धैर्य चाहिए था और निरंतर अभ्यास चाहिए था।
हरीश जी ने इन तीनों को अपने जीवन का हिस्सा बनाया।
उज्जैन, शिवपुरी, बड़नगर, आगर और पुणे सहित विभिन्न स्थानों में अध्ययन करते हुए उन्होंने ज्ञान के अनेक क्षेत्रों को आत्मसात किया। एम.ए. हिंदी, राजनीति शास्त्र एवं योग, बी.एड., एलएल.बी. और डी.पी.एड. जैसी शैक्षणिक योग्यताओं के साथ गुजराती और उर्दू भाषा में डिप्लोमा तथा ज्योतिष शास्त्री का अध्ययन उनके व्यापक बौद्धिक क्षितिज को दर्शाता है।
उनके लिए सीखना कभी समाप्त नहीं हुआ।
जब शिक्षक बने तो खेल का मैदान भी बन गया पाठशाला
4 सितंबर 1983 को शासकीय बालक माध्यमिक विद्यालय, नलखेड़ा में सहायक शिक्षक के रूप में उनकी शासकीय सेवा शुरू हुई।
यहां से शुरू हुई शिक्षक की भूमिका आगे चलकर केवल कक्षा तक सीमित नहीं रही।
14 सितंबर 1994 को पदोन्नति के बाद शासकीय उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, आगर में व्यायाम निर्देशक के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों के शारीरिक और मानसिक विकास को अपनी कार्यशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।
उनके लिए खेल केवल शरीर की ताकत नहीं था।
खेल जीवन का अनुशासन था।
खेल संघर्ष का अभ्यास था।
खेल हार के बाद उठने का साहस था।
और खेल लक्ष्य तक पहुंचने की तपस्या था।
उनके प्रशिक्षण से विद्यार्थियों ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक खेलों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। योग प्रशिक्षण ने भी विद्यार्थियों को राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुंचाया।
1999 : आगर को मिला अपना योग केंद्र
योग को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की उनकी सोच ने वर्ष 1999 में एक महत्वपूर्ण रूप लिया।
आगर नगर में ‘श्री ऊं योग केंद्र’ की स्थापना हुई।
यह केवल एक योग केंद्र नहीं था, बल्कि स्वस्थ जीवन के प्रति सामाजिक जागरूकता का अभियान था। नगर के अनेक नागरिक, माताएं-बहनें और बच्चे इससे जुड़े और नियमित योगाभ्यास के माध्यम से स्वास्थ्य एवं जीवनशैली के प्रति जागरूक हुए।
हरीश जी ने योग को किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं माना।
उनका संदेश सरल था—
स्वस्थ शरीर, संतुलित मन और अनुशासित जीवन किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूंजी है।
आगर से देश के अनेक शहरों तक पहुंची योग की अलख
योगाचार्य के रूप में उनका कार्यक्षेत्र आगर तक सीमित नहीं रहा।
इंदौर, भोपाल, दिल्ली, हैदराबाद और तिरुचिरापल्ली सहित अनेक नगरों में उन्होंने संस्थाओं के माध्यम से योग शिविर आयोजित किए और प्रशिक्षण प्रदान किया।
कई वर्षों तक शासकीय जिला योग प्रभारी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने योग शिक्षा को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने में योगदान दिया।
विद्या भारती में प्रांत, क्षेत्र और अखिल भारतीय स्तर पर योग शिक्षा से जुड़े दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने देशभर के विद्यालयों में योग शिक्षा के विस्तार के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
योगासन के मैदान में निर्णायक, शिक्षा में मार्गदर्शक
योग के प्रति उनका अनुभव केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहा।
उन्होंने कई वर्षों तक शासकीय और विद्या भारती के प्रांत, राज्य और अखिल भारतीय स्तर की योगासन प्रतियोगिताओं में निर्णायक के रूप में दायित्व निभाया।
योग के अभ्यास से लेकर प्रतियोगिता के मूल्यांकन तक का उनका अनुभव उन्हें इस क्षेत्र का व्यावहारिक और अनुभवी व्यक्तित्व बनाता है।
मध्य प्रदेश शासन द्वारा योग आयोग का गठन होने के बाद उन्हें मध्य प्रदेश योग आयोग में सदस्य के रूप में भी दायित्व मिला।
यह उनके दशकों लंबे योग-सफर की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
जब योग किताब में आया, तब पीछे था अनुभव
योग को विद्यालयी शिक्षा का हिस्सा बनाने की दिशा में भी उनका योगदान रहा।
वर्ष 2008 में मध्य प्रदेश शासन द्वारा संचालित कक्षा 6 और 7 की सहायक वाचन पुस्तकों में योग शिक्षा को सम्मिलित करने के लिए पाठ्यक्रम निर्माण में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह किसी भी योग साधक के लिए विशेष उपलब्धि है—जब उसका व्यक्तिगत अभ्यास आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा का हिस्सा बनने लगे।
एक योगासन से शुरू हुई साधना जब पाठ्यक्रम तक पहुंचती है, तो उसका प्रभाव व्यक्ति से निकलकर पीढ़ी तक पहुंच जाता है।
सम्मान मिले, लेकिन कर्म की गति नहीं रुकी
योग और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को अनेक अवसरों पर सम्मान मिला।
