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भाजपा में ‘राजनीतिक महाभारत’: कौन होगा अर्जुन, कौन बनेगा जयचंद? (भाजपा की गुटबाजी पर एक गूंजता हुआ विश्लेषण) ➡️ जानिए, कौन बना ‘पार्टी का जयचंद’?”

आगर जिले में भाजपा की राजनीति अब कुरुक्षेत्र का मैदान बन चुकी है। संगठन के भीतर संघर्ष इस स्तर तक पहुंच चुका है कि अब यह तय करना मुश्किल हो गया है कि अर्जुन कौन है और जयचंद कौन? जो जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं, वे खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं, और जो गुटबाजी के जाल बुन रहे हैं, वे अपनी ताकत का अहंकार दिखा रहे हैं। “भाजपा के भीतर सत्ता की इस खींचतान में कुछ चेहरे पर्दे के पीछे से खेल रहे हैं। संगठन में कौन चाणक्य की भूमिका निभा रहा है और कौन सिर्फ कठपुतली बनकर इस्तेमाल हो रहा है, यह बड़ा सवाल है।”

▪️“घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध”—भाजपा के आगर जिले में यही हाल है। अपने ही नेता, अपने ही संगठन के खिलाफ ऐसी चालें चल रहे हैं कि विपक्ष को कुछ करने की जरूरत ही नहीं! 2023 में भाजपा की गुटबाजी इतनी चरम पर थी कि खुद भाजपा नेताओं ने अपने अधिकृत प्रत्याशी राणा विक्रम सिंह को हराकर कांग्रेस के भेरू सिंह बापू को जिता दिया। अब सवाल उठता है कि अगर अपनी ही टीम गोल करने लगे, तो विपक्ष को मेहनत करने की क्या जरूरत?

आज वही गुटबाजी इस हद तक पहुंच गई है कि पार्टी की महिला जिलामंत्री को अपने ही पार्षद से जान से मारने की धमकी मिल रही है। संगठन का हाल ऐसा हो गया है कि “रक्षक ही भक्षक” बन गए हैं! महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा की बात करने वाली भाजपा अब अपने ही कार्यकर्ताओं के लिए असुरक्षित बन चुकी है।

आखिर कौन है जिम्मेदार?

चिराग तले अंधेरा”—भाजपा के लिए यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। जो पार्टी “महिला सशक्तिकरण” का दावा करती है, उसी की महिला जिलामंत्री आज थाने के चक्कर काट रही है। भाजपा का प्रदेश नेतृत्व आगर जिले की गुटबाजी को खत्म करने के बजाय सिर्फ “जुगाड़ू राजनीति” कर रहा है। चुनाव आते ही किसी नए चेहरे को लाकर खड़ा कर दिया जाता है, और बाकी 5 साल तक संगठन गुटबाजी की आग में जलता रहता है।

‘अघोषित विद्रोह’ और ‘राजनीतिक शिखंडी’ की खोज!

एक समय था जब भाजपा का संगठन लोहे की दीवार की तरह मजबूत था, लेकिन अब वही दीवार दीमक लगी लकड़ी की तरह चरमराने लगी है। 2023 की हार केवल स्थानीय गुटबाजी का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसका सबसे बड़ा कारण प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व की अदूरदर्शिता और जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी भी थी। शीर्ष नेतृत्व ने यह समझने की जरूरत ही नहीं समझी कि आगर जिले के कार्यकर्ताओं की वास्तविक मंशा क्या है। बिना कोई ठोस आकलन किए, ऊपर से एक ऐसे प्रत्याशी को थोपा गया, जिसे कार्यकर्ताओं ने हृदय से स्वीकार ही नहीं किया। परिणामस्वरूप, भाजपा के कर्मठ और समर्पित कार्यकर्ताओं ने मौन विद्रोह कर दिया, और उनकी निष्क्रियता ने कांग्रेस प्रत्याशी को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत कर दिया।

यही वह स्थिति थी, जब जयचंद ने पृथ्वीराज चौहान की हार की पटकथा लिखी थी। लेकिन इस बार जयचंद कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि नेतृत्व की निर्णयहीनता, स्वार्थपरक राजनीति और गुटबाजी की विषबेल थी, जिसने संगठन की जड़ों को खोखला कर दिया। भाजपा कार्यकर्ताओं को अब हस्तिनापुर के बंधुआ सैनिक समझा जाने लगा है—आदेश मानो या बाहर जाओ! पार्टी के भीतर एक अघोषित विद्रोह की स्थिति बन रही है, और सवाल यह उठता है कि इस महाभारत का शिखंडी कौन बनेगा? कौन सत्ता के लिए इस्तेमाल होगा और कौन बलि का बकरा बनेगा?

