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क्या हिंदू समाज अपनी जड़ों से भटक रहा है? ▪️क्या आपको पता है? हर दिन 82,000 गौमाताओं की हत्या हो रही है! – समझिए इन चौंकाने वाले आंकड़ों हकीकत

क्या गोमाता की रक्षा से ही बचेगा राष्ट्र? जानिए स्वामी गोपालानंद सरस्वती का संदेश

जनमत जागरण @ सुसनेर।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव द्वारा घोषित “गोवंश रक्षा वर्ष” के अंतर्गत, जनपद पंचायत सुसनेर के समीपस्थ ननोरा, श्यामपुरा, सेमली और सालरिया ग्राम पंचायत की सीमा पर स्थित श्री कामधेनु गो अभयारण्य, मालवा में चल रहे एक वर्षीय वेदलक्षणा गो आराधना महामहोत्सव के 345वें दिवस पर स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज ने प्रेरणादायी उद्बोधन दिया।

उन्होंने 80 वर्षीय भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स के संघर्ष और धैर्य की मिसाल देते हुए बताया कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और हिम्मत बनाए रखना सफलता की कुंजी है। 286 दिनों तक अंतरिक्ष में रहकर उन्होंने धैर्य, आस्था और भारतीय संस्कृति से जुड़े चार प्रमुख सूत्रों का पालन किया—

  1. गोप्रेमी परिवार में जन्म लेना
  2. गीता जी का साथ रखना
  3. गणेश जी की प्रतिमा साथ रखना
  4. भारतीय विज्ञान और योग को अपनाना

स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज ने संदेश दिया कि:

  • गो रक्षा से ही राष्ट्र रक्षा संभव है।
  • सनातन धर्म का मूल प्राण गोमाता हैं।
  • श्रम ही सबसे बड़ी औषधि है, संघर्ष जितना अधिक होगा, निखार उतना ही अधिक आएगा।

क्या हिंदू समाज अपनी जड़ों से भटक रहा है?

गोपाल परिवार संघ के गोवत्स धीरेन्द्र गोपाल ने वर्तमान समाज पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जहां भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं गोमाता की सेवा की और भगवान राम ने गोसेवा के लिए अवतार लिया, वहीं आज के हिंदू समाज में गोवंश की दयनीय स्थिति चिंताजनक है।

आंकड़े चिंताजनक हैं:

  • प्रतिदिन 82,000 गोमाताओं की हत्या हो रही है।
  • 6 करोड़ गोमाताएँ सड़कों पर निराश्रित घूम रही हैं।
  • गोवंश की रक्षा के लिए हिंदू समाज को जागरूक होने की आवश्यकता है।

345वें दिवस पर चुनरी यात्रा और गोसेवा

इस अवसर पर मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड से आए श्रद्धालुओं ने चुनरी यात्रा निकाली और भगवती गोमाता को चुनरी ओढ़ाकर पूजन किया। श्रद्धालुओं ने यज्ञशाला की परिक्रमा कर गोसेवा की और गोव्रती महाप्रसाद ग्रहण किया।

क्या आप भी गोवंश रक्षा के इस संकल्प में भाग लेंगे?

गो रक्षा केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि राष्ट्र की संस्कृति और अस्तित्व से भी जुड़ा विषय है। क्या हिंदू समाज इस चुनौती को स्वीकार कर अपनी सनातन जड़ों को पुनः मजबूत करेगा?

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