26 जनवरी 2015 को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा उन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।
इसके बाद योग शिक्षा को जनसाधारण तक पहुंचाने में तीन दशकों से अधिक समय तक विशिष्ट भूमिका निभाने के लिए 9 नवंबर 2025 को उन्हें ‘आगर रत्न’ सम्मान से अलंकृत किया गया।
सम्मान किसी यात्रा का अंतिम पड़ाव नहीं होता।
सच्चे कर्मयोगी के लिए सम्मान एक पड़ाव है—मंजिल नहीं।
शब्दों में भी सांस लेता है उनका चिंतन
हरीश कुमार श्रीवास्तव का व्यक्तित्व केवल योग और शिक्षा तक सीमित नहीं रहा। साहित्य में भी उनकी सक्रिय रुचि रही है।
‘देवपुत्र’ पत्रिका में उनके लेख प्रकाशित होते रहे हैं।
शिक्षा, संस्कृति, समाज और जीवन-मूल्यों से जुड़े विषयों पर लेखन उनके भीतर के चिंतक को सामने लाता है।
शायद यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व में योग की शांति और साहित्य की संवेदनशीलता एक साथ दिखाई देती है।
संस्कार : उनके शिक्षकत्व की सबसे मजबूत नींव
सरस्वती शिशु मंदिर से उनका जुड़ाव उनके संस्कार पक्ष को रेखांकित करता है।
भारतीय संस्कृति, अनुशासन, चरित्र निर्माण और राष्ट्रभाव से जुड़े शैक्षिक वातावरण ने उनके जीवन-दर्शन को भी प्रभावित किया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक के रूप में भी सेवा, संगठन, अनुशासन और राष्ट्रभाव उनके जीवन के महत्वपूर्ण मूल्य रहे।
यही कारण है कि उनका शिक्षकत्व केवल विषय पढ़ाने तक सीमित नहीं रहा।
वे विद्यार्थी में व्यक्ति देखते थे और व्यक्ति में भविष्य।
हरीश जी को पांच शब्दों में समझना हो तो…
योग — स्वास्थ्य का मार्ग ,खेल — अनुशासन का विद्यालय ,शिक्षा — ज्ञान का आधार ,संस्कार — चरित्र की शक्ति , राष्ट्रभाव — सेवा का संकल्प
इन पांचों का समन्वय ही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान है।
आज के शिक्षक दिवस पर सबसे बड़ा सवाल
आज शिक्षा तेजी से बदल रही है। डिजिटल कक्षाएं हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, प्रतिस्पर्धा है, नई तकनीक है। लेकिन इस बदलते दौर में भी एक प्रश्न वही है—
क्या हम केवल पढ़े-लिखे युवा तैयार कर रहे हैं, या संस्कारवान नागरिक भी?
हरीश कुमार श्रीवास्तव का जीवन इस प्रश्न का उत्तर देता दिखाई देता है। उन्होंने शिक्षा को शरीर से जोड़ा तो योग मिला। मन से जोड़ा तो संतुलन मिला। खेल से जोड़ा तो अनुशासन मिला। साहित्य से जोड़ा तो संवेदनशीलता मिली। संस्कारों से जोड़ा तो चरित्र मिला। और राष्ट्रभाव से जोड़ा तो सेवा का संकल्प मिला।
एक जीवन… जो स्वयं एक पाठशाला बन गया
गोंडल मऊ में जन्मा एक बालक।
1974 में योग की ओर बढ़ता एक साधक।
1983 में शिक्षक बनता एक युवा।
खेल मैदान में प्रतिभाओं को तराशता एक प्रशिक्षक।
1999 में आगर में योग की अलख जगाता एक कर्मयोगी।
देश के अनेक शहरों में योग शिविर लगाता एक योगाचार्य।
विद्यालयों में योग शिक्षा पहुंचाने वाला एक शिक्षक।
योगासन प्रतियोगिताओं में निर्णायक की भूमिका निभाता एक विशेषज्ञ।
योग शिक्षा के पाठ्यक्रम निर्माण में योगदान देने वाला एक शिक्षाविद।
मुख्यमंत्री से सम्मानित एक कर्मठ शिक्षक। और अंततः ‘आगर रत्न’ से सम्मानित एक प्रेरक व्यक्तित्व। यह केवल उपलब्धियों की सूची नहीं है।
यह उस पीढ़ी की कहानी है जिसने पद से अधिक दायित्व को महत्व दिया और प्रसिद्धि से अधिक कर्म को।
शिक्षक दिवस पर जनमत जागरण का प्रणाम
आज जब हम शिक्षक दिवस मनाते हैं, तब हरीश कुमार श्रीवास्तव जैसे व्यक्तित्व हमें याद दिलाते हैं कि शिक्षक होना केवल पेशा नहीं—पीढ़ियों के भविष्य की जिम्मेदारी है।
कक्षा में दिया गया एक सही संस्कार किसी विद्यार्थी का जीवन बदल सकता है।
मैदान में दिया गया एक प्रोत्साहन किसी खिलाड़ी को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचा सकता है।
योग का सिखाया गया एक आसन किसी व्यक्ति को स्वास्थ्य की ओर मोड़ सकता है।
और राष्ट्र के प्रति जगाई गई एक भावना किसी युवा को जीवनभर समाजसेवा के मार्ग पर चला सकती है।
यही एक शिक्षक की असली विजय है।
क्योंकि पुरस्कार दीवार पर टंग जाते हैं, पद समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन एक शिक्षक द्वारा गढ़ा गया चरित्र पीढ़ियों तक चलता है।
योगाचार्य हरीश कुमार श्रीवास्तव का जीवन इसी अमर शिक्षक परंपरा को नमन करता है।
“कुछ शिक्षक पाठ पढ़ाते हैं,
कुछ जीवन जीना सिखाते हैं,
और कुछ ऐसे होते हैं—
जिनका पूरा जीवन ही आने वाली पीढ़ियों के लिए एक पाठ बन जाता है।”**
शिक्षक दिवस पर योगाचार्य हरीश कुमार श्रीवास्तव को सादर नमन।
जनमत जागरण | विशेष प्रस्तुति
लेखक : राजेश कुमरावत ‘सार्थक’












