‘सच की आवाज़’ फेसबुक आईडी से भ्रामक पोस्ट करने वाले संतोष बैरागी पर BNS 353 और IT एक्ट में केस दर्ज

समाज को भ्रमित करने की छूट नहीं: सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने वालों को अब जवाब देना होगा
जनमत जागरण @ सुसनेर।
वर्तमान डिजिटल युग में जहां सोशल मीडिया जन-जागरूकता और संवाद का सशक्त माध्यम बना है, वहीं कुछ लोग इसे भ्रामक सूचनाओं और चरित्र हनन का हथियार बना बैठे हैं। ‘फेसबुक आईडी – सच की आवाज़’ नामक अकाउंट के माध्यम से लंबे समय से विभिन्न जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध झूठी, तथ्यहीन और समाज को गुमराह करने वाली पोस्ट डालने वाले युवक संतोष बैरागी के खिलाफ सुसनेर पुलिस ने सख्त कार्रवाई करते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353 और आईटी अधिनियम 66सी एवं 67 के तहत प्रकरण दर्ज किया है।
यह मामला तब सामने आया जब सरपंच संघ ब्लॉक अध्यक्ष विक्रमसिंह परमार ने थाने में लिखित शिकायत प्रस्तुत करते हुए बताया कि संतोष बैरागी, निवासी नांदना, फर्जी फेसबुक आईडी से लगातार प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, सांसद, विधायक और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध अपमानजनक एवं भ्रामक पोस्ट कर रहा था। यह न केवल जनप्रतिनिधियों की सामाजिक छवि को धूमिल कर रहा था, बल्कि क्षेत्र की शांति व्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता था।
थाना प्रभारी केसर राजपूत ने जानकारी देते हुए बताया कि आरोपी के खिलाफ एफआईआर क्रमांक 0086 के अंतर्गत केस दर्ज कर गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी की गतिविधियों को लेकर सभ्रांत नागरिकों और जनप्रतिनिधियों से लगातार शिकायतें मिल रही थीं, जिनके आधार पर यह कठोर कार्रवाई की गई है।
क्या कहती है बीएनएस की धारा 353?
यह धारा सार्वजनिक भलाई को प्रभावित करने वाले अपराधों से जुड़ी है। यह अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती है – यानी आरोपी को बिना वारंट गिरफ्तार किया जा सकता है और उसे जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा।
सार्थक दृष्टिकोण से विशेष टिप्पणी
डिजिटल मंचों पर सीमाएं लांघती ‘सच की आवाज़’ – एक चेतावनी, एक ज़िम्मेदारी
सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का एक शक्तिशाली माध्यम है। लेकिन जब यह माध्यम निजी एजेंडा, बदले की भावना या अराजक सोच का हथियार बन जाए – तो यह समाज में भ्रम, वैमनस्य और अविश्वास फैलाने का कारण भी बनता है।
‘सच की आवाज़’ नामक फेसबुक आईडी से लगातार की जा रही भ्रामक व अपमानजनक पोस्टिंग, और उसके पीछे सामने आया नाम संतोष बैरागी, आज हमें उस अनदेखे मोड़ पर लाकर खड़ा करता है जहां डिजिटल आज़ादी बनाम डिजिटल ज़िम्मेदारी का सवाल सबसे मुखर होकर उभरता है।
यह सिर्फ एक पुलिस केस नहीं है – यह डिजिटल संस्कार, वैचारिक मर्यादा और समाज की समरसता की परीक्षा है।
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🖋️ *‘सच की आवाज़’ या झूठ का शोर? डिजिटल स्वतंत्रता बनाम डिजिटल अराजकता* ✍️ – *संपादकीय सार्थक दृष्टिकोण | राजेश कुमरावत ‘सार्थक’*
‘सच की आवाज़’ या झूठ का शोर? डिजिटल स्वतंत्रता बनाम डिजिटल अराजकता – संपादकीय सार्थक दृष्टिकोण | राजेश कुमरावत ‘सार्थक’