अब समय आ गया है कि शीर्ष नेतृत्व आत्ममंथन करे और समझे कि संगठन की नींव जमीनी कार्यकर्ताओं की निष्ठा और परिश्रम से मजबूत होती है, न कि किसी गुट विशेष के स्वार्थी निर्णयों से!

जब अर्जुन को ‘अपनों’ ने ही छल लिया!

अगर भाजपा के पिछले कुछ चुनाव देखें तो यह साफ हो जाता है कि पार्टी के कई असली अर्जुन, यानी मेहनती और ईमानदार नेता, अपने ही लोगों के छल का शिकार हो चुके हैं।

  • 1992: बद्रीलाल सोनी को उनके ही साथी नेता हरिभाउ जोशी के निर्दलीय खड़े होने से हार का सामना करना पड़ा, जिससे कांग्रेस के उम्मीदवार वल्लभभाई अंबावतिया चुनाव जीत गए।
  • 2018: मुरलीधर पाटीदार को पार्टी के भीतर से इतना विरोध झेलना पड़ा कि कांग्रेस से टिकट न मिलने के कारण निर्दलीय खड़े हुए राणा विक्रम सिंह जीत गए।
  • 2023: भाजपा के उम्मीदवार राणा विक्रम सिंह पार्टी के अंदरूनी संघर्षों की बलि चढ़ गए, और कांग्रेस प्रत्याशी भेरूसिंह बापू ने चुनावी समर में विजय पताका फहरा दी। संगठन का संतुलन बिगड़ा और सत्ता गणित धराशायी हो गया।
  • इस पराजय की जड़ें गहरी थीं—भाजपा नेतृत्व ने जमीनी स्तर पर वर्षों से समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर कांग्रेस से आए निर्दलीय विजेता को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। इससे पार्टी की निष्ठा और संघर्ष के बल पर खड़े कार्यकर्ताओं में असंतोष पनपा। परिणाम स्वरूप, जिन कार्यकर्ताओं ने संगठन की नींव मजबूत की थी, वे हाशिए पर चले गए, और उनकी मौन असहमति ने पार्टी के भीतर ही अदृश्य विद्रोह को जन्म दिया। सत्ता-संघर्ष में यह असंतोष निर्णायक साबित हुआ, और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता ने पराजय की पटकथा लिख दी।
  • ✔ “जिस थाली में खाना, उसी में छेद करना!” – कई नेता भाजपा के मंच से शक्ति प्रदर्शन करते हैं, लेकिन ऐन चुनाव के समय गुटबाजी करके नुकसान पहुंचाते हैं।
  • ✔ “आधा तीतर, आधा बटेर!” – पार्टी संगठन की स्थिति यह हो गई है कि न तो यह पूरी तरह संगठित है और न ही पूरी तरह बिखरा हुआ, बस बीच में लटका हुआ है।

जब ‘भीष्म’ भी गुटबाजी के आगे बेबस हो गए

गुटबाजी केवल विधानसभा तक सीमित नहीं है। जिले की नगर परिषदों में भी राजनीतिक कलह की ज्वाला धधक रही है। सूत्र बताते हैं कि लगभग पूरे जिले की नगर परिषदों में यही स्थिति बनी हुई है—सत्ता संघर्ष, आपसी खींचतान और राजनीतिक सौदेबाजी के चलते प्रशासनिक कार्यों में ठहराव आ गया है। हर जगह परिषदें किसी तरह घिसट-घिसटकर चल रही हैं।

अब सवाल यह उठता है कि यह राजनीतिक रस्साकशी आखिर कब तक चलेगी? क्या नगर परिषदें जनता की सेवा के लिए हैं या केवल गुटीय राजनीति का अखाड़ा बनकर रह गई हैं? जब तक यह लड़ाई जारी रहेगी, तब तक विकास हाशिए पर ही रहेगा!

