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“सुसनेर में संत जीवन का महायोग: पूर्वाचार्य दर्शन सागर जी ने सल्लेखना से प्राप्त की मोक्ष साधना”

जनमत जागरण @ सुसनेर से दीपक जैन की रिपोर्ट – जैन धर्म के महान संत, ऋषि रत्न और धर्म केसरी उपाधियों से विभूषित पूर्वाचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज ने त्रिमूर्ति मंदिर में अपनी संत साधना का अंतिम पड़ाव रविवार को पूर्ण कर सल्लेखना पूर्वक समता मरण प्राप्त किया। संलेखना की यह महान साधना रविवार शाम 5:05 बजे पूर्ण हुई, जब महाराज श्री ने पंडित नितिन झांझरी, शांति लाल जैन, अर्पित जैन और मुकेश शास्त्री की उपस्थिति में देह त्याग कर समाधि मरण धारण किया। पूर्वाचार्य के समाधि मरण की खबर से जैन समाज ही नहीं, बल्कि पूरे नगर में शोक की लहर छा गई। समाजजन अपने प्रतिष्ठान बंद कर समाधिस्थ संत के अंतिम दर्शन के लिए त्रिमूर्ति मंदिर पहुंचे। सोमवार सुबह 9 बजे उनकी डोल यात्रा नगर भ्रमण कर त्रिमूर्ति मंदिर प्रांगण में पहुंचेगी, जहां उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार होगा।जैन संत के समाधि की सूचना सुनकर जैन समाज सहित पूरे नगर में शौक की लहर छा गई। सभी समाजजनो ने अपने प्रतिष्ठान बन्दकर त्रिमूर्ति मंदिर में समाधिस्थ संत दर्शन के लिए एकत्रित हो गए। हालांकि की पूर्वाचार्य शारिरिक अक्षमता व असमायिक रोग के चलते गुरु आज्ञा व समाज के निवेदन पर कुछ वर्षों से संत जीवन से विरक्त होकर श्रेष्ठ श्रावक की चर्या का पालन कर रहे थे। जिन्होंने रविवार को उत्कृष्ट परिणामो के साथ संलेखना पूर्वक समाधि मरण प्राप्त किया है। 

संत जीवन की अनुपम साधना: समाज के महावीर जैन शास्त्री के अनुसार राजधानी दिल्ली के अग्रवाल परिवार में जन्में 81 वर्षीय जैन संत पूर्वाचार्य श्री दर्शन सागरजी महाराज ने सन 1973 में मुनि दीक्षा धारण कर 47 वर्ष के संत साधना काल मे 2 लाख से अधिक किलोमीटर की पदयात्रा गाँव-गाँव व शहर-शहर में जैन धर्म के संस्कारों का बीजारोपण किया है। सकल दिगम्बर जैन समाज पर विशेष आशीर्वाद प्रदान करते हुए संत जीवन के 25 चातुर्मास किये है। पूर्वाचार्य ने अपने संत जीवन में लगभग 189 पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के माध्यम जिनबिंब प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा करवाई है।

9 अप्रैल 1972 को दिल्ली के समीप अतिशय क्षेत्र तिजारा में दर्शन सागरजी दीक्षा लेकर क्षुल्लक बने, उसके बाद 13 मार्च 1973 में राजस्थान के बूंदी में आचार्य श्री निर्मल सागरजी महाराज से मुनि दीक्षा धारण की। 13 अप्रैल 1973 को संगोद राजस्थान में गणधर पद मिला। 11 फरवरी 1983 में उत्तरप्रदेश के आगरा में आचार्य श्री सुमतसागरजी महाराज ने पूर्वाचार्य दर्शन सागर जी को आचार्य पद की पदवी प्रदान की। सन 1973 में मुनि अवस्था मे सुसनेर पहुचे पूर्वाचार्य दर्शन सागर जी ने लंबे अरसे तक अपनी संत साधना सुसनेर में ही की है। सन् 1974 में पूर्वाचार्य दर्शन सागरजी ने पहला चातुर्मास सुसनेर में किया। इसके अतिरिक्त कुछ चातुर्मास दिल्ली, इंदौर, कोटा, बुंदी, निवई, अजमेर, उज्जैन सहित अन्य शहरों में भी किए। 

