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“मृतकों के नाम पर राशन, शादीशुदाओं की सूची में गड़बड़ी! कब जागेगा प्रशासन?” प्रशासन की लापरवाही से करोड़ों का नुकसान

“सरकारी तंत्र की ‘सिस्टम फेल’ कहानी: जब अधिकारी कह रहे— ‘हमने अपनी फाइल बढ़ा दी, अब हमारी बला से!'”

EXCLUSIVE INVESTIGATIVE REPORT

जनमत जागरण @ आगर-मालवा । नगर परिषद कह रही— ‘हमने सूची भेज दी’, खाद्य विभाग कह रहा— ‘हम तो सिर्फ नाम हटाते-जोड़ते हैं’, जनपद अधिकारी कह रहे— ‘अगर लापरवाही है, तो कार्रवाई होगी’, और नगर निकाय के अधिकारी दावा कर रहे— ‘नाम हटाना परिजनों की जिम्मेदारी है!’ यानी, हर कोई जिम्मेदारी से हाथ झाड़ रहा है, लेकिन मृतक और शादीशुदा महिलाओं के नाम पर हर महीने हजारों किलो राशन बंट रहा है!

सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता की दुहाई देने वाले ये अधिकारी जब अपनी ही नीतियों को लागू नहीं करवा पा रहे हैं, तो सवाल उठता है— क्या इनकी भूमिका सिर्फ ‘कागजी खानापूर्ति’ करने तक सीमित रह गई है? एक तरफ सरकार करोड़ों खर्च कर गरीबों के लिए अनाज बांट रही है, दूसरी तरफ बिचौलियों से नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी से ही सरकारी खजाने को चूना लग रहा है!

क्या यह सिर्फ ‘लापरवाही’ है या फिर ‘आलस्य का गठजोड़’? जब तक कोई घोटाला बड़ा रूप नहीं ले लेता, तब तक जिम्मेदार आँखें मूंदे क्यों बैठे रहते हैं? अब बड़ा सवाल यह है कि इस सरकारी ढर्रे में सुधार कब होगा या फिर ये खेल यूं ही चलता रहेगा?


कितनी बड़ी है यह गड़बड़ी? देखें आंकड़े!

➡️ आगर जिले में कुल 513 गांव, 227 ग्राम पंचायतें, 6 नगर पंचायतें (सोयत, सुसनेर, नलखेड़ा, बड़ोद, बड़ागांव, कानड़) और 1 नगर पालिका (आगर) है।
➡️ अगर एक ग्राम पंचायत में औसतन 20-25 परिवार भी अपात्र हैं, तो 5000 से अधिक सदस्यों को गलत तरीके से राशन मिल रहा है।
➡️ सरकार गेहूं की खरीदी ₹26 प्रति किलो की दर से करती है, यानी हर महीने 6.5 लाख रुपए का नुकसान
➡️ सालभर में यह रकम 78 लाख रुपए तक पहुंच जाती है।
➡️ जिलेभर के नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों को मिलाकर यह मामला करोड़ों रुपए की सरकारी बर्बादी तक पहुंच जाता है।

“मुझे आज भी मां के नाम का राशन मिल रहा है”

हमारी पड़ताल के दौरान कुछ हितग्राहियों ने नाम न छापने की शर्त पर चौंकाने वाले खुलासे किए:
➡️ एक हितग्राही ने कहा, “मेरी मां 2021 में गुजर गई थीं, लेकिन उनके नाम का राशन आज भी मुझे मिल रहा है।”
➡️ एक ग्रामीण ने बताया, “मेरी बेटी की शादी 4 साल पहले हो गई थी, लेकिन आज भी उसका नाम पोर्टल पर है और मैं उसका राशन ले रहा हूं।”

जिम्मेदार अधिकारी क्या कह रहे हैं?

नारायण सिंह मुवेल (जिला आपूर्ति अधिकारी, खाद्य विभाग आगर)
“समग्र पोर्टल से नाम काटने व जोड़ने की प्रक्रिया नगरीय क्षेत्र में नगर पंचायत और ग्रामीण क्षेत्र में ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी होती है। खाद्य विभाग सिर्फ स्थानीय निकायों द्वारा भेजी गई सूची के आधार पर नाम हटाने और जोड़ने का कार्य करता है। यदि मृतकों के नाम पर भी खाद्यान्न मिल रहा है, तो यह पूरी तरह से स्थानीय निकायों की लापरवाही है। ऐसे कर्मचारियों और अधिकारियों पर कार्रवाई करने का काम भी नगर निकाय और जनपद सीईओ का रहता है।”

राजेश शाक्य (मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जनपद पंचायत सुसनेर)
“समग्र पोर्टल पर नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया नगर पंचायत और ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी होती है। पात्रता पर्ची के आधार पर राशन वितरण होता है। यदि किसी की मृत्यु हुई है और उसका नाम नहीं हटाया गया, तो यह लापरवाही की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।”

ओ.पी. नागर (नगर परिषद अधिकारी, सुसनेर)
“हमने नगर के लगभग 40 से अधिक मृतकों की सूची बनाकर खाद्य विभाग को भेजी है। जिन महिलाओं की शादी हो चुकी है, उनके नाम हटवाने की जिम्मेदारी उनके परिजनों की होती है। यदि परिजन जाकर उनके नाम नहीं कटवाते, तो हम इसे आधार बनाकर नाम नहीं हटा सकते।”

देवेंद्र वत्स (नगर परिषद अधिकारी, सोयतकलां)
“नगर में जिन लोगों की मृत्यु होती है, उनकी सूची समय-समय पर खाद्य विभाग को भेजी जाती है। कर्मचारी समग्र पोर्टल पर नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया करते हैं। फिर भी यदि किसी कर्मचारी द्वारा कोई लापरवाही हुई है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।”

छोटी लापरवाही, बड़ा नुकसान!

हर महीने 25,000 किलो राशन गलत हाथों में जा रहा है।
सरकार को हर महीने 6.5 लाख और सालभर में 78 लाख रुपए का नुकसान।
अगर पूरे प्रदेश और देश की बात करें, तो यह मामला हजारों करोड़ तक पहुंच सकता है!

अब सवाल यह है:

➡️ नगर पंचायत और ग्राम पंचायतें किसकी प्रतीक्षा कर रही हैं?
➡️ मृतकों और शादीशुदा महिलाओं के नाम हटाने में इतनी देरी क्यों?
➡️ जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी?
➡️ क्या ई-केवाईसी इस गड़बड़ी को रोक पाएगी या यह सिर्फ एक और दिखावटी प्रक्रिया बन जाएगी?

सरकार ने 31 मार्च 2025 तक ई-केवाईसी अनिवार्य कर दी है। अगर यह समयसीमा लागू होती है, तो अप्रैल 2025 से अपात्रों को राशन नहीं मिलेगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या तब तक सरकार की लाखों-करोड़ों की बर्बादी इसी तरह चलती रहेगी?

हमारी यह एक्सक्लूसिव इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट सरकारी तंत्र की लापरवाही और करोड़ों के नुकसान को उजागर करने का एक प्रयास है।

आपको यह रिपोर्ट कैसी लगी? क्या आपके क्षेत्र में भी ऐसी लापरवाही देखने को मिल रही है? अपनी राय नीचे कमेंट करें और इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें, ताकि प्रशासन की नींद खुले!

जनमत जागरण आगे भी इसी तरह जनहित से जुड़ी खबरों और घोटालों को उजागर करता रहेगा। सच के इस सफर में बने रहिए हमारे साथ!

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