  • सुसनेर नगर परिषद में भाजपा के अपने पार्षदों ने ही अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर साइन कर दिए, क्योंकि वे अलग-अलग गुटों के थे
  • सोयतकलां में निकले नेशनल हाईवे पर सर्विस रोड का मामला भी गुटबाजी की भेंट चढ़ गया। एक गुट बाईपास चाहता था तो दूसरा सर्विस रोड। नतीजा? आम नागरिकों को न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा!
  • ✔ “सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे!” – कुछ नेता गुटबाजी भी जारी रखना चाहते हैं और खुद को पार्टी का वफादार भी साबित करना चाहते हैं।
  • ✔ “चलनी दूसरों को छेद दिखाए, खुद सौ छेद वाली!” – जो नेता खुद गुटबाजी कर रहे हैं, वे कार्यकर्ताओं को एकजुटता का पाठ पढ़ा रहे हैं।

गुटबाजी के चक्रव्यूह में फंसती भाजपा – ‘कृष्ण’ गायब, शकुनियों की भरमार!

भाजपा की यह अंदरूनी लड़ाई अब उस स्तर तक पहुंच चुकी है, जहां मतभेद नहीं, बल्कि मनभेद हो चुके हैं। संगठन के भीतर न कोई मार्गदर्शक कृष्ण दिख रहा है, न कोई समाधानकारक भीष्म। लेकिन शकुनियों की भरमार जरूर है, जो अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं।

▪️भाजपा में ‘विश्वासघातियों’ का खेल कब खत्म होगा?

भाजपा के छोटे कार्यकर्ता, जो दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, आज खुद से सवाल कर रहे हैं – “क्या हम सिर्फ वोट बैंक और प्रचार मशीनरी के लिए हैं?” सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत को भूलकर अपनी गुटबाजी को मजबूत करने में लगे हैं। यही वजह है कि एक के बाद एक भाजपा के निष्ठावान कर्मयोगी हाशिए पर धकेले जा रहे हैं, जबकि मौकापरस्तों और अवसरवादियों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

जिस तरह महाभारत में विश्वासघातियों ने पांडवों के लिए राह मुश्किल कर दी थी, उसी तरह आज संगठन के भीतर भी अंदरूनी साजिशों का जाल बुना जा रहा है। सवाल यह है कि इन सियासी चालबाजों पर कब गिरेगी अनुशासन की गदा? क्या पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं को कभी न्याय मिलेगा, या फिर वे केवल त्याग और बलिदान की मूर्ति बनकर रह जाएंगे?

अब सवाल यह है कि यह ‘राजनीतिक महाभारत’ कब खत्म होगा?

  • क्या प्रदेश नेतृत्व आगर जिले की इस तथाकथित महाभारत पर ध्यान देगा?
  • क्या भाजपा के भीतर भी कोई ‘द्रोपदी का चीरहरण’ होने का इंतजार कर रहा है, जिससे संगठन की असलियत खुलकर सामने आ जाए?
  • क्या पार्टी के भीतर भीष्म पितामह की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ नेता अपनी मौन तपस्या तोड़कर कुछ कदम उठाएंगे?

यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस महाभारत में ‘धृतराष्ट्र’ बनकर आंखें मूंदे रखेगी या समय रहते जयचंदों की पहचान कर निष्कासन की सजा देगी! “हर सत्ता संघर्ष में कोई न कोई बलि का बकरा बनता है। भाजपा में चल रही इस अंदरूनी कलह में किसका राजनीतिक करियर खत्म होगा और कौन अगले चुनाव में पार्टी के निशाने पर रहेगा, यह देखने वाली बात होगी।”

भविष्य की तस्वीर: गुटबाजी रहेगी, तो पार्टी खत्म हो जाएगी!भाजपा को अगर सच में अपने कार्यकर्ताओं की चिंता है, तो उसे “घर की सफाई” करनी होगी। “एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं,” लेकिन आगर जिले में तो हर कोई तलवार लेकर घूम रहा है, और हर कोई अपने ही संगठन के लोगों को जख्म देने में लगा है।

अगर भाजपा ने अपनी गुटबाजी नहीं रोकी, तो 2028 में फिर यही होगा—अपने ही अपनों को हराएंगे, और हार का ठीकरा जनता के सिर फोड़ दिया जाएगा!

➡️ अब सवाल यह है कि क्या भाजपा के अर्जुन इस चक्रव्यूह को भेद पाएंगे, या फिर साजिशें हमेशा की तरह भारी पड़ेंगी?”आने वाला चुनाव बताएगा कि भाजपा इस ‘महाभारत‘ से कैसे बाहर निकलती है या फिर गुटबाजी के इस दांव-पेंच में हमेशा के लिए उलझ जाती है।


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