संतों के सानिध्य में गो अभयारण्य ब्रज मंडल जैसा तीर्थ बन गया है – गोवत्स पू. राधाकृष्ण जी महाराज

जनमत जागरण @ सुसनेर। आप गोमाता के बारे में क्या सोचते है यह हम नहीं जानते। दूध, गौमूत्र, गोबर यह सब ठीक है लेकिन हम यह कहते है कि गौमाता के नाम जप में इतनी शक्ति है कि लंगड़ा भी पहाड़ चढ़ सकता है, अंधा भी गरुड़ दृष्टि पा सकता है, गूंगा भी पंचम स्वर में कुहू कुहू गा सकता है यदि वह गोमाता की शरणागति ले ले तो। गोमाता साक्षात चलता फिरता तीर्थ भी है, गोमाता साक्षात चलता फिरता देव भी है और गोमाता चलता फिरता एक सिद्ध तत्व है जो उनके संपर्क में आ गया, उनकी शरणागति में आ गया उसके वारे न्यारे हो जाते है।आज आंवला नवमी है इसका बड़ा महत्व है। आंवले के वृक्ष में लक्ष्मी माता रहती है। आंवला नवमी के दिन ही युग परिवर्तन की तिथि है। आज के दिन आंवले के नीचे बैठ कर शालिग्राम जी की पूजा करने से, गोमाता के निमित्त दान करने से, गो ग्रास कराने से, गौसेवा करने से, ब्राह्मण देवता को भोजन कराने व दक्षिणा देने से, संतो का पूजन करने से, गोमाता के निमित्त विशेष संकल्प लेने से श्री कृष्ण हमारे घट में विराजमान हो जाते है। आंवले का वृक्ष भगवान विष्णु का प्रतीक है। आंवले का वृक्ष वैज्ञानिक ओर धार्मिक दोनों दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। आज के दिन आंवले के वृक्ष की परिक्रमा करने से अवधपुरी और ब्रजमंडल की परिक्रमा के समान फल देने वाली होती है। आने वाले समय में इस कामधेनु गो अभयारण्य में 1008 आंवले के वृक्ष का उपवन बनाने का भाव है उक्त बातें एक वर्षीय वेदलक्षणा गो आराधना महामहोत्सव के 216 वे दिवस पर स्वामी गोपालानंद जी सरस्वती ने कही ।

⏩ गोनवरात्रि के नवम दिवस अक्षय नवमी के पुनित पर्व श्रीगोधाम महातीर्थ पथमेडा के गोरवाध्यक्ष गोवत्स पूज्य राधाकृष्ण जी महाराज ने बताया कि मध्यप्रदेश के मालवा में स्थापित विश्व के इस गो अभयारण्य का दर्शन करने का मुझे सौभाग्य मिला और जिस प्रकार काशी अविमुक्त तीर्थ है। अर्थात् काशी धरती का अंग नहीं है और जब जब भी धरती पर प्रलय आया है तब तब भगवान शंकर ने काशी को अपने त्रिशूल की नोक पर उठाकर बचाया है उसी प्रकार भगवान कृष्ण ने भी भगवती गोमाता की भूमि को संरक्षित करने के लिए स्वयं ठाकुर जी ने अपनी बांसुरी के छिद्र में समाया है और जब गोमाता को आवश्यकता पड़ती है उस समय उस भूमि को गोमाता के लिए सुरक्षित रख लेते है ठाकुर जी की बांसुरी के छिद्र से ही अभयारण्य की इस भूमि का उद्गम हुआ है और पूज्य पथमेड़ा महाराज एवं अन्य संतो के माध्यम से यह गो अभयारण्य एक तीर्थ बन गया है और पूज्य महाराज जी ने अभयारण्य से जुड़े क्षेत्र के लोगो से आह्वान किया कि आप लोग भी इस तीर्थ की नींव के रूप में जाने जाओगे इसलिए अपने समर्पण भाव से इस गो अभयारण्य में सेवा रूपी अपनी आहुति देते रहिए ।

⏩ 216 दिवस पर राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ मध्यप्रदेश क्षेत्र के सेवा प्रमुख ओम प्रकाश सिसोदिया एवं डॉक्टर गुलाब सिंह डावर संयुक्त संचालक पशुपालन एवं डेयरी विभाग उज्जैन इन्दौर, डॉक्टर योगेश कुंभकार पशु चिकित्सा विस्तार अधिकारी सुसनेर एवं गो अभयारण्य में मातृत्त्वभाव से गो चिकित्सा कर रहें डॉक्टर जगदीश प्रसाद तिवारी आदि अतिथि उपस्थित रहें । विगत 02 नवम्बर से चल रहें गो पुष्टि यज्ञ की पूर्णाहुति संतो के सानिध्य में यज्ञाचार्य पंडित राहुल जी ने मंत्रोचार के प्रधान यजमान मनमोहन मिश्रा ने अपनी धर्मपत्नी रमादेवी के साथ यज्ञ की पूर्णाहुति दी ।

⏩ 216 वे दिवस पर चुनरीयात्रा राजस्थान के मेवाड़ एवं मध्यप्रदेश से :: एक वर्षीय गोकृपा कथा के 216 वें दिवस पर चुनरी यात्रा राजस्थान के मेवाड़ भूमी से नन्दलाल राठौर गंगापुर, रूप सिंह राव आमेट, राधेश्याम साहू गोमाणा, गोपाल साहू आकोला, बंशीलाल तेली कानोड़ एवं मध्यप्रदेश के आगर मालवा जिले के आगर नगर की माहेश्वरी महिला मंडल व बडौद तहसील के जमुनिया से डॉक्टर विक्रम सिंह परिहार के परिवार की और से सेंकड़ों मातृ शक्ति, युवा एवं पंच पटेलो ने सम्पूर्ण विश्व के जन कल्याण के लिए गाजे बाजे के साथ भगवती गोमाता के लिए चुनरी लेकर पधारे और कथा मंच पर विराजित भगवती गोमाता को चुनरी ओढ़ाई एवं गोमाता का पूजन कर स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज से आशीर्वाद लिया और अंत में सभी ने गो पूजन करके यज्ञशाला की परिक्रमा एवं गोष्ठ में गोसेवा करके सभी ने गोव्रती महाप्रसाद ग्रहण किया।



