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स्पेशल रिपोर्ट : विकास कार्यों पर गुटबाजी का “सार्थक” प्रभाव , तो जनता को भी अभाव में जीने की महारथ हुई हासिल

गुटबाजी की बलि चढ़ता नगर विकास◾पार्षदो की गुटबाजी में पानी-पानी हुए नगर विकास की बाट जोह रही जनता के अरमान◾ भाजपा पार्षदो की गुटो में अदला-बदली कर रही पार्टी की छवि धूमिल, जनता भी परेशान

जनमत जागरण @ स्पेशल रिपोर्ट :: हमारे प्यारे शहर में विकास की संभावनाएं इतनी प्रबल हैं कि नई-नई योजनाओं की घोषणाएं तो होती हैं। लेकिन जैसे ही कोई योजना या प्रोजेक्ट सामने आता है, नेताजी और उनके सहयोगियों का एक विशेष "समर्पण" दिखता है – वह है गुटबाजी का समर्पण ..! जी हाँ, नगर विकास को इन नेताओं की ऐसी शुभकामनाएँ मिलती हैं कि वो घर से बाहर कदम रखने की बजाय घर के ही आँगन में ठहर जाता है। आखिर, जब हर नेता को अपनी-अपनी बात मनवानी है, तो भला विकास कैसे हो ..! आखिरकार, जनता का क्या है, जनता को अभाव में जीने की महारथ हासिल हो ही गई है। इसे कहते है विकास कार्यों पर गुटबाजी का "सार्थक" प्रभाव - इसी पर आधारित सुसनेर से हमारे संवाददाता दीपक जैन की स्पेशल रिपोर्ट

मालवा में एक कहावत है कि अगर बागर ही खेत को खाने में लग जाए तो खेत का विनाश होना निश्चित अहै। कुछ इस तरह के ही हालात सुसनेर नगर परिषद के है। नगर के मतदाताओं ने बड़ी उम्मीद व अपेक्षा से अपने जनप्रतिनिधियो को चुनकर नगर परिषद में भेजा था। जनता जानती थी कि केंद्र से लेकर राज्य व क्षेत्र में भाजपा की सत्ता है। नगर परिषद भी अगर भाजपा की बनी तो दिन दुगना रात चौगुना नगर का चहुमुखी विकास होगा। लेकिन पूर्ण बहुमत के साथ इस बार बनी भाजपा की नगर परिषद ने जनता के अरमानों पर पूरी तरह पानी फेर दिया है। नगर विकास की बात तो दूर सभी जनप्रतिनिधि अपने विकास में लगे हुए है। वर्तमान नगर परिषद गठन के बाद से नगर में किसी बड़े विकास कार्य का शिलान्यास नही हुआ है। कोई बडी सौगात तो नगर को मिली नही लेकिन घोटालों का ताज पहनी नगर सरकार जरूर मिल गई है। जब से वर्तमान परिषद का गठन हुआ है गुटो में बटी भाजपा में गुट बदली की राजनीति जरूर चल रही है। सुबह जो पार्षद एक गुट में होता है थोड़े से प्रलोभन में शाम को दूसरे गुट में मिल जाता है। और दिन होते-होते वापस अपने गुट में नजर आने लगता है। एक को मनाओ तो दूजा रूठ जाता है और दूजे को मनाओ तो पहला वापस रूठ जाता है। इस गुटबाजी में विपक्ष की भूमिका में बैठी कांग्रेस की भरपूर मौज हो रही है। क्योंकि विपक्ष की भूमिका भी भाजपा का दूसरा गुट पुरी कर देता है। और इस गुटबाजी में कांग्रेस को दोनों गुटों से भरपूर फायदा भी मिल जाता है। भाजपा के दोनों गुट एक दूसरे गुट का भांडा फोड़ने व शिकायत करने में लगे हुए है। जिसके चलते परिषद में नोकरशाही पूरी तरह से हावी है। इस पूरे खेल में कुछ भी हो नुकसान सुसनेर की भोली भाली जनता का ही हो रहा है। नगर का विकास पूरी तरह ठप्प है। वही भाजपा पार्षदों की यह गुटबाजी की लड़ाई पार्टी की छवि को भी धूमिल कर रही है। 

ये सारा खेल कुर्सी और मलाई का है- कहते हैं कुर्सी नसीब वाले को मिलती है। जिसके नसीब में जोर है कुर्सी पर भी उसका ही जोर चलता है। सुसनेर नगर परिषद में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। नगर परिषद में इस बार अध्यक्ष की कुर्सी पिछड़ा वर्ग के हिस्से में आई है। नगर के 15 पार्षदों में से 11 पार्षदों का पूर्ण बहुमत भाजपा के पास है। इन 11 पार्षदो में से चार पार्षद पिछड़ा वर्ग के है। इनमें से एक भाजपा के बागी निर्दलीय पार्षद है जो अब भाजपा के साथ है। वर्तमान में अध्यक्ष का पद लक्ष्मी राहुल सिसोदिया के पास है जो हाल ही में गुट बदलने को लेकर चर्चाओं में है। ये जनाब अभी उस गुट में शरणं गच्छामि हुए जिसने कांग्रेस पार्षदो की बैसाखी पर इनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने का भरचक प्रयास किया था। वह तो गनीमत रही की प्रदेश सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव के लिए कार्यकाल की समयावधि बढ़ाकर 3 साल कर दी है। अब यह गुट इनको बड़े राजनेताओं से मुलाकात कर इम्प्रेस करने में लगा है। खेर जो भी है लेकिन सारा खेल कुर्सी का ही है। और इस कुर्सी की आड़ में मलाई भी खूब लग रही है और सभी मे आपस मे बट भी खूब रही है। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण ई रिक्शा घोटाला है। जो लोकायुक्त में विचाराधीन है। ऐसे में अब नगर परिषद भले नगर का विकास करे या नही लेकिन गुटो की अदला बदली नगरवासियों का मनोरंजन जरूर कर रही है।  

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