हनुमान जन्मोत्सव पर समापन: वेदलक्षणा गो आराधना महामहोत्सव में स्वामी गोपालानंद सरस्वती जी ने की 30 वर्ष तक कथा जारी रखने की घोषणा

सुसनेर (जनमत जागरण)। मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्थापित एवं श्रीगोधाम महातीर्थ पथमेड़ा द्वारा संचालित विश्व के प्रथम श्री कामधेनु गो अभयारण्य, मालवा में चल रहे एक वर्षीय वेदलक्षणा गो आराधना महामहोत्सव का समापन हनुमान जन्मोत्सव के पावन अवसर पर हर्षोल्लास एवं भक्ति भाव से हुआ।
समापन समारोह में पूज्य स्वामी गोपालानंद सरस्वती जी महाराज ने घोषणा करते हुए कहा कि हनुमान जी महाराज की कृपा से यह वर्षभर चलने वाला महाआयोजन शांति एवं श्रद्धा से संपन्न हुआ। साथ ही उन्होंने यह भी उद्घोषणा की कि अब यह गो आराधना कथा आगामी 30 वर्षों तक गो अभयारण्य में निरंतर चलती रहेगी।
स्वामीजी ने हनुमान जी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि “जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू” – इस दोहे में छिपे भाव से स्पष्ट होता है कि हनुमान जी ने सूर्य भगवान को गुरु मानकर शिक्षा प्राप्त की, और इसी प्रकार गौ माता का भी सूर्य देव से संबंध है। उन्होंने यह भी बताया कि हनुमान जी और गौमाता ने मिलकर तम्भिका राक्षस का वध किया था।
महाराज जी ने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि “गाय माता की पूछ पकड़कर हनुमान चालीसा का पाठ करने से सभी कार्य सिद्ध होते हैं।” उन्होंने तिल-गुड़ अर्पण और सुंदरकांड पाठ की महिमा बताई तथा हर घर में एक गाय पालने की अपील की, जिससे भारत को कलियुग की चुनौतियों से बचाया जा सके।
इस अवसर पर प्रकाश जी महाराज एवं चंद्रमादास जी महाराज ने भी उपस्थित होकर आह्वान किया कि भारत का हर सनातनी जन गोसेवा में जुटे, जिससे भारत पुनः विश्वगुरु का पद प्राप्त कर सके।
गो अभयारण्य के प्रबंधक शिवराज शर्मा ने सभी सहयोगियों और गोसेवकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस अनुष्ठान की पूर्णता तभी मानी जाएगी जब हर सनातनी अपने घर में एक निराश्रित गाय को स्थान देगा। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि वे अभयारण्य में आते रहें और पुण्य लाभ लें।
महामहोत्सव के चतुर्दश दिवस पर राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, हरियाणा और दिल्ली सहित कई राज्यों से हजारों गोभक्त पहुंचे। भगवती गौमाता को चुनरी अर्पित कर पूजन किया गया, स्वामी गोपालानंद जी से आशीर्वाद लिया गया तथा हनुमान जी को ‘गो रक्षक’ के रूप में मंदिर में विधिवत स्थापित किया गया। कार्यक्रम का समापन यज्ञशाला की परिक्रमा, गोसेवा और गोव्रती महाप्रसाद के साथ हुआ।



