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प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल : “पकड़ा गया लकड़ी से भरा ट्रैक्टर तहसील कार्यालय परिसर से गायब! क्या यह मात्र संयोग या जादू है या कोई सोची-समझी चाल?”

👉 “प्रशासन की चुप्पी—डर, दबाव या साजिश?” “पत्रकारों के सवालों से क्यों घबराए अधिकारी?”

📢 लकड़ी माफिया बनाम प्रशासन: पकड़ो और छोड़ो का खेल!

जनमत जागरण INVESTIGATIVE REPORT @ सोयतकलां । नगर में बुधवार को नायब तहसीलदार और लकड़ी माफिया के बीच लुका-छिपी का दिलचस्प खेल चला। मामला कुछ यूं है कि बुधवार को एक लकड़ी से भरा ट्रैक्टर प्रशासन के हत्थे चढ़ा, बाकायदा टप्पा कार्यालय में प्रकरण दर्ज करने की तैयारी भी हुई। लेकिन बस एक घंटे में ही कहानी ने ऐसा मोड़ लिया कि ट्रैक्टर नदारद हो गया!

📌 पहला मोड़ – पकड़ने की घोषणा, लेकिन ट्रैक्टर गायब!

पत्रकार ने नायब तहसीलदार महोदय से पूछा—“सर, जो ट्रैक्टर पकड़ा है, वह कहां है?”
👉 जवाब मिला—“बाहर खड़ा है।”
📍 पत्रकार बाहर गए, लेकिन वहाँ ट्रैक्टर नहीं था! जब नायब तहसीलदार महोदय ने खुद बाहर आकर देखा, तो उनके भी होश उड़ गए और आनन-फानन में सरकारी गाड़ी स्टार्ट कर ट्रैक्टर की तलाश में निकल पड़े।

📌 दूसरा मोड़ – पहले पकड़ा, फिर छोड़ा, फिर मुकर गए!

दूसरे पत्रकार ने जब नायब तहसीलदार से पूछा कि “सर, लकड़ी के ट्रैक्टर का क्या हुआ?”
👉 तो जवाब आया—“हमने कोई ट्रैक्टर नहीं पकड़ा!”
📍 पत्रकार ने जब सबूतों की बात की, तो जवाब आया—“जो ट्रैक्टर पकड़ा था, उसमें सूखी बाबुल की लकड़ी थी, उसे छोड़ दिया गया। ट्रैक्टर पकड़ना हमारा काम नहीं, यह वन विभाग का मामला है।”

📌 तीसरा मोड़ – पत्रकारों को ‘हिंदी में समझाने’ की धमकी !

जिस पत्रकार ने सवाल किए, उनके पास अचानक लकड़ी का धंधा करने वाले लोगों का पक्ष लेने वालो के फोन आने लगे।
📍 पहले समझाने की कोशिश की गई, फिर जो समझाने आया था उसके पास कुछ दूरी पर खड़े अज्ञात लोगों ने आपस में कहा —“अगर समझ में नहीं आ रहा, तो हम हिंदी में समझा दें?” यह बात उस पत्रकार ने सुन ली ।
👉 सवाल यह उठता है कि यह सब घटना किस ओर इशारा करती है?

📌 चोरी और ऊपर से सीना जोरी!

👉 ट्रैक्टर पकड़ा, फिर छोड़ा, फिर पकड़े जाने से इनकार—क्या यह प्रशासन की नाकामी नहीं?
👉 पत्रकारों के सवालों से बचने के लिए बयान बदलना—क्या प्रशासन की भूमिका संदिग्ध नहीं?
👉 अवैधानिक तरीके से लकड़ी का धंधा करने वाले बेखौफ होकर पत्रकारों को धमकाना—क्या यह दिखाता नहीं कि अवैधानिक तरीके से लकड़ी काटने और परिवहन करने वालों और प्रशासन के बीच कोई संभावित “अघोषित समझौता” है?

📢 प्रशासन का खेल ?

नगर में यह पूरा प्रकरण “पकड़ो और छोड़ो” जैसी रणनीति का खुला उदाहरण है। प्रशासन ट्रैक्टर पकड़कर सुर्खियाँ बटोरता है, फिर दबाव में आकर छोड़ देता है और बाद में पकड़ने से ही इनकार कर देता है! उधर, जो सच उजागर करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें खुलेआम धमकाया जा रहा है।

👉 “यह जिम्मेदारी का मामला है या जिम्मेदारी से भागने का?”

एक ओर वन विभाग के बीट प्रभारी के.एल. परमार कहते हैं—”राजस्व विभाग को भी ट्रैक्टर पकड़ने का अधिकार है।”तो दूसरी ओर नायब तहसीलदार राजेश श्रीमाल साहब कहते हैं—”यह काम हमारा नहीं, वन विभाग का है।”

अब सवाल यह है कि जब दोनों विभागों के पास अधिकार हैं, तो फिर अवैधानिक काम के खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा? या फिर यह मामला “तुम पकड़ो, नहीं तुम पकड़ो” के खेल में ही उलझा रहेगा, और इसी बहाने लकड़ी माफिया बेखौफ अपना धंधा चलाते रहेंगे?

👉 “इस मामले में नायब तहसीलदार से दोबारा प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया जा रहा है।” लेकिन उन्होंने कहा कि अभी मैं मीटिंग हुई बाद में बात करते हैं ।

🌿 सवाल यह है कि क्या प्रशासन सच मेंअवैधानिक काम करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करेगा, या यह सिर्फ एक और नाटक बनकर रह जाएगा

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