‘सच की आवाज़’ या झूठ का शोर? डिजिटल स्वतंत्रता बनाम डिजिटल अराजकता – संपादकीय सार्थक दृष्टिकोण | राजेश कुमरावत ‘सार्थक’

फेसबुक की ‘सच की आवाज़’ से उपजी असली चिंता , सोशल मीडिया पर भ्रम फैलाने वालों के लिए चेतावनी बना यह केस
– संपादकीय सार्थक दृष्टिकोण | राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
एक समय था जब कलम और काग़ज़ से सत्य का उद्घोष होता था। आज वह भूमिका स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने ले ली है। पर जब यह माध्यम सच की आवाज़ के नाम पर झूठ, भ्रम और अपमान का मंच बन जाए, तो सवाल उठता है – क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है या सामाजिक अशांति की नींव?
सुसनेर क्षेत्र में ‘सच की आवाज़’ नामक फेसबुक आईडी से चल रही गतिविधियाँ अब सिर्फ डिजिटल पोस्ट नहीं रहीं, बल्कि कानून और समाज दोनों के लिए चुनौती बन चुकी हैं। प्रधानमंत्री से लेकर गाँव के सरपंच तक, हर जनप्रतिनिधि को सार्वजनिक रूप से झूठे आरोपों से घेरना, न केवल व्यक्तिगत छवि को ठेस पहुँचाता है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता के विश्वास को भी हिलाता है।
आज जब इस प्रकरण पर बीएनएस की धारा 353 और आईटी एक्ट की सख्त धाराओं में मामला दर्ज हुआ है, तो यह केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं है – यह पूरे समाज के लिए चेतावनी है।
“अब समय आ गया है – अभिव्यक्ति के अधिकार का सही अर्थ समझा जाए और सोशल मीडिया को सामाजिक दायित्व की दृष्टि से देखा जाए।”
हर नागरिक को यह समझना होगा कि डिजिटल मंच भी एक सार्वजनिक मंच है, जहाँ हर शब्द, हर पोस्ट – एक दस्तावेज़ की तरह होता है, जिसके अपने नैतिक और विधिक परिणाम होते हैं।
सार्थक चिंतन:
सोशल मीडिया पर स्वतंत्रता के साथ-साथ संवेदनशीलता और सत्यनिष्ठा भी आवश्यक है।
क्योंकि ‘सच की आवाज़’ अगर झूठ का शोर बन जाए, तो समाज का संतुलन बिगड़ सकता है।
डिजिटल स्वतंत्रता बनाम डिजिटल अराजकता – ‘सच की आवाज़’ नामक फेसबुक आईडी से उपजा बड़ा सवाल
संतोष बैरागी नामक युवक द्वारा ‘सच की आवाज़’ नाम से संचालित एक फेसबुक आईडी से प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, सांसद, विधायक और पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध लगातार भ्रामक, अपमानजनक और तथ्यहीन पोस्ट किए जाना न केवल एक आपराधिक गतिविधि है, बल्कि यह डिजिटल युग में सामाजिक विघटन की स्पष्ट चेतावनी भी है।
इस मामले में सरपंच संघ ब्लॉक अध्यक्ष विक्रमसिंह परमार की शिकायत पर पुलिस ने बीएनएस धारा 353 और आईटी अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज कर उचित कार्रवाई की है। लेकिन प्रश्न यह है कि आख़िर ऐसी मानसिकता पैदा क्यों हो रही है, और समाज इसे रोकने के लिए कितना सजग है?
आज जब सोशल मीडिया हर हाथ में है, तब क्लिक की आज़ादी को सच की आवाज़ कह देना बहुत आसान हो गया है। मगर अभिव्यक्ति की आज़ादी का अर्थ यह कदापि नहीं कि हम किसी की प्रतिष्ठा, कानून और समाज की शांति से खिलवाड़ करें।
सोचिए – जब झूठ फैलाकर किसी की छवि को धूमिल किया जा सकता है, तो कल को कोई भी किसी के भी खिलाफ ‘डिजिटल न्यायाधीश’ बन जाएगा। यही तो डिजिटल अराजकता है – और यही समाज को भीतर से खोखला कर रही है।
यह घटना इस बात का संकेत है कि अब जनजागरूकता के साथ-साथ डिजिटल आचारसंहिता का पालन भी उतना ही आवश्यक है। स्कूलों, कॉलेजों और पंचायत स्तर पर मीडिया साक्षरता और साइबर नैतिकता पर संवाद की सख्त ज़रूरत है।
निष्कर्ष
‘सच की आवाज़’ नाम से झूठ फैलाना न केवल कानूनी अपराध है, बल्कि समाज की सोच पर एक चोट है।
सार्थक यही होगा कि हम मिलकर ऐसी प्रवृत्तियों के विरुद्ध खड़े हों – न्याय की आवाज़ बनकर, न कि भ्रम की परछाईं बनकर।
➡ पूरी खबर पढ़ें –सुसनेर में ‘सच की आवाज़’ नामक फेसबुक आईडी संचालक पर केस दर्ज निचे लिंक को क्लिक करें। 👇
👉 *‘सच की आवाज़’ फेसबुक आईडी से भ्रामक पोस्ट करने वाले संतोष बैरागी पर BNS 353 और IT एक्ट में केस दर्ज*
‘सच की आवाज़’ फेसबुक आईडी से भ्रामक पोस्ट करने वाले संतोष बैरागी पर BNS 353 और IT एक्ट में केस दर्ज



