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“घोटाले पर घोटाला! आगर जिले में भ्रष्टाचार की नई परतें – सरकारी ज़मीन पर करोड़ों का खेल, जिम्मेदार कौन?” ➡️ “जनमत जागरण इन्वेस्टिगेशन टीम की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में समझिए पूरा मामला!”

घोटाले पर घोटाला! आगर जिले में भ्रष्टाचार की नई परतें खुलीं

आगर जिले में भ्रष्टाचार की एक और परत उजागर हुई है! अभी कुंडालिया डैम घोटाले की गूंज थमी भी नहीं थी कि अब सुसनेर तहसील में करोड़ों के ज़मीन घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में बड़े अधिकारियों, राजस्व विभाग और बैंक प्रबंधन की मिलीभगत सामने आ रही है। सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर कर चरनोई भूमि को निजी संपत्ति में बदला गया और फिर इस पर वेयरहाउस निर्माण कर करोड़ों का लोन उठा लिया गया।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक ज़मीन घोटाला है या इसके पीछे एक संगठित भ्रष्टाचार तंत्र काम कर रहा है? प्रशासनिक स्तर पर हो रही देरी ने इस पूरे मामले को और भी संदेहास्पद बना दिया है। आखिर कब तक सरकारी संपत्तियों को लूट का अड्डा बनाया जाएगा? कौन-कौन इस खेल में शामिल हैं और कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? समझिए , जनमत जागरण इन्वेस्टिगेशन टीम की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट से

“सरकारी ज़मीन पर गोरखधंधा: करोड़ों का खेल, जिम्मेदार कौन?”

EXCLUSIVE INVESTIGATION REPORT

जनमत जागरण @ आगर-मालवा | क्या सरकारी ज़मीनें अब रसूखदारों के निजी खजाने में बदल रही हैं? क्या प्रशासन की आँखों के सामने यह खेल चल रहा है, या फिर सबकुछ पहले से तयशुदा स्क्रिप्ट के मुताबिक हो रहा है? एक विस्तृत पड़ताल में यह चौंकाने वाला घोटाला सामने आया है, जिसमें सरकारी ज़मीन को फर्जी दस्तावेजों के जरिए निजी स्वामित्व में बदलकर करोड़ों रुपए का कर्ज लिया गया और वेयरहाउस का निर्माण कर दिया गया।

घोटाले की शुरुआत: एक सरकारी ज़मीन की कहानी

सूत्रों के अनुसार, यह मामला ग्राम आमला नानकार, तहसील सुसनेर, जिला आगर-मालवा का है। वर्ष 1997 में बंदोबस्त के दौरान सर्वे नंबर 123/8 (नया सर्वे नंबर 246) शासकीय चरनोई भूमि के रूप में दर्ज थी। लेकिन बाद में इस ज़मीन पर रहस्यमयी तरीके से कब्जा हो गया और 1980-81 में इसे अब्दुल हलीम पुत्र अब्दुल हमीद के नाम दर्ज कर दिया गया।

जांच में यह भी सामने आया कि यह ज़मीन ग्राम कांकड़ भूमि (गाँव की सीमा से जुड़ी भूमि) थी, जिसे किसी भी अधिकारी को निजी स्वामित्व में दर्ज करने का कोई अधिकार नहीं था। इसके बावजूद यह हेरफेर किया गया और धीरे-धीरे ज़मीन को व्यापारिक उपयोग के लिए तैयार कर दिया गया।

प्रशासन को चेतावनी: कार्रवाई नहीं हुई तो होगा मुकदमा!

एडवोकेट भागीरथ देवड़ा द्वारा प्रशासन को CPC 1908 की धारा 80 के तहत 13 मार्च 2025 को जारी किया गया नोटिस

अब इस मामले में एडवोकेट भागीरथ देवड़ा ने प्रशासन को CPC 1908 की धारा 80 के तहत नोटिस जारी किया है। इसमें स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि प्रशासन ने अवैध निर्माण को नहीं हटाया और अनाज भंडारण को नहीं रोका, तो इस मामले में सक्षम न्यायालय में मुकदमा दायर किया जाएगा।

फर्जीवाड़े की परतें: किन-किन नामों से जुड़ा मामला?

इस मामले में एडवोकेट भागीरथ देवड़ा ने जनमत जागरण को बताया कि 2007 से 2010 के बीच, ज़मीन के दस्तावेजों में बार-बार बदलाव हुए।

  • पहले यह ज़मीन अब्दुल हलीम के नाम रही,
  • फिर श्रीमती कीर्ति लड्डा (पत्नी, सुशील कुमार लड्डा) के नाम दर्ज कर दी गई,
  • फिर वल्लभदास लड्डा, कृष्णाबाई लड्डा, सुशील कुमार लड्डा के नाम ट्रांसफर कर दी गई।

श्री देवड़ा कहा कि यह पूरी प्रक्रिया एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी, जिसमें ज़मीन पर धीरे-धीरे कब्जा किया गया और फिर सरकारी दस्तावेजों में फेरबदल कर इसे “कृषि भूमि” में तब्दील कर दिया गया।

बैंक लोन और वेयरहाउस का खेल!

इस मामले में एडवोकेट भागीरथ देवड़ा ने का कहना है कि शासकीय रिकॉर्ड के अनुसार, यह ज़मीन चरनोई (गोचर) भूमि थी, जिसका निजी स्वामित्व में स्थानांतरण असंभव था। फिर भी, सुशील लड्डा और उनके परिजनों ने बैंक अधिकारियों से सांठगांठ कर इस पर भारी भरकम कर्ज लिया और संस्कार वेयरहाउस का निर्माण कर दिया।

सूत्रों के मुताबिक, बैंक अधिकारियों ने बिना उचित जांच किए करोड़ों रुपये का लोन स्वीकृत कर दिया, जो इस घोटाले में एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।

सरकारी अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका!

  • पटवारी स्तर पर रिकॉर्ड में गड़बड़ी की गई।
  • तहसील और अनुविभागीय अधिकारी स्तर पर इस ज़मीन के दस्तावेजों को वैध बनाया गया।
  • जिला प्रशासन ने इस पूरे मामले पर चुप्पी साध रखी।
  • बैंक अधिकारियों ने ज़मीन की वास्तविक स्थिति जाने बिना ही फाइनेंस कर दिया।

2016 में हुई शिकायत, फिर भी कार्रवाई नहीं!

एडवोकेट भागीरथ देवड़ा ने का कहना है कि मार्च 2016 में देवीलाल दांगी नामक व्यक्ति ने इस घोटाले को उजागर किया और सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज करवाई। इस शिकायत के आधार पर कलेक्टर ने जांच के आदेश भी दिए और मामला अपर आयुक्त उज्जैन संभाग तक पहुंचा।

लेकिन सवाल यह है कि फिर भी अब तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

बड़े सवाल जो प्रशासन को कटघरे में खड़ा करते हैं!

चरनोई भूमि को निजी स्वामित्व में कैसे बदला गया?
बैंक ने बिना जांच के करोड़ों का लोन कैसे स्वीकृत किया?
कलेक्टर जांच के बावजूद अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या राजनीतिक संरक्षण के चलते घोटालेबाज खुलेआम घूम रहे हैं?

अब क्या होगा?

अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस बड़े घोटाले पर कोई ठोस कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

जनमत जागरण इन्वेस्टिगेशन टीम इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है। यदि आपके पास भी इस मामले से जुड़ी कोई जानकारी हो, तो हमें बताएं।

रिपोर्ट: जनमत जागरण इन्वेस्टिगेशन टीम

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