साधना का मार्ग और संलेखना की प्राप्ति: पूर्वाचार्य श्री दर्शन सागर जी ने अपने 47 वर्षो के संत जीवन में अभी तक कुल 39 दीक्षाएं दी है, जिसमें से 16 मुनि और 20 छुल्लक शामिल है। इसके अतिरिक्त एक आर्यिका माताजी और दो छुल्लिका माताजी शामिल है। इसके अतिरिक्त अपने शिष्य का संलेखना विधि द्वारा समता पूर्वक समाधि मरण भी कराया है विगत कुछ वर्षों से शारीरिक असमर्थता और रोगों के चलते उन्होंने गुरु आज्ञा से संत जीवन का परित्याग कर श्रेष्ठ श्रावक की चर्या अपनाई। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे पुनः मुनि स्वरूप में आए और त्रिमूर्ति मंदिर में संलेखना साधना प्रारंभ की। उनका समाधि मरण जैन धर्म की अंतिम और महान साधना का जीवंत उदाहरण है।

धर्म और शिक्षा की अमिट धरोहर: ऋषि रत्न, धर्म केसरी, चारित्र चूड़ामणि, वात्सल्य मूर्ति, विधान सम्राट, सन्मार्ग दिवाकर, आगम रक्षक, उपसर्ग विजेता व अचल तीर्थ प्रणेता की उपाधि से विभूषित पूर्वाचार्य ने सुसनेर में भव्य तीर्थ त्रिमूर्ति मन्दिर गुरुकुल एवं छात्रावास ट्रस्ट का निर्माण कर जैन समाज को एक विशेष धरोहर प्रदान की है। जैन समाज के द्वारा आचार्य श्री दर्शन सागर महाराज की प्रेरणा से एक हायर सेकेंडरी स्कूल का संचालन भी किया जाता है। 

जैन धर्म में संलेखना की महिमा: जैन धर्म में संलेखना को मृत्यु को स्वीकार करने की सर्वोच्च साधना माना गया है। इसे जीवन के अंतिम क्षणों में समता भाव से आत्मा की शुद्धि का साधन माना जाता है। अशोक जैन मामा के अनुसार, यह साधना आत्मा को अंतिम शांति और मोक्ष का मार्ग प्रदान करती है।

जैन धर्म में जीवन की अंतिम साधना है संलेखना अथवा संथारा :: समाज के अशोक जैन मामा के अनुसार जैन धर्म में संलेखना मृत्यु को स्वीकार करने की एक प्रथा है। इस प्रथा में, व्यक्ति जब मरणासन्न होता है या उसे लगता है कि उसकी मृत्यु करीब है, तो वह अन्न-जल का पूरी तरह से त्याग कर देता है। सल्लेखना को साधु मरण भी कहा जाता है। इसे जीवन की अंतिम साधना माना जाता है। दिगंबर जैन शास्त्रों में इसे समाधि या सल्लेखना कहा जाता है, वहीं श्वेतांबर साधना पद्धति में इसे संथारा कहा जाता है। 

संत दर्शन सागर जी का संदेश: उनका जीवन समर्पण, त्याग और धर्म प्रचार का अनुपम उदाहरण है। उनके समाधि मरण ने न केवल जैन समाज, बल्कि सभी धर्म प्रेमियों को प्रेरित किया है। उनके जाने से जो शून्य उत्पन्न हुआ है, वह केवल उनकी शिक्षाओं और उपदेशों के अनुसरण से ही भरा जा सकता है।जैन समाज और सुसनेर के लिए यह क्षण शोक का ही नहीं, संत साधना और त्याग की महान प्रेरणा का भी है।

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